1.1.1 |
वृद्धिरादैच् |
|
1.1.2 |
अदेङ् गुणः |
|
1.1.3 |
इको गुणवृद्धी |
|
1.1.4 |
न धातुलोप आर्धधातुके |
|
1.1.5 |
क्क्ङिति च |
|
1.1.6 |
दीधीवेवीटाम् |
|
1.1.7 |
हलोऽनन्तराः संयोगः |
|
1.1.8 |
मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः |
|
1.1.9 |
तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् |
|
1.1.10 |
नाज्झलौ |
|
1.1.11 |
ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम् |
|
1.1.12 |
अदसो मात् |
|
1.1.13 |
शे |
|
1.1.14 |
निपात एकाजनाङ् |
|
1.1.15 |
ओत् |
|
1.1.16 |
सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे |
|
1.1.17 |
उञः |
|
1.1.18 |
ऊँ |
|
1.1.19 |
ईदूतौ च सप्तम्यर्थे |
|
1.1.20 |
दाधा घ्वदाप् |
|
1.1.21 |
आद्यन्तवदेकस्मिन् |
|
1.1.22 |
तरप्तमपौ घः |
|
1.1.23 |
बहुगणवतुडति संख्या |
|
1.1.24 |
ष्णान्ता षट् |
|
1.1.25 |
डति च |
|
1.1.26 |
क्तक्तवतू निष्ठा |
|
1.1.27 |
सर्वादीनि सर्वनामानि |
|
1.1.28 |
विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ |
|
1.1.29 |
न बहुव्रीहौ |
|
1.1.30 |
तृतीयासमासे |
|
1.1.31 |
द्वन्द्वे च |
|
1.1.32 |
विभाषा जसि |
|
1.1.33 |
प्रथमचरमतयाल्पार्धकतिपयनेमाश्च |
|
1.1.34 |
पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि
|
1.1.35 |
स्वमज्ञातिधनाख्यायाम् |
|
1.1.36 |
अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः |
|
1.1.37 |
स्वरादिनिपातमव्ययम् |
|
1.1.38 |
तद्धितश्चासर्वविभक्तिः |
|
1.1.39 |
कृन्मेजन्तः |
|
1.1.40 |
क्त्वातोसुन्कसुनः |
|
1.1.41 |
अव्ययीभावश्च |
|
1.1.42 |
शि सर्वनामस्थानम् |
|
1.1.43 |
सुडनपुंसकस्य |
|
1.1.44 |
न वेति विभाषा |
|
1.1.45 |
इग्यणः सम्प्रसारणम् |
|
1.1.46 |
आद्यन्तौ टकितौ |
|
1.1.47 |
मिदचोऽन्त्यात्परः |
|
1.1.48 |
एच इग्घ्रस्वादेशे |
|
1.1.49 |
षष्ठी स्थानेयोगा |
|
1.1.50 |
स्थानेऽन्तरतमः |
|
1.1.51 |
उरण् रपरः |
|
1.1.52 |
अलोऽन्त्यस्य |
|
1.1.53 |
ङिच्च |
|
1.1.54 |
आदेः परस्य |
|
1.1.55 |
अनेकाल्शित्सर्वस्य |
|
1.1.56 |
स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ |
|
1.1.57 |
अचः परस्मिन् पूर्वविधौ |
|
1.1.58 |
न पदान्तद्विर्वचनवरेयलोपस्वरसवर्णानुस्वारदीर्घजश्चर्विधिषु |
|
1.1.59 |
द्विर्वचनेऽचि |
|
1.1.60 |
अदर्शनं लोपः |
|
1.1.61 |
प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः |
|
1.1.62 |
प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् |
|
1.1.63 |
न लुमताऽङ्गस्य |
|
1.1.64 |
अचोऽन्त्यादि टि |
|
1.1.65 |
अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा |
|
1.1.66 |
तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य |
|
1.1.67 |
तस्मादित्युत्तरस्य |
|
1.1.68 |
स्वं रूपं शब्दस्याशब्दसंज्ञा |
|
1.1.69 |
अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्ययः |
|
1.1.70 |
तपरस्तत्कालस्य |
|
1.1.71 |
आदिरन्त्येन सहेता |
|
1.1.72 |
येन विधिस्तदन्तस्य |
|
1.1.73 |
वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद् वृद्धम् |
|
1.1.74 |
त्यदादीनि च |
|
1.1.75 |
एङ् प्राचां देशे |
|
1.2.1 |
गाङ्कुटादिभ्योऽञ्णिन्ङ् इत् |
|
1.2.2 |
विज इट् |
|
1.2.3 |
विभाषोर्णोः |
|
1.2.4 |
सार्वधातुकमपित् |
|
1.2.5 |
असंयोगाल्लिट् कित् |
|
1.2.6 |
इन्धिभवतिभ्यां च |
|
1.2.7 |
मृडमृदगुधकुषक्लिशवदवसः क्त्वा |
|
1.2.8 |
रुदविदमुषग्रहिस्वपिप्रच्छः सँश्च |
|
1.2.9 |
इको झल् |
|
1.2.10 |
हलन्ताच्च |
|
1.2.11 |
लिङ्सिचावात्मनेपदेषु |
|
1.2.12 |
उश्च |
|
1.2.13 |
वा गमः |
|
1.2.14 |
हनः सिच् |
|
1.2.15 |
यमो गन्धने |
|
1.2.16 |
विभाषोपयमने |
|
1.2.17 |
स्था घ्वोरिच्च |
|
1.2.18 |
न क्त्वा सेट् |
|
1.2.19 |
निष्ठा शीङ्स्विदिमिदिक्ष्विदिधृषः |
|
1.2.20 |
मृषस्तितिक्षायाम् |
|
1.2.21 |
उदुपधाद्भावादिकर्मणोरन्यतरस्याम् |
|
1.2.22 |
पूङः क्त्वा च |
|
1.2.23 |
नोपधात्थफान्ताद्वा |
|
1.2.24 |
वञ्चिलुञ्च्यृतश्च |
|
1.2.25 |
तृषिमृषिकृशेः काश्यपस्य |
|
1.2.26 |
रलो व्युपधाद्धलादेः संश्च |
|
1.2.27 |
ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः |
|
1.2.28 |
अचश्च |
|
1.2.29 |
उच्चैरुदात्तः |
|
1.2.30 |
नीचैरनुदात्तः |
|
1.2.31 |
समाहारः स्वरितः |
|
1.2.32 |
तस्यादित उदात्तमर्धह्रस्वम् |
|
1.2.33 |
एकश्रुति दूरात् सम्बुद्धौ |
|
1.2.34 |
यज्ञकर्मण्यजपन्यूङ्खसामसु |
|
1.2.35 |
उच्चैस्तरां वा वषट्कारः |
|
1.2.36 |
विभाषा छन्दसि |
|
1.2.37 |
न सुब्रह्मण्यायां स्वरितस्य तूदात्तः |
|
1.2.38 |
देवब्रह्मणोरनुदात्तः |
|
1.2.39 |
स्वरितात् संहितायामनुदात्तानाम् |
|
1.2.40 |
उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतरः |
|
1.2.41 |
अपृक्त एकाल् प्रत्ययः |
|
1.2.42 |
तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः |
|
1.2.43 |
प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् |
|
1.2.44 |
एकविभक्ति चापूर्वनिपाते |
|
1.2.45 |
अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् |
|
1.2.46 |
कृत्तद्धितसमासाश्च |
|
1.2.47 |
ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य |
|
1.2.48 |
गोस्त्रियोरुपसर्ज्जनस्य |
|
1.2.49 |
लुक् तद्धितलुकि |
|
1.2.50 |
इद्गोण्याः |
|
1.2.51 |
लुपि युक्तवद्व्यक्तिवचने |
|
1.2.52 |
विशेषणानां चाजातेः |
|
1.2.53 |
तदशिष्यं संज्ञाप्रमाणत्वात् |
|
1.2.54 |
लुब्योगाप्रख्यानात् |
|
1.2.55 |
योगप्रमाणे च तदभावेऽदर्शनं स्यात् |
|
1.2.56 |
प्रधानप्रत्ययार्थवचनमर्थस्यान्यप्रमाणत्वात् |
|
1.2.57 |
कालोपसर्जने च तुल्यम् |
|
1.2.58 |
जात्याख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम् |
|
1.2.59 |
अस्मदो द्वायोश्च |
|
1.2.60 |
फल्गुनीप्रोष्ठपदानां च नक्षत्रे |
|
1.2.61 |
छन्दसि पुनर्वस्वोरेकवचनम् |
|
1.2.62 |
विशाखयोश्च |
|
1.2.63 |
तिष्यपुनर्वस्वोर्नक्षत्रद्वंद्वे बहुवचनस्य
|
1.2.64 |
सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ |
|
1.2.65 |
वृद्धो यूना तल्लक्षणश्चेदेव विशेषः |
|
1.2.66 |
स्त्री पुंवच्च |
|
1.2.67 |
पुमान् स्त्रिया |
|
1.2.68 |
भ्रातृपुत्रौ स्वसृदुहितृभ्याम् |
|
1.2.69 |
नपुंसकमनपुंसकेनैकवच्चास्यान्यतरस्याम् |
|
1.2.70 |
पिता मात्रा |
|
1.2.71 |
श्वशुरः श्वश्र्वा |
|
1.2.72 |
त्यदादीनि सर्वैर्नित्यम् |
|
1.2.73 |
ग्राम्यपशुसंघेषु अतरुणेषु स्त्री |
|
1.3.1 |
भूवादयो धातवः |
|
1.3.2 |
उपदेशेऽजनुनासिक इत् |
|
1.3.3 |
हलन्त्यम् |
|
1.3.4 |
न विभक्तौ तुस्माः |
|
1.3.5 |
आदिर्ञिटुडवः |
|
1.3.6 |
षः प्रत्ययस्य |
|
1.3.7 |
चुटू |
|
1.3.8 |
लशक्वतद्धिते |
|
1.3.9 |
तस्य लोपः |
|
1.3.10 |
यथासंख्यमनुदेशः समानाम् |
|
1.3.11 |
स्वरितेनाधिकारः |
|
1.3.12 |
अनुदात्तङित आत्मनेपदम् |
|
1.3.13 |
भावकर्मणोः |
|
1.3.14 |
कर्तरि कर्मव्यतिहारे |
|
1.3.15 |
न गतिहिंसार्थेभ्यः |
|
1.3.16 |
इतरेतरान्योन्योपपदाच्च |
|
1.3.17 |
नेर्विशः |
|
1.3.18 |
परिव्यवेभ्यः क्रियः |
|
1.3.19 |
विपराभ्यां जेः |
|
1.3.20 |
आङो दोऽनास्यविहरणे |
|
1.3.21 |
क्रीडोऽनुसम्परिभ्यश्च |
|
1.3.22 |
समवप्रविभ्यः स्थः |
|
1.3.23 |
प्रकाशनस्थेयाख्ययोश्च |
|
1.3.24 |
उदोऽनूर्द्ध्वकर्मणि |
|
1.3.25 |
उपान्मन्त्रकरणे |
|
1.3.26 |
अकर्मकाच्च |
|
1.3.27 |
उद्विभ्यां तपः |
|
1.3.28 |
आङो यमहनः |
|
1.3.29 |
समो गम्यृच्छिप्रच्छिस्वरत्यर्तिश्रुविदिभ्यः |
|
1.3.30 |
निसमुपविभ्यो ह्वः |
|
1.3.31 |
स्पर्द्धायामाङः |
|
1.3.32 |
गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनोपयोगेषु कृञः |
|
1.3.33 |
अधेः प्रसहने |
|
1.3.34 |
वेः शब्दकर्म्मणः |
|
1.3.35 |
अकर्मकाच्च |
|
1.3.36 |
सम्माननोत्सञ्जनाचार्यकरणज्ञानभृतिविगणनव्ययेषु नियः |
|
1.3.37 |
कर्तृस्थे चाशरीरे कर्मणि |
|
1.3.38 |
वृत्तिसर्गतायनेषु क्रमः |
|
1.3.39 |
उपपराभ्याम् |
|
1.3.40 |
आङ उद्गमने |
|
1.3.41 |
वेः पादविहरणे |
|
1.3.42 |
प्रोपाभ्यां समर्थाभ्याम् |
|
1.3.43 |
अनुपसर्गाद्वा |
|
1.3.44 |
अपह्नवे ज्ञः |
|
1.3.45 |
अकर्मकाच्च |
|
1.3.46 |
सम्प्रतिभ्यामनाध्याने |
|
1.3.47 |
भासनोपसम्भाषाज्ञानयत्नविमत्युपमन्त्रणेषु वदः |
|
1.3.48 |
व्यक्तवाचां समुच्चारणे |
|
1.3.49 |
अनोरकर्मकात् |
|
1.3.50 |
विभाषा विप्रलापे |
|
1.3.51 |
अवाद्ग्रः |
|
1.3.52 |
समः प्रतिज्ञाने |
|
1.3.53 |
उदश्चरः सकर्मकात् |
|
1.3.54 |
समस्तृतीयायुक्तात् |
|
1.3.55 |
दाणश्च सा चेच्चतुर्थ्यर्थे |
|
1.3.56 |
उपाद्यमः स्वकरणे |
|
1.3.57 |
ज्ञाश्रुस्मृदृशां सनः |
|
1.3.58 |
नानोर्ज्ञः |
|
1.3.59 |
प्रत्याङ्भ्यां श्रुवः |
|
1.3.60 |
शदेः शितः |
|
1.3.61 |
म्रियतेर्लुङ्लिङोश्च |
|
1.3.62 |
पूर्ववत् सनः |
|
1.3.63 |
आम्प्रत्ययवत् कृञोऽनुप्रयोगस्य |
|
1.3.64 |
प्रोपाभ्यां युजेरयज्ञपात्रेषु |
|
1.3.65 |
समः क्ष्णुवः |
|
1.3.66 |
भुजोऽनवने |
|
1.3.67 |
णेरणौ यत् कर्म णौ चेत् स कर्ताऽनाध्याने |
|
1.3.68 |
भीस्म्योर्हेतुभये |
|
1.3.69 |
गृधिवञ्च्योः प्रलम्भने |
|
1.3.70 |
लियः सम्माननशालिनीकरणयोश्च |
|
1.3.71 |
मिथ्योपपदात् कृञोऽभ्यासे |
|
1.3.72 |
स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले |
|
1.3.73 |
अपाद्वदः |
|
1.3.74 |
णिचश्च |
|
1.3.75 |
समुदाङ्भ्यो यमोऽग्रन्थे |
|
1.3.76 |
अनुपसर्गाज्ज्ञः |
|
1.3.77 |
विभाषोपपदेन प्रतीयमाने |
|
1.3.78 |
शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् |
|
1.3.79 |
अनुपराभ्यां कृञः |
|
1.3.80 |
अभिप्रत्यतिभ्यः क्षिपः |
|
1.3.81 |
प्राद्वहः |
|
1.3.82 |
परेर्मृषः |
|
1.3.83 |
व्याङ्परिभ्यो रमः |
|
1.3.84 |
उपाच्च |
|
1.3.85 |
विभाषाऽकर्मकात् |
|
1.3.86 |
बुधयुधनशजनेङ्प्रुद्रुस्रुभ्यो णेः |
|
1.3.87 |
निगरणचलनार्थेभ्यः |
|
1.3.88 |
अणावकर्मकाच्चित्तवत्कर्तृकात् |
|
1.3.89 |
न पादम्याङ्यमाङ्यसपरिमुहरुचिनृतिवदवसः |
|
1.3.90 |
वा क्यषः |
|
1.3.91 |
द्युद्भ्यो लुङि |
|
1.3.92 |
वृद्भ्यः स्यसनोः |
|
1.3.93 |
लुटि च कॢपः |
|
1.4.1 |
आ कडारादेका संज्ञा |
|
1.4.2 |
विप्रतिषेधे परं कार्यम् |
|
1.4.3 |
यू स्त्र्याख्यौ नदी |
|
1.4.4 |
नेयङुवङ्स्थानावस्त्री |
|
1.4.5 |
वाऽऽमि |
|
1.4.6 |
ङिति ह्रस्वश्च |
|
1.4.7 |
शेषो घ्यसखि |
|
1.4.8 |
पतिः समास एव |
|
1.4.9 |
षष्ठीयुक्तश्छन्दसि वा |
|
1.4.10 |
ह्रस्वं लघु |
|
1.4.11 |
संयोगे गुरु |
|
1.4.12 |
दीर्घं च |
|
1.4.13 |
यस्मात् प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम् |
|
1.4.14 |
सुप्तिङन्तं पदम् |
|
1.4.15 |
नः क्ये |
|
1.4.16 |
सिति च |
|
1.4.17 |
स्वादिष्वसर्वनामस्थाने |
|
1.4.18 |
यचि भम् |
|
1.4.19 |
तसौ मत्वर्थे |
|
1.4.20 |
अयस्मयादीनि च्छन्दसि |
|
1.4.21 |
बहुषु बहुवचनम् |
|
1.4.22 |
द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने |
|
1.4.23 |
कारके |
|
1.4.24 |
ध्रुवमपायेऽपादानम् |
|
1.4.25 |
भीत्रार्थानां भयहेतुः |
|
1.4.26 |
पराजेरसोढः |
|
1.4.27 |
वारणार्थानां ईप्सितः |
|
1.4.28 |
अन्तर्द्धौ येनादर्शनमिच्छति |
|
1.4.29 |
आख्यातोपयोगे |
|
1.4.30 |
जनिकर्तुः प्रकृतिः |
|
1.4.31 |
भुवः प्रभवः |
|
1.4.32 |
कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् |
|
1.4.33 |
रुच्यर्थानां प्रीयमाणः |
|
1.4.34 |
श्लाघह्नुङ्स्थाशपां ज्ञीप्स्यमानः |
|
1.4.35 |
धारेरुत्तमर्णः |
|
1.4.36 |
स्पृहेरीप्सितः |
|
1.4.37 |
क्रुधद्रुहेर्ष्याऽसूयार्थानां यं प्रति कोपः |
|
1.4.38 |
क्रुधद्रुहोरुपसृष्टयोः कर्म |
|
1.4.39 |
राधीक्ष्योर्यस्य विप्रश्नः |
|
1.4.40 |
प्रत्याङ्भ्यां श्रुवः पूर्वस्य कर्ता |
|
1.4.41 |
अनुप्रतिगृणश्च |
|
1.4.42 |
साधकतमं करणम् |
|
1.4.43 |
दिवः कर्म च |
|
1.4.44 |
परिक्रयणे सम्प्रदानमन्यतरस्याम् |
|
1.4.45 |
आधारोऽधिकरणम् |
|
1.4.46 |
अधिशीङ्स्थाऽऽसां कर्म |
|
1.4.47 |
अभिनिविशश्च |
|
1.4.48 |
उपान्वध्याङ्वसः |
|
1.4.49 |
कर्तुरीप्सिततमं कर्म |
|
1.4.50 |
तथायुक्तं चानिप्सीतम् |
|
1.4.51 |
अकथितं च |
|
1.4.52 |
गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता स णौ
|
1.4.53 |
हृक्रोरन्यतरस्याम् |
|
1.4.54 |
स्वतन्त्रः कर्ता |
|
1.4.55 |
तत्प्रयोजको हेतुश्च |
|
1.4.56 |
प्राग्रीश्वरान्निपाताः |
|
1.4.57 |
चादयोऽसत्त्वे |
|
1.4.58 |
प्रादयः |
|
1.4.59 |
उपसर्गाः क्रियायोगे |
|
1.4.60 |
गतिश्च |
|
1.4.61 |
ऊर्यादिच्विडाचश्च |
|
1.4.62 |
अनुकरणं चानितिपरम् |
|
1.4.63 |
आदरानादरयोः सदसती |
|
1.4.64 |
भूषणेऽलम् |
|
1.4.65 |
अन्तरपरिग्रहे |
|
1.4.66 |
कणेमनसी श्रद्धाप्रतीघाते |
|
1.4.67 |
पुरोऽव्ययम् |
|
1.4.68 |
अस्तं च |
|
1.4.69 |
अच्छ गत्यर्थवदेषु |
|
1.4.70 |
अदोऽनुपदेशे |
|
1.4.71 |
तिरोऽन्तर्द्धौ |
|
1.4.72 |
विभाषा कृञि |
|
1.4.73 |
उपाजेऽन्वाजे |
|
1.4.74 |
साक्षात्प्रभृतीनि च |
|
1.4.75 |
अनत्याधान उरसिमनसी |
|
1.4.76 |
मध्येपदेनिवचने च |
|
1.4.77 |
नित्यं हस्ते पाणावुपयमने |
|
1.4.78 |
प्राध्वं बन्धने |
|
1.4.79 |
जीविकोपनिषदावौपम्ये |
|
1.4.80 |
ते प्राग्धातोः |
|
1.4.81 |
छन्दसि परेऽपि |
|
1.4.82 |
व्यवहिताश्च |
|
1.4.83 |
कर्मप्रवचनीयाः |
|
1.4.84 |
अनुर्लक्षणे |
|
1.4.85 |
तृतीयाऽर्थे |
|
1.4.86 |
हीने |
|
1.4.87 |
उपोऽधिके च |
|
1.4.88 |
अपपरी वर्जने |
|
1.4.89 |
आङ् मर्यादावचने |
|
1.4.90 |
लक्षणेत्थम्भूताख्यानभागवीप्सासु प्रतिपर्यनवः |
|
1.4.91 |
अभिरभागे |
|
1.4.92 |
प्रतिः प्रतिनिधिप्रतिदानयोः |
|
1.4.93 |
अधिपरी अनर्थकौ |
|
1.4.94 |
सुः पूजायाम् |
|
1.4.95 |
अतिरतिक्रमणे च |
|
1.4.96 |
अपिः पदार्थसम्भावनान्ववसर्गगर्हासमुच्चयेषु |
|
1.4.97 |
अधिरीश्वरे |
|
1.4.98 |
विभाषा कृञि |
|
1.4.99 |
लः परस्मैपदम् |
|
1.4.100 |
तङानावात्मनेपदम् |
|
1.4.101 |
तिङस्त्रीणि त्रीणि प्रथममध्यमोत्तमाः |
|
1.4.102 |
तान्येकवचनद्विवचनबहुवचनान्येकशः |
|
1.4.103 |
सुपः |
|
1.4.104 |
विभक्तिश्च |
|
1.4.105 |
युष्मद्युपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः |
|
1.4.106 |
प्रहासे च मन्योपपदे मन्यतेरुत्तम एकवच्च |
|
1.4.107 |
अस्मद्युत्तमः |
|
1.4.108 |
शेषे प्रथमः |
|
1.4.109 |
परः संनिकर्षः संहिता |
|
1.4.110 |
विरामोऽवसानम् |
|
2.1.1 |
समर्थः पदविधिः |
|
2.1.2 |
सुबामन्त्रिते पराङ्गवत् स्वरे |
|
2.1.3 |
प्राक् कडारात् समासः |
|
2.1.4 |
सह सुपा |
|
2.1.5 |
अव्ययीभावः |
|
2.1.6 |
अव्ययं विभक्तिसमीपसमृद्धिव्यृद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रतिशब्दप्रादुर्भावपश्चाद्यथाऽऽनुपूर्व्ययौगपद्यसादृश्यसम्पत्तिसाकल्यान्तवचनेषु |
|
2.1.7 |
यथाऽसादृश्ये |
|
2.1.8 |
यावदवधारणे |
|
2.1.9 |
सुप्प्रतिना मात्राऽर्थे |
|
2.1.10 |
अक्षशलाकासंख्याः परिणा |
|
2.1.11 |
विभाषा |
|
2.1.12 |
अपपरिबहिरञ्चवः पञ्चम्या |
|
2.1.13 |
आङ् मर्यादाऽभिविध्योः |
|
2.1.14 |
लक्षणेनाभिप्रती आभिमुख्ये |
|
2.1.15 |
अनुर्यत्समया |
|
2.1.16 |
यस्य चायामः |
|
2.1.17 |
तिष्ठद्गुप्रभृतीनि च |
|
2.1.18 |
पारे मध्ये षष्ठ्या वा |
|
2.1.19 |
संख्या वंश्येन |
|
2.1.20 |
नदीभिश्च |
|
2.1.21 |
अन्यपदार्थे च संज्ञायाम् |
|
2.1.22 |
तत्पुरुषः |
|
2.1.23 |
द्विगुश्च |
|
2.1.24 |
द्वितीया श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः |
|
2.1.25 |
स्वयं क्तेन |
|
2.1.26 |
खट्वा क्षेपे |
|
2.1.27 |
सामि |
|
2.1.28 |
कालाः |
|
2.1.29 |
अत्यन्तसंयोगे च |
|
2.1.30 |
तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन |
|
2.1.31 |
पूर्वसदृशसमोनार्थकलहनिपुणमिश्रश्लक्ष्णैः |
|
2.1.32 |
कर्तृकरणे कृता बहुलम् |
|
2.1.33 |
कृत्यैरधिकार्थवचने |
|
2.1.34 |
अन्नेन व्यञ्जनम् |
|
2.1.35 |
भक्ष्येण मिश्रीकरणम् |
|
2.1.36 |
चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः |
|
2.1.37 |
पञ्चमी भयेन |
|
2.1.38 |
अपेतापोढमुक्तपतितापत्रस्तैरल्पशः |
|
2.1.39 |
स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन |
|
2.1.40 |
सप्तमी शौण्डैः |
|
2.1.41 |
सिद्धशुष्कपक्वबन्धैश्च |
|
2.1.42 |
ध्वाङ्क्षेण क्षेपे |
|
2.1.43 |
कृत्यैर्ऋणे |
|
2.1.44 |
संज्ञायाम् |
|
2.1.45 |
क्तेनाहोरात्रावयवाः |
|
2.1.46 |
तत्र |
|
2.1.47 |
क्षेपे |
|
2.1.48 |
पात्रेसमितादयश्च |
|
2.1.49 |
पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधिकरणेन |
|
2.1.50 |
दिक्संख्ये संज्ञायाम् |
|
2.1.51 |
तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च |
|
2.1.52 |
संख्यापूर्वो द्विगुः |
|
2.1.53 |
कुत्सितानि कुत्सनैः |
|
2.1.54 |
पापाणके कुत्सितैः |
|
2.1.55 |
उपमानानि सामान्यवचनैः |
|
2.1.56 |
उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे |
|
2.1.57 |
विशेषणं विशेष्येण बहुलम् |
|
2.1.58 |
पूर्वापरप्रथमचरमजघन्यसमानमध्यमध्यमवीराश्च |
|
2.1.59 |
श्रेण्यादयः कृतादिभिः |
|
2.1.60 |
क्तेन नञ्विशिष्टेनानञ् |
|
2.1.61 |
सन्महत्परमोत्तमोत्कृष्टाः पूज्यमानैः |
|
2.1.62 |
वृन्दारकनागकुञ्जरैः पूज्यमानम् |
|
2.1.63 |
कतरकतमौ जातिपरिप्रश्ने |
|
2.1.64 |
किं क्षेपे |
|
2.1.65 |
पोटायुवतिस्तोककतिपयगृष्टिधेनुवशावेहत्बष्कयणीप्रवक्तॄश्रोत्रियाध्यापकधूर्तैर्जातिः |
|
2.1.66 |
प्रशंसावचनैश्च |
|
2.1.67 |
युवा खलतिपलितवलिनजरतीभिः |
|
2.1.68 |
कृत्यतुल्याख्या अजात्या |
|
2.1.69 |
वर्णो वर्णेन |
|
2.1.70 |
कुमारः श्रमणाऽऽदिभिः |
|
2.1.71 |
चतुष्पादो गर्भिण्या |
|
2.1.72 |
मयूरव्यंसकादयश्च |
|
2.2.1 |
पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे |
|
2.2.2 |
अर्धं नपुंसकम् |
|
2.2.3 |
द्वितीयतृतीयचतुर्थतुर्याण्यन्यतरस्याम् |
|
2.2.4 |
प्राप्तापन्ने च द्वितीयया |
|
2.2.5 |
कालाः परिमाणिना |
|
2.2.6 |
नञ् |
|
2.2.7 |
ईषदकृता |
|
2.2.8 |
षष्ठी |
|
2.2.9 |
याजकादिभिश्च |
|
2.2.10 |
न निर्धारणे |
|
2.2.11 |
पूरणगुणसुहितार्थसदव्ययतव्यसमानाधिकरणेन |
|
2.2.12 |
क्तेन च पूजायाम् |
|
2.2.13 |
अधिकरणवाचिना च |
|
2.2.14 |
कर्म्मणि च |
|
2.2.15 |
तृजकाभ्यां कर्तरि |
|
2.2.16 |
कर्तरि च |
|
2.2.17 |
नित्यं क्रीडाजीविकयोः |
|
2.2.18 |
कुगतिप्रादयः |
|
2.2.19 |
उपपदमतिङ् |
|
2.2.20 |
अमैवाव्ययेन |
|
2.2.21 |
तृतीयाप्रभृतीन्यन्यतरस्याम् |
|
2.2.22 |
क्त्वा च |
|
2.2.23 |
शेषो बहुव्रीहिः |
|
2.2.24 |
अनेकमन्यपदार्थे |
|
2.2.25 |
संख्ययाऽव्ययासन्नादूराधिकसंख्याः संख्येये |
|
2.2.26 |
दिङ्नामान्यन्तराले |
|
2.2.27 |
तत्र तेनेदमिति सरूपे |
|
2.2.28 |
तेन सहेति तुल्ययोगे |
|
2.2.29 |
चार्थे द्वंद्वः |
|
2.2.30 |
उपसर्जनं पूर्वम् |
|
2.2.31 |
राजदन्तादिषु परम् |
|
2.2.32 |
द्वंद्वे घि |
|
2.2.33 |
अजाद्यदन्तम् |
|
2.2.34 |
अल्पाच्तरम् |
|
2.2.35 |
सप्तमीविशेषणे बहुव्रीहौ |
|
2.2.36 |
निष्ठा |
|
2.2.37 |
वाऽऽहिताग्न्यादिषु |
|
2.2.38 |
कडाराः कर्मधारये |
|
2.3.1 |
अनभिहिते |
|
2.3.2 |
कर्मणि द्वितीया |
|
2.3.3 |
तृतीया च होश्छन्दसि |
|
2.3.4 |
अन्तराऽन्तरेण युक्ते |
|
2.3.5 |
कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे |
|
2.3.6 |
अपवर्गे तृतीया |
|
2.3.7 |
सप्तमीपञ्चम्यौ कारकमध्ये |
|
2.3.8 |
कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया |
|
2.3.9 |
यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं तत्र सप्तमी |
|
2.3.10 |
पञ्चमी अपाङ्परिभिः |
|
2.3.11 |
प्रतिनिधिप्रतिदाने च यस्मात् |
|
2.3.12 |
गत्यर्थकर्मणि द्वितीयाचतुर्थ्यौ चेष्टायामनध्वनि |
|
2.3.13 |
चतुर्थी सम्प्रदाने |
|
2.3.14 |
क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः |
|
2.3.15 |
तुमर्थाच्च भाववचनात् |
|
2.3.16 |
नमःस्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च |
|
2.3.17 |
मन्यकर्मण्यनादरे विभाषाऽप्राणिषु |
|
2.3.18 |
कर्तृकरणयोस्तृतीया |
|
2.3.19 |
सहयुक्तेऽप्रधाने |
|
2.3.20 |
येनाङ्गविकारः |
|
2.3.21 |
इत्थंभूतलक्षणे |
|
2.3.22 |
संज्ञोऽन्यतरस्यां कर्मणि |
|
2.3.23 |
हेतौ |
|
2.3.24 |
अकर्तर्यृणे पञ्चमी |
|
2.3.25 |
विभाषा गुणेऽस्त्रियाम् |
|
2.3.26 |
षष्ठी हेतुप्रयोगे |
|
2.3.27 |
सर्वनाम्नस्तृतीया च |
|
2.3.28 |
अपादाने पञ्चमी |
|
2.3.29 |
अन्यारादितरर्त्तेदिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते |
|
2.3.30 |
षष्ठ्यतसर्थप्रत्ययेन |
|
2.3.31 |
एनपा द्वितीया |
|
2.3.32 |
पृथग्विनानानाभिस्तृतीयाऽन्यतरस्याम् |
|
2.3.33 |
करणे च स्तोकाल्पकृच्छ्रकतिपयस्यासत्त्ववचनस्य |
|
2.3.34 |
दूरान्तिकार्थैः षष्ठ्यन्यतरस्याम् |
|
2.3.35 |
दूरान्तिकार्थेभ्यो द्वितीया च |
|
2.3.36 |
सप्तम्यधिकरणे च |
|
2.3.37 |
यस्य च भावेन भावलक्षणम् |
|
2.3.38 |
षष्ठी चानादरे |
|
2.3.39 |
स्वामीश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतैश्च |
|
2.3.40 |
आयुक्तकुशलाभ्यां चासेवायाम् |
|
2.3.41 |
यतश्च निर्धारणम् |
|
2.3.42 |
पञ्चमी विभक्ते |
|
2.3.43 |
साधुनिपुणाभ्याम् अर्चायां सप्तम्यप्रतेः |
|
2.3.44 |
प्रसितोत्सुकाभ्यां तृतीया च |
|
2.3.45 |
नक्षत्रे च लुपि |
|
2.3.46 |
प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा |
|
2.3.47 |
सम्बोधने च |
|
2.3.48 |
साऽऽमन्त्रितम् |
|
2.3.49 |
एकवचनं संबुद्धिः |
|
2.3.50 |
षष्ठी शेषे |
|
2.3.51 |
ज्ञोऽविदर्थस्य करणे |
|
2.3.52 |
अधीगर्थदयेशां कर्मणि |
|
2.3.53 |
कृञः प्रतियत्ने |
|
2.3.54 |
रुजार्थानां भाववचनानामज्वरेः |
|
2.3.55 |
आशिषि नाथः |
|
2.3.56 |
जासिनिप्रहणनाटक्राथपिषां हिंसायाम् |
|
2.3.57 |
व्यवहृपणोः समर्थयोः |
|
2.3.58 |
दिवस्तदर्थस्य |
|
2.3.59 |
विभाषोपसर्गे |
|
2.3.60 |
द्वितीया ब्राह्मणे |
|
2.3.61 |
प्रेष्यब्रुवोर्हविषो देवतासम्प्रदाने |
|
2.3.62 |
चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि |
|
2.3.63 |
यजेश्च करणे |
|
2.3.64 |
कृत्वोऽर्थप्रयोगे कालेऽधिकरणे |
|
2.3.65 |
कर्तृकर्मणोः कृति |
|
2.3.66 |
उभयप्राप्तौ कर्मणि |
|
2.3.67 |
क्तस्य च वर्तमाने |
|
2.3.68 |
अधिकरणवाचिनश्च |
|
2.3.69 |
न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् |
|
2.3.70 |
अकेनोर्भविष्यदाधमर्ण्ययोः |
|
2.3.71 |
कृत्यानां कर्तरि वा |
|
2.3.72 |
तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयाऽन्यतरस्याम् |
|
2.3.73 |
चतुर्थी चाशिष्यायुष्यमद्रभद्रकुशलसुखार्थहितैः |
|
2.4.1 |
द्विगुरेकवचनम् |
|
2.4.2 |
द्वंद्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् |
|
2.4.3 |
अनुवादे चरणानाम् |
|
2.4.4 |
अध्वर्युक्रतुरनपुंसकम्. |
|
2.4.5 |
अध्ययनतोऽविप्रकृष्टाख्यानाम् |
|
2.4.6 |
जातिरप्राणिनाम् |
|
2.4.7 |
विशिष्टलिङ्गो नदी देशोऽग्रामाः |
|
2.4.8 |
क्षुद्रजन्तवः |
|
2.4.9 |
येषां च विरोधः शाश्वतिकः |
|
2.4.10 |
शूद्राणामनिरवसितानाम् |
|
2.4.11 |
गवाश्वप्रभृतीनि च |
|
2.4.12 |
विभाषा वृक्षमृगतृणधान्यव्यञ्जनपशुशकुन्यश्ववडवपूर्वापराधरोत्तराणाम् |
|
2.4.13 |
विप्रतिषिद्धं चानधिकरणवाचि |
|
2.4.14 |
न दधिपयआदीनि |
|
2.4.15 |
अधिकरणैतावत्त्वे च |
|
2.4.16 |
विभाषा समीपे |
|
2.4.17 |
स नपुंसकम् |
|
2.4.18 |
अव्ययीभावश्च |
|
2.4.19 |
तत्पुरुषोऽनञ्कर्मधारयः |
|
2.4.20 |
संज्ञायां कन्थोशीनरेषु |
|
2.4.21 |
उपज्ञोपक्रमं तदाद्याचिख्यासायाम् |
|
2.4.22 |
छाया बाहुल्ये |
|
2.4.23 |
सभा राजाऽमनुष्यपूर्वा |
|
2.4.24 |
अशाला च |
|
2.4.25 |
विभाषा सेनासुराछायाशालानिशानाम् |
|
2.4.26 |
परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः |
|
2.4.27 |
पूर्ववदश्ववडवौ |
|
2.4.28 |
हेमन्तशिशिरावहोरात्रे च च्छन्दसि |
|
2.4.29 |
रात्राह्नाहाः पुंसि |
|
2.4.30 |
अपथं नपुंसकम् |
|
2.4.31 |
अर्धर्चाः पुंसि च |
|
2.4.32 |
इदमोऽन्वादेशेऽशनुदात्तस्तृतीयाऽऽदौ |
|
2.4.33 |
एतदस्त्रतसोस्त्रतसौ चानुदात्तौ |
|
2.4.34 |
द्वितीयाटौस्स्वेनः |
|
2.4.35 |
आर्द्धधातुके |
|
2.4.36 |
अदो जग्धिर्ल्यप्ति किति |
|
2.4.37 |
लुङ्सनोर्घसॢ |
|
2.4.38 |
घञपोश्च |
|
2.4.39 |
बहुलं छन्दसि |
|
2.4.40 |
लिट्यन्यतरस्याम् |
|
2.4.41 |
वेञो वयिः |
|
2.4.42 |
हनो वध लिङि |
|
2.4.43 |
लुङि च |
|
2.4.44 |
आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम् |
|
2.4.45 |
इणो गा लुङि |
|
2.4.46 |
णौ गमिरबोधने |
|
2.4.47 |
सनि च |
|
2.4.48 |
इङश्च |
|
2.4.49 |
गाङ् लिटि |
|
2.4.50 |
विभाषा लुङ्लृङोः |
|
2.4.51 |
णौ च सँश्चङोः |
|
2.4.52 |
अस्तेर्भूः |
|
2.4.53 |
ब्रुवो वचिः |
|
2.4.54 |
चक्षिङः ख्याञ् |
|
2.4.55 |
वा लिटि |
|
2.4.56 |
अजेर्व्यघञपोः |
|
2.4.57 |
वा यौ |
|
2.4.58 |
ण्यक्षत्रियार्षञितो यूनि लुगणिञोः |
|
2.4.59 |
पैलादिभ्यश्च |
|
2.4.60 |
इञः प्राचाम् |
|
2.4.61 |
न तौल्वलिभ्यः |
|
2.4.62 |
तद्राजस्य बहुषु तेनैवास्त्रियाम् |
|
2.4.63 |
यस्कादिभ्यो गोत्रे |
|
2.4.64 |
यञञोश्च |
|
2.4.65 |
अत्रिभृगुकुत्सवसिष्ठगोतमाङ्गिरोभ्यश्च |
|
2.4.66 |
बह्वचः इञः प्राच्यभरतेषु |
|
2.4.67 |
न गोपवनादिभ्यः |
|
2.4.68 |
तिककितवादिभ्यो द्वंद्वे |
|
2.4.69 |
उपकादिभ्योऽन्यतरस्यामद्वंद्वे |
|
2.4.70 |
आगस्त्यकौण्डिन्ययोरगस्तिकुण्डिनच् |
|
2.4.71 |
सुपो धातुप्रातिपदिकयोः |
|
2.4.72 |
अदिप्रभृतिभ्यः शपः |
|
2.4.73 |
बहुलं छन्दसि |
|
2.4.74 |
यङोऽचि च |
|
2.4.75 |
जुहोत्यादिभ्यः श्लुः |
|
2.4.76 |
बहुलं छन्दसि |
|
2.4.77 |
गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु |
|
2.4.78 |
विभाषा घ्राधेट्शाच्छासः |
|
2.4.79 |
तनादिभ्यस्तथासोः |
|
2.4.80 |
मन्त्रे घसह्वरणशवृदहाद्वृच्कृगमिजनिभ्यो लेः |
|
2.4.81 |
आमः |
|
2.4.82 |
अव्ययादाप्सुपः |
|
2.4.83 |
नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः |
|
2.4.84 |
तृतीयासप्तम्योर्बहुलम् |
|
2.4.85 |
लुटः प्रथमस्य डारौरसः |
|
3.1.1 |
प्रत्ययः |
|
3.1.2 |
परः च |
|
3.1.3 |
आद्युदात्तश्च |
|
3.1.4 |
अनुदात्तौ सुप्पितौ |
|
3.1.5 |
गुप्तिज्किद्भ्यः सन् |
|
3.1.6 |
मान्बधदान्शान्भ्यो दीर्घश्चाभ्यासस्य |
|
3.1.7 |
धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा |
|
3.1.8 |
सुप आत्मनः क्यच् |
|
3.1.9 |
काम्यच्च |
|
3.1.10 |
उपमानादाचारे |
|
3.1.11 |
कर्तुः क्यङ् सलोपश्च |
|
3.1.12 |
भृशादिभ्यो भुव्यच्वेर्लोपश्च हलः |
|
3.1.13 |
लोहितादिडाज्भ्यः क्यष्|
|
3.1.14 |
कष्टाय क्रमणे |
|
3.1.15 |
कर्मणः रोमन्थतपोभ्यां वर्तिचरोः |
|
3.1.16 |
बाष्पोष्माभ्यां उद्वमने |
|
3.1.17 |
शब्दवैरकलहाभ्रकण्वमेघेभ्यः करणे |
|
3.1.18 |
सुखादिभ्यः कर्तृवेदनायाम् |
|
3.1.19 |
नमोवरिवश्चित्रङः क्यच् |
|
3.1.20 |
पुच्छभाण्डचीवराण्णिङ् |
|
3.1.21 |
मुण्डमिश्रश्लक्ष्णलवणव्रतवस्त्रहलकलकृततूस्तेभ्यो
|
3.1.22 |
धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् |
|
3.1.23 |
नित्यं कौटिल्ये गतौ |
|
3.1.24 |
लुपसदचरजपजभदहदशगॄभ्यो भावगर्हायाम् |
|
3.1.25 |
सत्यापपाशरूपवीणातूलश्लोकसेनालोमत्वचवर्मवर्णचूर्णचुरादिभ्यो णिच् |
|
3.1.26 |
हेतुमति च |
|
3.1.27 |
कण्ड्वादिभ्यो यक् |
|
3.1.28 |
गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्य आयः |
|
3.1.29 |
ऋतेरीयङ् |
|
3.1.30 |
कमेर्णिङ् |
|
3.1.31 |
आयादय आर्धधातुके वा |
|
3.1.32 |
सनाद्यन्ता धातवः |
|
3.1.33 |
स्यतासी लृलुटोः |
|
3.1.34 |
सिब्बहुलं लेटि |
|
3.1.35 |
कास्प्रत्ययादाममन्त्रे लिटि |
|
3.1.36 |
इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः |
|
3.1.37 |
दयायासश्च |
|
3.1.38 |
उषविदजागृभ्योऽन्यतरस्याम् |
|
3.1.39 |
भीह्रीभृहुवां श्लुवच्च |
|
3.1.40 |
कृञ् चानुप्रयुज्यते लिटि |
|
3.1.41 |
विदाङ्कुर्वन्त्वित्यन्यतरस्याम् |
|
3.1.42 |
अभ्युत्सादयांप्रजनयांचिकयांरमयामकः पावयांक्रियाद्विदामक्रन्नितिच्छन्दसि
|
3.1.43 |
च्लि लुङि |
|
3.1.44 |
च्लेः सिच् |
|
3.1.45 |
शल इगुपधादनिटः क्सः |
|
3.1.46 |
श्लिष आलिङ्गने |
|
3.1.47 |
न दृशः |
|
3.1.48 |
णिश्रिद्रुस्रुभ्यः कर्तरि चङ् |
|
3.1.49 |
विभाषा धेट्श्व्योः |
|
3.1.50 |
गुपेश्छन्दसि |
|
3.1.51 |
नोनयतिध्वनयत्येलयत्यर्दयतिभ्यः |
|
3.1.52 |
अस्यतिवक्तिख्यातिभ्यः अङ् |
|
3.1.53 |
लिपिसिचिह्वश्च |
|
3.1.54 |
आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम् |
|
3.1.55 |
पुषादिद्युताद्यॢदितः परस्मैपदेषु |
|
3.1.56 |
सर्त्तिशास्त्यर्तिभ्यश्च |
|
3.1.57 |
इरितो वा |
|
3.1.58 |
जृस्तम्भुम्रुचुम्लुचुग्रुचुग्लुचुग्लुञ्चुश्विभ्यश्च |
|
3.1.59 |
कृमृदृरुहिभ्यश्छन्दसि |
|
3.1.60 |
चिण् ते पदः |
|
3.1.61 |
दीपजनबुधपूरितायिप्यायिभ्योऽन्यतरस्याम् |
|
3.1.62 |
अचः कर्मकर्तरि |
|
3.1.63 |
दुहश्च |
|
3.1.64 |
न रुधः |
|
3.1.65 |
तपोऽनुतापे च |
|
3.1.66 |
चिण् भावकर्मणोः |
|
3.1.67 |
सार्वधातुके यक् |
|
3.1.68 |
कर्तरि शप् |
|
3.1.69 |
दिवादिभ्यः श्यन् |
|
3.1.70 |
वा भ्राशभ्लाशभ्रमुक्रमुक्लमुत्रसित्रुटिलषः |
|
3.1.71 |
यसोऽनुपसर्गात् |
|
3.1.72 |
संयसश्च |
|
3.1.73 |
स्वादिभ्यः श्नुः |
|
3.1.74 |
श्रुवः शृ च |
|
3.1.75 |
अक्षोऽन्यतरस्याम् |
|
3.1.76 |
तनूकरणे तक्षः |
|
3.1.77 |
तुदादिभ्यः शः |
|
3.1.78 |
रुधादिभ्यः श्नम् |
|
3.1.79 |
तनादिकृञ्भ्य उः |
|
3.1.80 |
धिन्विकृण्व्योर च |
|
3.1.81 |
क्र्यादिभ्यः श्ना |
|
3.1.82 |
स्तम्भुस्तुम्भुस्कम्भुस्कुम्भुस्कुञ्भ्यः श्नुश्च |
|
3.1.83 |
हलः श्नः शानज्झौ |
|
3.1.84 |
छन्दसि शायजपि |
|
3.1.85 |
व्यत्ययो बहुलम् |
|
3.1.86 |
लिङ्याशिष्यङ् |
|
3.1.87 |
कर्मवत् कर्मणा तुल्यक्रियः |
|
3.1.88 |
तपस्तपःकर्मकस्यैव |
|
3.1.89 |
न दुहस्नुनमां यक्चिणौ |
|
3.1.90 |
कुषिरजोः प्राचां श्यन् परस्मैपदं च |
|
3.1.91 |
धातोः |
|
3.1.92 |
तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् |
|
3.1.93 |
कृदतिङ् |
|
3.1.94 |
वाऽसरूपोऽस्त्रियाम् |
|
3.1.95 |
कृत्याः प्राङ् ण्वुलः |
|
3.1.96 |
तव्यत्तव्यानीयरः |
|
3.1.97 |
अचो यत् |
|
3.1.98 |
पोरदुपधात् |
|
3.1.99 |
शकिसहोश्च |
|
3.1.100 |
गदमदचरयमश्चानुपसर्गे |
|
3.1.101 |
अवद्यपण्यवर्या गर्ह्यपणितव्यानिरोधेषु |
|
3.1.102 |
वह्यं करणम् |
|
3.1.103 |
अर्यः स्वामिवैश्ययोः |
|
3.1.104 |
उपसर्या काल्या प्रजने |
|
3.1.105 |
अजर्यं संगतम् |
|
3.1.106 |
वदः सुपि क्यप् च |
|
3.1.107 |
भुवो भावे |
|
3.1.108 |
हनस्त च |
|
3.1.109 |
एतिस्तुशस्वृदृजुषः क्यप् |
|
3.1.110 |
ऋदुपधाच्चाकॢपिचृतेः |
|
3.1.111 |
ई च खनः |
|
3.1.112 |
भृञोऽसंज्ञायाम् |
|
3.1.113 |
मृजेर्विभाषा |
|
3.1.114 |
राजसूयसूर्यमृषोद्यरुच्यकुप्यकृष्टपच्याव्यथ्याः
|
3.1.115 |
भिद्योद्ध्यौ नदे |
|
3.1.116 |
पुष्यसिद्ध्यौ नक्षत्रे |
|
3.1.117 |
विपूयविनीयजित्या मुञ्जकल्कहलिषु |
|
3.1.118 |
प्रत्यपिभ्यां ग्रहेश्छन्दसि |
|
3.1.119 |
पदास्वैरिबाह्यापक्ष्येषु च |
|
3.1.120 |
विभाषा कृवृषोः |
|
3.1.121 |
युग्यं च पत्त्रे |
|
3.1.122 |
अमावस्यदन्यतरस्याम् |
|
3.1.123 |
छन्दसि निष्टर्क्यदेवहूयप्रणीयोन्नीयोच्छिष्यमर्यस्तर्याध्वर्यखन्यखान्यदेवयज्याऽऽपृच्छ्यप्रतिषीव्यब्रह्मवाद्यभाव्यस्ताव्योपचाय्यपृडानि
|
3.1.124 |
ऋहलोर्ण्यत् |
|
3.1.125 |
ओरावश्यके |
|
3.1.126 |
आसुयुवपिरपिलपित्रपिचमश्च |
|
3.1.127 |
आनाय्योऽनित्ये |
|
3.1.128 |
प्रणाय्योऽसंमतौ |
|
3.1.129 |
पाय्यसान्नाय्यनिकाय्यधाय्या मानहविर्निवाससामिधेनीषु |
|
3.1.130 |
क्रतौ कुण्डपाय्यसंचाय्यौ |
|
3.1.131 |
अग्नौ परिचाय्योपचाय्यसमूह्याः |
|
3.1.132 |
चित्याग्निचित्ये च |
|
3.1.133 |
ण्वुल्तृचौ |
|
3.1.134 |
नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः |
|
3.1.135 |
इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः |
|
3.1.136 |
आतश्चोपसर्गे |
|
3.1.137 |
पाघ्राध्माधेट्दृशः शः |
|
3.1.138 |
अनुपसर्गाल्लिम्पविन्दधारिपारिवेद्युदेजिचेतिसातिसाहिभ्यश्च |
|
3.1.139 |
ददातिदधात्योर्विभाषा |
|
3.1.140 |
ज्वलितिकसन्तेभ्यो णः |
|
3.1.141 |
श्याऽऽद्व्यधास्रुसंस्र्वतीणवसाऽवहृलिहश्लिषश्वसश्च |
|
3.1.142 |
दुन्योरनुपसर्गे |
|
3.1.143 |
विभाषा ग्रहेः |
|
3.1.144 |
गेहे कः |
|
3.1.145 |
शिल्पिनि ष्वुन् |
|
3.1.146 |
गस्थकन् |
|
3.1.147 |
ण्युट् च |
|
3.1.148 |
हश्च व्रीहिकालयोः |
|
3.1.149 |
प्रुसृल्वः समभिहारे वुन् |
|
3.1.150 |
आशिषि च |
|
3.2.1 |
कर्मण्यण् |
|
3.2.2 |
ह्वावामश्च |
|
3.2.3 |
आतोऽनुपसर्गे कः |
|
3.2.4 |
सुपि स्थः |
|
3.2.5 |
तुन्दशोकयोः परिमृजापनुदोः |
|
3.2.6 |
प्रे दाज्ञः |
|
3.2.7 |
समि ख्यः |
|
3.2.8 |
गापोष्टक् |
|
3.2.9 |
हरतेरनुद्यमनेऽच् |
|
3.2.10 |
वयसि च |
|
3.2.11 |
आङि ताच्छील्ये |
|
3.2.12 |
अर्हः |
|
3.2.13 |
स्तम्बकर्णयोः रमिजपोः |
|
3.2.14 |
शमि धातोः संज्ञायाम् |
|
3.2.15 |
अधिकरणे शेतेः |
|
3.2.16 |
चरेष्टः |
|
3.2.17 |
भिक्षासेनाऽऽदायेषु च |
|
3.2.18 |
पुरोऽग्रतोऽग्रेषु सर्तेः |
|
3.2.19 |
पूर्वे कर्तरि |
|
3.2.20 |
कृञो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु |
|
3.2.21 |
दिवाविभानिशाप्रभाभास्करान्तानन्तादिबहुनान्दीकिम्लिपिलिबिबलिभक्तिकर्तृचित्रक्षेत्रसंख्याजङ्घाबाह्वहर्यत्तत्धनुररुष्षु |
|
3.2.22 |
कर्मणि भृतौ |
|
3.2.23 |
न शब्दश्लोककलहगाथावैरचाटुसूत्रमन्त्रपदेषु |
|
3.2.24 |
स्तम्बशकृतोरिन् |
|
3.2.25 |
हरतेर्दृतिनाथयोः पशौ |
|
3.2.26 |
फलेग्रहिरात्मम्भरिश्च |
|
3.2.27 |
छन्दसि वनसनरक्षिमथाम् |
|
3.2.28 |
एजेः खश् |
|
3.2.29 |
नासिकास्तनयोर्ध्माधेटोः |
|
3.2.30 |
नाडीमुष्ट्योश्च |
|
3.2.31 |
उदि कूले रुजिवहोः |
|
3.2.32 |
वहाभ्रे लिहः |
|
3.2.33 |
परिमाणे पचः |
|
3.2.34 |
मितनखे च |
|
3.2.35 |
विध्वरुषोः तुदः |
|
3.2.36 |
असूर्यललाटयोर्दृशितपोः |
|
3.2.37 |
उग्रम्पश्येरम्मदपाणिन्धमाश्च |
|
3.2.38 |
प्रियवशे वदः खच् |
|
3.2.39 |
द्विषत्परयोस्तापेः |
|
3.2.40 |
वाचि यमो व्रते |
|
3.2.41 |
पूःसर्वयोर्दारिसहोः |
|
3.2.42 |
सर्वकूलाभ्रकरीषेषु कषः |
|
3.2.43 |
मेघर्तिभयेषु कृञः |
|
3.2.44 |
क्षेमप्रियमद्रेऽण् च |
|
3.2.45 |
आशिते भुवः करणभावयोः |
|
3.2.46 |
संज्ञायां भृतॄवृजिधारिसहितपिदमः |
|
3.2.47 |
गमश्च |
|
3.2.48 |
अन्तात्यन्ताध्वदूरपारसर्वानन्तेषु डः |
|
3.2.49 |
आशिषि हनः |
|
3.2.50 |
अपे क्लेशतमसोः |
|
3.2.51 |
कुमारशीर्षयोर्णिनिः |
|
3.2.52 |
लक्षणे जायापत्योष्टक् |
|
3.2.53 |
अमनुष्यकर्तृके च |
|
3.2.54 |
शक्तौ हस्तिकपाटयोः |
|
3.2.55 |
पाणिघताडघौ शिल्पिनि |
|
3.2.56 |
आढ्यसुभगस्थूलपलितनग्नान्धप्रियेषु च्व्यर्थेष्वच्वौ कृञः करणे ख्युन् |
|
3.2.57 |
कर्तरि भुवः खिष्णुच्खुकञौ |
|
3.2.58 |
स्पृशोऽनुदके क्विन् |
|
3.2.59 |
ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिगुष्णिगञ्चुयुजिक्रुञ्चां च ।
|
3.2.60 |
त्यदादिषु दृशोऽनालोचने कञ् च |
|
3.2.61 |
सत्सूद्विषद्रुहदुहयुजविदभिदच्छिदजिनीराजामुपसर्गेऽपि क्विँप् |
|
3.2.62 |
भजो ण्विः |
|
3.2.63 |
छन्दसि सहः |
|
3.2.64 |
वहश्च |
|
3.2.65 |
कव्यपुरीषपुरीष्येषु ञ्युट् |
|
3.2.66 |
हव्येऽनन्तः पादम् |
|
3.2.67 |
जनसनखनक्रमगमो विट् |
|
3.2.68 |
अदोऽनन्ने |
|
3.2.69 |
क्रव्ये च |
|
3.2.70 |
दुहः कब् घश्च |
|
3.2.71 |
मन्त्रे श्वेतवहौक्थशस्पुरोडाशो ण्विन् |
|
3.2.72 |
अवे यजः |
|
3.2.73 |
विजुपे छन्दसि |
|
3.2.74 |
आतो मनिन्क्वनिप्वनिपश्च |
|
3.2.75 |
अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते |
|
3.2.76 |
क्विँप् च |
|
3.2.77 |
स्थः क च |
|
3.2.78 |
सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छिल्ये |
|
3.2.79 |
कर्तर्युपमाने |
|
3.2.80 |
व्रते |
|
3.2.81 |
बहुलमाभीक्ष्ण्ये |
|
3.2.82 |
मनः |
|
3.2.83 |
आत्ममाने खश्च |
|
3.2.84 |
भूते |
|
3.2.85 |
करणे यजः |
|
3.2.86 |
कर्मणि हनः |
|
3.2.87 |
ब्रह्मभ्रूणवृत्रेषु क्विँप् |
|
3.2.88 |
बहुलं छन्दसि |
|
3.2.89 |
सुकर्मपापमन्त्रपुण्येषु कृञः |
|
3.2.90 |
सोमे सुञः |
|
3.2.91 |
अग्नौ चेः |
|
3.2.92 |
कर्मण्यग्न्याख्यायाम् |
|
3.2.93 |
कर्मणीनिर्विक्रियः |
|
3.2.94 |
दृशेः क्वनिप् |
|
3.2.95 |
राजनि युधिकृञः |
|
3.2.96 |
सहे च |
|
3.2.97 |
सप्तम्यां जनेर्डः |
|
3.2.98 |
पञ्चम्यामजातौ |
|
3.2.99 |
उपसर्गे च संज्ञायाम् |
|
3.2.100 |
अनौ कर्मणि |
|
3.2.101 |
अन्येष्वपि दृश्यते |
|
3.2.102 |
निष्ठा |
|
3.2.103 |
सुयजोर्ङ्वनिप् |
|
3.2.104 |
जीर्यतेरतृन् |
|
3.2.105 |
छन्दसि लिट् |
|
3.2.106 |
लिटः कानज्वा |
|
3.2.107 |
क्वसुश्च |
|
3.2.108 |
भाषायां सदवसश्रुवः |
|
3.2.109 |
उपेयिवाननाश्वाननूचानश्च |
|
3.2.110 |
लुङ् |
|
3.2.111 |
अनद्यतने लङ् |
|
3.2.112 |
अभिज्ञावचने लृट् |
|
3.2.113 |
न यदि |
|
3.2.114 |
विभाषा साकाङ्क्षे |
|
3.2.115 |
परोक्षे लिट् |
|
3.2.116 |
हशश्वतोर्लङ् च |
|
3.2.117 |
प्रश्ने चासन्नकाले |
|
3.2.118 |
लट् स्मे |
|
3.2.119 |
अपरोक्षे च |
|
3.2.120 |
ननौ पृष्टप्रतिवचने |
|
3.2.121 |
नन्वोर्विभाषा |
|
3.2.122 |
पुरि लुङ् चास्मे |
|
3.2.123 |
वर्तमाने लट् |
|
3.2.124 |
लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे |
|
3.2.125 |
सम्बोधने च |
|
3.2.126 |
लक्षणहेत्वोः क्रियायाः |
|
3.2.127 |
तौ सत् |
|
3.2.128 |
पूङ्यजोः शानन् |
|
3.2.129 |
ताच्छील्यवयोवचनशक्तिषु चानश् |
|
3.2.130 |
इङ्धार्योः शत्रकृच्छ्रिणि |
|
3.2.131 |
द्विषोऽमित्रे |
|
3.2.132 |
सुञो यज्ञसंयोगे |
|
3.2.133 |
अर्हः पूजायाम् |
|
3.2.134 |
आक्वेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु |
|
3.2.135 |
तृन् |
|
3.2.136 |
अलंकृञ्निराकृञ्प्रजनोत्पचोत्पतोन्मदरुच्यपत्रपवृतुवृधुसहचर इष्णुच् |
|
3.2.137 |
णेश्छन्दसि |
|
3.2.138 |
भुवश्च |
|
3.2.139 |
ग्लाजिस्थश्च क्स्नुः |
|
3.2.140 |
त्रसिगृधिधृषिक्षिपेः क्नुः |
|
3.2.141 |
शमित्यष्टाभ्यो घिनुँण् |
|
3.2.142 |
संपृचानुरुधाङ्यमाङ्यसपरिसृसंसृजपरिदेविसंज्वरपरिक्षिपपरिरटपरिवदपरिदहपरिमुहदुषद्विषद्रुहदुहयुजाक्रीडविविचत्यजरजभजातिचरापचरामुषाभ्याहनश्च |
|
3.2.143 |
वौ कषलसकत्थस्रम्भः |
|
3.2.144 |
अपे च लषः |
|
3.2.145 |
प्रे लपसृद्रुमथवदवसः |
|
3.2.146 |
निन्दहिंसक्लिशखादविनाशपरिक्षिपपरिरटपरिवादिव्याभाषासूञो वुञ् |
|
3.2.147 |
देविक्रुशोश्चोपसर्गे |
|
3.2.148 |
चलनशब्दार्थादकर्मकाद्युच् |
|
3.2.149 |
अनुदात्तेतश्च हलादेः |
|
3.2.150 |
जुचङ्क्रम्यदन्द्रम्यसृगृधिज्वलशुचलषपतपदः |
|
3.2.151 |
क्रुधमण्डार्थेभ्यश्च |
|
3.2.152 |
न यः |
|
3.2.153 |
सूददीपदीक्षश्च |
|
3.2.154 |
लषपतपदस्थाभूवृषहनकमगमशॄभ्य उकञ् |
|
3.2.155 |
जल्पभिक्षकुट्टलुण्टवृङः षाकन् |
|
3.2.156 |
प्रजोरिनिः |
|
3.2.157 |
जिदृक्षिविश्रीण्वमाव्यथाभ्यमपरिभूप्रसूभ्यश्च |
|
3.2.158 |
स्पृहिगृहिपतिदयिनिद्रातन्द्राश्रद्धाभ्य आलुच् |
|
3.2.159 |
दाधेट्सिशदसदो रुः |
|
3.2.160 |
सृघस्यदः क्मरच् |
|
3.2.161 |
भञ्जभासमिदो घुरच् |
|
3.2.162 |
विदिभिदिच्छिदेः कुरच् |
|
3.2.163 |
इण्नश्जिसर्त्तिभ्यः क्वरप् |
|
3.2.164 |
गत्वरश्च |
|
3.2.165 |
जागुरूकः |
|
3.2.166 |
यजजपदशां यङः |
|
3.2.167 |
नमिकम्पिस्म्यजसकमहिंसदीपो रः |
|
3.2.168 |
सनाशंसभिक्ष उः |
|
3.2.169 |
विन्दुरिच्छुः |
|
3.2.170 |
क्याच्छन्दसि |
|
3.2.171 |
आदृगमहनजनः किकिनौ लिट् च |
|
3.2.172 |
स्वपितृषोर्नजिङ् |
|
3.2.173 |
शॄवन्द्योरारुः |
|
3.2.174 |
भियः क्रुक्लुकनौ |
|
3.2.175 |
स्थेशभासपिसकसो वरच् |
|
3.2.176 |
यश्च यङः |
|
3.2.177 |
भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जिपॄजुग्रावस्तुवः क्विँप् |
|
3.2.178 |
अन्येभ्योऽपि दृश्यते |
|
3.2.179 |
भुवः संज्ञाऽन्तरयोः |
|
3.2.180 |
विप्रसम्भ्यो ड्वसंज्ञायाम् |
|
3.2.181 |
धः कर्मणि ष्ट्रन् |
|
3.2.182 |
दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे |
|
3.2.183 |
हलसूकरयोः पुवः |
|
3.2.184 |
अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः |
|
3.2.185 |
पुवः संज्ञायाम् |
|
3.2.186 |
कर्तरि चर्षिदेवतयोः |
|
3.2.187 |
ञीतः क्तः |
|
3.2.188 |
मतिबुद्धिपूजार्थेभ्यश्च |
|
3.3.1 |
उणादयो बहुलम् |
|
3.3.2 |
भूतेऽपि दृश्यन्ते |
|
3.3.3 |
भविष्यति गम्यादयः |
|
3.3.4 |
यावत्पुरानिपातयोर्लट् |
|
3.3.5 |
विभाषा कदाकर्ह्योः |
|
3.3.6 |
किंवृत्ते लिप्सायाम् |
|
3.3.7 |
लिप्स्यमानसिद्धौ च |
|
3.3.8 |
लोडर्थलक्षणे च |
|
3.3.9 |
लिङ् चोर्ध्वमौहूर्तिके |
|
3.3.10 |
तुमुँन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम् |
|
3.3.11 |
भाववचनाश्च |
|
3.3.12 |
अण् कर्मणि च |
|
3.3.13 |
लृट् शेषे च |
|
3.3.14 |
लृटः सद् वा |
|
3.3.15 |
अनद्यतने लुट् |
|
3.3.16 |
पदरुजविशस्पृशो घञ् |
|
3.3.17 |
सृ स्थिरे |
|
3.3.18 |
भावे |
|
3.3.19 |
अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् |
|
3.3.20 |
परिमाणाख्यायां सर्वेभ्यः |
|
3.3.21 |
इङश्च |
|
3.3.22 |
उपसर्गे रुवः |
|
3.3.23 |
समि युद्रुदुवः |
|
3.3.24 |
श्रिणीभुवोऽनुपसर्गे |
|
3.3.25 |
वौ क्षुश्रुवः |
|
3.3.26 |
अवोदोर्नियः |
|
3.3.27 |
प्रे द्रुस्तुस्रुवः |
|
3.3.28 |
निरभ्योः पूल्वोः |
|
3.3.29 |
उन्न्योर्ग्रः |
|
3.3.30 |
कॄ धान्ये |
|
3.3.31 |
यज्ञे समि स्तुवः |
|
3.3.32 |
प्रे स्त्रोऽयज्ञे |
|
3.3.33 |
प्रथने वावशब्दे |
|
3.3.34 |
छन्दोनाम्नि च |
|
3.3.35 |
उदि ग्रहः |
|
3.3.36 |
समि मुष्टौ |
|
3.3.37 |
परिन्योर्नीणोर्द्यूताभ्रेषयोः |
|
3.3.38 |
परावनुपात्यय इणः |
|
3.3.39 |
व्युपयोः शेतेः पर्याये |
|
3.3.40 |
हस्तादाने चेरस्तेये |
|
3.3.41 |
निवासचितिशरीरोपसमाधानेष्वादेश्च कः |
|
3.3.42 |
संघे चानौत्तराधर्ये |
|
3.3.43 |
कर्मव्यतिहारे णच् स्त्रियाम् |
|
3.3.44 |
अभिविधौ भाव इनुण् |
|
3.3.45 |
आक्रोशेऽवन्योर्ग्रहः |
|
3.3.46 |
प्रे लिप्सायाम् |
|
3.3.47 |
परौ यज्ञे |
|
3.3.48 |
नौ वृ धान्ये |
|
3.3.49 |
उदि श्रयतियौतिपूद्रुवः |
|
3.3.50 |
विभाषाऽऽङि रुप्लुवोः |
|
3.3.51 |
अवे ग्रहो वर्षप्रतिबन्धे |
|
3.3.52 |
प्रे वणिजाम् |
|
3.3.53 |
रश्मौ च |
|
3.3.54 |
वृणोतेराच्छादने |
|
3.3.55 |
परौ भुवोऽवज्ञाने |
|
3.3.56 |
एरच् |
|
3.3.57 |
ॠदोरप् |
|
3.3.58 |
ग्रहवृदृनिश्चिगमश्च |
|
3.3.59 |
उपसर्गेऽदः |
|
3.3.60 |
नौ ण च |
|
3.3.61 |
व्यधजपोरनुपसर्गे |
|
3.3.62 |
स्वनहसोर्वा |
|
3.3.63 |
यमः समुपनिविषु |
|
3.3.64 |
नौ गदनदपठस्वनः |
|
3.3.65 |
क्वणो वीणायां च |
|
3.3.66 |
नित्यं पणः परिमाणे |
|
3.3.67 |
मदोऽनुपसर्गे |
|
3.3.68 |
प्रमदसम्मदौ हर्षे |
|
3.3.69 |
समुदोरजः पशुषु |
|
3.3.70 |
अक्षेषु ग्लहः |
|
3.3.71 |
प्रजने सर्तेः |
|
3.3.72 |
ह्वः सम्प्रसारणं च न्यभ्युपविषु |
|
3.3.73 |
आङि युद्धे |
|
3.3.74 |
निपानमाहावः |
|
3.3.75 |
भावेऽनुपसर्गस्य |
|
3.3.76 |
हनश्च वधः |
|
3.3.77 |
मूर्तौ घनः |
|
3.3.78 |
अन्तर्घनो देशे |
|
3.3.79 |
अगारैकदेशे प्रघणः प्रघाणश्च |
|
3.3.80 |
उद्घनोऽत्याधानम् |
|
3.3.81 |
अपघनोऽङ्गम् |
|
3.3.82 |
करणेऽयोविद्रुषु |
|
3.3.83 |
स्तम्बे क च |
|
3.3.84 |
परौ घः |
|
3.3.85 |
उपघ्न आश्रये |
|
3.3.86 |
संघोद्घौ गणप्रशंसयोः |
|
3.3.87 |
निघो निमितम् |
|
3.3.88 |
ड्वितः क्त्रिः |
|
3.3.89 |
ट्वितोऽथुच् |
|
3.3.90 |
यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ् |
|
3.3.91 |
स्वपो नन् |
|
3.3.92 |
उपसर्गे घोः किः |
|
3.3.93 |
कर्मण्यधिकरणे च |
|
3.3.94 |
स्त्रियां क्तिन् |
|
3.3.95 |
स्थागापापचां भावे |
|
3.3.96 |
मन्त्रे वृषेषपचमनविदभूवीरा उदात्तः |
|
3.3.97 |
ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च |
|
3.3.98 |
व्रजयजोर्भावे क्यप् |
|
3.3.99 |
संज्ञायां समजनिषदनिपतमनविदषुञ्शीङ्भृञिणः |
|
3.3.100 |
कृञः श च |
|
3.3.101 |
इच्छा |
|
3.3.102 |
अ प्रत्ययात् |
|
3.3.103 |
गुरोश्च हलः |
|
3.3.104 |
षिद्भिदादिभ्योऽङ् |
|
3.3.105 |
चिन्तिपूजिकथिकुम्बिचर्चश्च |
|
3.3.106 |
आतश्चोपसर्गे |
|
3.3.107 |
ण्यासश्रन्थो युच् |
|
3.3.108 |
रोगाख्यायां ण्वुल् बहुलम् |
|
3.3.109 |
संज्ञायाम् |
|
3.3.110 |
विभाषाऽऽख्यानपरिप्रश्नयोरिञ् च |
|
3.3.111 |
पर्यायार्हर्णोत्पत्तिषु ण्वुच् |
|
3.3.112 |
आक्रोशे नञ्यनिः |
|
3.3.113 |
कृत्यल्युटो बहुलम् |
|
3.3.114 |
नपुंसके भावे क्तः |
|
3.3.115 |
ल्युट् च |
|
3.3.116 |
कर्मणि च येन संस्पर्शात् कर्तुः शरीरसुखम् |
|
3.3.117 |
करणाधिकरणयोश्च |
|
3.3.118 |
पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण |
|
3.3.119 |
गोचरसंचरवहव्रजव्यजापणनिगमाश्च |
|
3.3.120 |
अवे तॄस्त्रोर्घञ् |
|
3.3.121 |
हलश्च |
|
3.3.122 |
अध्यायन्यायोद्यावसंहाराश्च |
|
3.3.123 |
उदङ्कोऽनुदके |
|
3.3.124 |
जालमानायः |
|
3.3.125 |
खनो घ च |
|
3.3.126 |
ईषद्दुःसुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल् |
|
3.3.127 |
कर्तृकर्मणोश्च भूकृञोः |
|
3.3.128 |
आतो युच् |
|
3.3.129 |
छन्दसि गत्यर्थेभ्यः |
|
3.3.130 |
अन्येभ्योऽपि दृश्यते |
|
3.3.131 |
वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा |
|
3.3.132 |
आशंसायां भूतवच्च |
|
3.3.133 |
क्षिप्रवचने लृट् |
|
3.3.134 |
आशंसावचने लिङ् |
|
3.3.135 |
नानद्यतनवत् क्रियाप्रबन्धसामीप्ययोः |
|
3.3.136 |
भविष्यति मर्यादावचनेऽवरस्मिन् |
|
3.3.137 |
कालविभागे चानहोरात्राणाम् |
|
3.3.138 |
परस्मिन् विभाषा |
|
3.3.139 |
लिङ्निमित्ते लृङ् क्रियाऽतिपत्तौ |
|
3.3.140 |
भूते च |
|
3.3.141 |
वोताप्योः |
|
3.3.142 |
गर्हायां लडपिजात्वोः |
|
3.3.143 |
विभाषा कथमि लिङ् च |
|
3.3.144 |
किंवृत्ते लिङ्लृटौ |
|
3.3.145 |
अनवकॢप्त्यमर्षयोरकिंवृत्ते अपि |
|
3.3.146 |
किंकिलास्त्यर्थेषु लृट् |
|
3.3.147 |
जातुयदोर्लिङ् |
|
3.3.148 |
यच्चयत्रयोः |
|
3.3.149 |
गर्हायां च |
|
3.3.150 |
चित्रीकरणे च |
|
3.3.151 |
शेषे लृडयदौ |
|
3.3.152 |
उताप्योः समर्थयोर्लिङ् |
|
3.3.153 |
कामप्रवेदनेऽकच्चिति |
|
3.3.154 |
सम्भवानेऽलमिति चेत् सिद्धाप्रयोगे |
|
3.3.155 |
विभाषा धातौ सम्भावनवचनेऽयदि |
|
3.3.156 |
हेतुहेतुमतोर्लिङ् |
|
3.3.157 |
इच्छार्थेषु लिङ्लोटौ |
|
3.3.158 |
समानकर्तृकेषु तुमुँन् |
|
3.3.159 |
लिङ् च |
|
3.3.160 |
इच्छार्थेभ्यो विभाषा वर्त्तमाने |
|
3.3.161 |
विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसंप्रश्नप्रार्थनेषु लिङ् |
|
3.3.162 |
लोट् च |
|
3.3.163 |
प्रैषातिसर्गप्राप्तकालेषु कृत्याश्च |
|
3.3.164 |
लिङ् चोर्ध्वमौहूर्तिके |
|
3.3.165 |
स्मे लोट् |
|
3.3.166 |
अधीष्टे च |
|
3.3.167 |
कालसमयवेलासु तुमुँन् |
|
3.3.168 |
लिङ् यदि |
|
3.3.169 |
अर्हे कृत्यतृचश्च |
|
3.3.170 |
आवश्यकाधमर्ण्ययोर्णिनिः |
|
3.3.171 |
कृत्याश्च |
|
3.3.172 |
शकि लिङ् च |
|
3.3.173 |
आशिषि लिङ्लोटौ |
|
3.3.174 |
क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम् |
|
3.3.175 |
माङि लुङ् |
|
3.3.176 |
स्मोत्तरे लङ् च |
|
3.4.1 |
धातुसम्बन्धे प्रत्ययाः |
|
3.4.2 |
क्रियासमभिहारे लोट्; लोटो हिस्वौ; वा च तध्वमोः |
|
3.4.3 |
समुच्चयेऽन्यतरस्याम् |
|
3.4.4 |
यथाविध्यनुप्रयोगः पूर्वस्मिन् |
|
3.4.5 |
समुच्चये सामान्यवचनस्य |
|
3.4.6 |
छन्दसि लुङ्लङ्लिटः |
|
3.4.7 |
लिङर्थे लेट् |
|
3.4.8 |
उपसंवादाशङ्कयोश्च |
|
3.4.9 |
तुमर्थे सेसेनसेअसेन्क्सेकसेनध्यैअध्यैन्कध्यैकध्यैन्शध्यैशध्यैन्तवैतवेङ्तवेनः |
|
3.4.10 |
प्रयै रोहिष्यै अव्यथिष्यै |
|
3.4.11 |
दृशे विख्ये च |
|
3.4.12 |
शकि णमुँल््कमुलौ |
|
3.4.13 |
ईश्वरे तोसुन्कसुनौ |
|
3.4.14 |
कृत्यार्थे तवैकेन्केन्यत्वनः |
|
3.4.15 |
अवचक्षे च |
|
3.4.16 |
भावलक्षणे स्थेण्कृञ्वदिचरिहुतमिजनिभ्यस्तोसुन् |
|
3.4.17 |
सृपितृदोः कसुन् |
|
3.4.18 |
अलङ्खल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा |
|
3.4.19 |
उदीचां माङो व्यतीहारे |
|
3.4.20 |
परावरयोगे च |
|
3.4.21 |
समानकर्तृकयोः पूर्वकाले |
|
3.4.22 |
आभीक्ष्ण्ये णमुँल्् च |
|
3.4.23 |
न यद्यनाकाङ्क्षे |
|
3.4.24 |
विभाषाऽग्रेप्रथमपूर्वेषु |
|
3.4.25 |
कर्मण्याक्रोशे कृञः खमुञ् |
|
3.4.26 |
स्वादुमि णमुँल्् |
|
3.4.27 |
अन्यथैवंकथमित्थंसु सिद्धाप्रयोगश्चेत् |
|
3.4.28 |
यथातथयोरसूयाप्रतिवचने |
|
3.4.29 |
कर्मणि दृशिविदोः साकल्ये |
|
3.4.30 |
यावति विन्दजीवोः |
|
3.4.31 |
चर्मोदरयोः पूरेः |
|
3.4.32 |
वर्षप्रमाण ऊलोपश्चास्यान्यतरस्याम् |
|
3.4.33 |
चेले क्नोपेः |
|
3.4.34 |
निमूलसमूलयोः कषः |
|
3.4.35 |
शुष्कचूर्णरूक्षेषु पिषः |
|
3.4.36 |
समूलाकृतजीवेषु हन्कृञ्ग्रहः |
|
3.4.37 |
करणे हनः |
|
3.4.38 |
स्नेहने पिषः |
|
3.4.39 |
हस्ते वर्त्तिग्रहोः |
|
3.4.40 |
स्वे पुषः |
|
3.4.41 |
अधिकरणे बन्धः |
|
3.4.42 |
संज्ञायाम् |
|
3.4.43 |
कर्त्रोर्जीवपुरुषयोर्नशिवहोः |
|
3.4.44 |
ऊर्ध्वे शुषिपूरोः |
|
3.4.45 |
उपमाने कर्मणि च |
|
3.4.46 |
कषादिषु यथाविध्यनुप्रयोगः |
|
3.4.47 |
उपदंशस्तृतीयायाम् |
|
3.4.48 |
हिंसार्थानां च समानकर्मकाणाम् |
|
3.4.49 |
सप्तम्यां चोपपीडरुधकर्षः |
|
3.4.50 |
समासत्तौ |
|
3.4.51 |
प्रमाणे च |
|
3.4.52 |
अपादाने परीप्सायाम् |
|
3.4.53 |
द्वितीयायां च |
|
3.4.54 |
स्वाङ्गेऽध्रुवे |
|
3.4.55 |
परिक्लिश्यमाने च |
|
3.4.56 |
विशिपतिपदिस्कन्दां व्याप्यमानासेव्यमानयोः |
|
3.4.57 |
अस्यतितृषोः क्रियाऽन्तरे कालेषु |
|
3.4.58 |
नाम्न्यादिशिग्रहोः |
|
3.4.59 |
अव्ययेऽयथाभिप्रेताख्याने कृञः क्त्वाणमुँल्ौ |
|
3.4.60 |
तिर्यच्यपवर्गे |
|
3.4.61 |
स्वाङ्गे तस्प्रत्यये कृभ्वोः |
|
3.4.62 |
नाधाऽर्थप्रत्यये च्व्यर्थे |
|
3.4.63 |
तूष्णीमि भुवः |
|
3.4.64 |
अन्वच्यानुलोम्ये |
|
3.4.65 |
शकधृषज्ञाग्लाघटरभलभक्रमसहार्हास्त्यर्थेषु तुमुँन् |
|
3.4.66 |
पर्याप्तिवचनेष्वलमर्थेषु |
|
3.4.67 |
कर्तरि कृत् |
|
3.4.68 |
भव्यगेयप्रवचनीयोपस्थानीयजन्याप्लाव्यापात्या वा |
|
3.4.69 |
लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः. |
|
3.4.70 |
तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः |
|
3.4.71 |
आदिकर्मणि क्तः कर्तरि च |
|
3.4.72 |
गत्यर्थाकर्मकश्लिषशीङ्स्थाऽऽसवसजनरुहजीर्यतिभ्यश्च |
|
3.4.73 |
दाशगोघ्नौ सम्प्रदाने |
|
3.4.74 |
भीमादयोऽपादाने |
|
3.4.75 |
ताभ्यामन्यत्रोणादयः |
|
3.4.76 |
क्तोऽधिकरणे च ध्रौव्यगतिप्रत्यवसानार्थेभ्यः |
|
3.4.77 |
लस्य |
|
3.4.78 |
तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस् तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ् |
|
3.4.79 |
टित आत्मनेपदानां टेरे |
|
3.4.80 |
थासस्से |
|
3.4.81 |
लिटस्तझयोरेशिरेच् |
|
3.4.82 |
परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथुसणल्वमाः |
|
3.4.83 |
विदो लटो वा |
|
3.4.84 |
ब्रुवः पञ्चानामादित आहो ब्रुवः |
|
3.4.85 |
लोटो लङ्वत् |
|
3.4.86 |
एरुः |
|
3.4.87 |
सेर्ह्यपिच्च |
|
3.4.88 |
वा छन्दसि |
|
3.4.89 |
मेर्निः |
|
3.4.90 |
आमेतः |
|
3.4.91 |
सवाभ्यां वामौ |
|
3.4.92 |
आडुत्तमस्य पिच्च |
|
3.4.93 |
एत ऐ |
|
3.4.94 |
लेटोऽडाटौ |
|
3.4.95 |
आत ऐ |
|
3.4.96 |
वैतोऽन्यत्र |
|
3.4.97 |
इतश्च लोपः परस्मैपदेषु |
|
3.4.98 |
स उत्तमस्य |
|
3.4.99 |
नित्यं ङितः |
|
3.4.100 |
इतश्च |
|
3.4.101 |
तस्थस्थमिपां तांतंतामः |
|
3.4.102 |
लिङस्सीयुट् |
|
3.4.103 |
यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च |
|
3.4.104 |
किदाशिषि |
|
3.4.105 |
झस्य रन् |
|
3.4.106 |
इटोऽत् |
|
3.4.107 |
सुट् तिथोः |
|
3.4.108 |
झेर्जुस् |
|
3.4.109 |
सिजभ्यस्तविदिभ्यः च |
|
3.4.110 |
आतः |
|
3.4.111 |
लङः शाकटायनस्यैव |
|
3.4.112 |
द्विषश्च |
|
3.4.113 |
तिङ्शित्सार्वधातुकम् |
|
3.4.114 |
आर्धधातुकं शेषः |
|
3.4.115 |
लिट् च |
|
3.4.116 |
लिङाशिषि |
|
3.4.117 |
छन्दस्युभयथा |
|
4.1.1 |
ङ्याप्प्रातिपदिकात् |
|
4.1.2 |
स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्योस्सुप् |
|
4.1.3 |
स्त्रियाम् |
|
4.1.4 |
अजाद्यतष्टाप् |
|
4.1.5 |
ऋन्नेभ्यो ङीप् |
|
4.1.6 |
उगितश्च |
|
4.1.7 |
वनो र च |
|
4.1.8 |
पादोऽन्यतरस्याम् |
|
4.1.9 |
टाबृचि |
|
4.1.10 |
न षट्स्वस्रादिभ्यः |
|
4.1.11 |
मनः |
|
4.1.12 |
अनो बहुव्रीहेः |
|
4.1.13 |
डाबुभाभ्यामन्यतरस्याम् |
|
4.1.14 |
अनुपसर्जनात् |
|
4.1.15 |
टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः |
|
4.1.16 |
यञश्च |
|
4.1.17 |
प्राचां ष्फ तद्धितः |
|
4.1.18 |
सर्वत्र लोहितादिकतान्तेभ्यः |
|
4.1.19 |
कौरव्यमाण्डूकाभ्यां च |
|
4.1.20 |
वयसि प्रथमे |
|
4.1.21 |
द्विगोः |
|
4.1.22 |
अपरिमाणबिस्ताचितकम्बल्येभ्यो न तद्धितलुकि |
|
4.1.23 |
काण्डान्तात् क्षेत्रे |
|
4.1.24 |
पुरुषात् प्रमाणेऽन्यतरस्याम् |
|
4.1.25 |
बहुव्रीहेरूधसो ङीष्|
|
4.1.26 |
संख्याऽव्ययादेर्ङीप् |
|
4.1.27 |
दामहायनान्ताच्च |
|
4.1.28 |
अन उपधालोपिनोन्यतरस्याम् |
|
4.1.29 |
नित्यं संज्ञाछन्दसोः |
|
4.1.30 |
केवलमामकभागधेयपापापरसमानार्यकृत-सुमङ्गलभेषजाच्च |
|
4.1.31 |
रात्रेश्चाजसौ |
|
4.1.32 |
अन्तर्वत्पतिवतोर्नुक् |
|
4.1.33 |
पत्युर्नो यज्ञसंयोगे |
|
4.1.34 |
विभाषा सपूर्वस्य |
|
4.1.35 |
नित्यं सपत्न्य्आदिषु |
|
4.1.36 |
पूतक्रतोरै च |
|
4.1.37 |
वृषाकप्यग्निकुसितकुसीदानामुदात्तः |
|
4.1.38 |
मनोरौ वा |
|
4.1.39 |
वर्णादनुदात्तात्तोपधात्तो नः |
|
4.1.40 |
अन्यतो ङीष्|
|
4.1.41 |
षिद्गौरादिभ्यश्च |
|
4.1.42 |
जानपदकुण्डगोणस्थलभाजनागकालनीलकुशकामुककबराद्वृत्त्यमत्रावपनाकृत्रिमाश्राणास्थौल्यवर्णानाच्छादनायोविकारमैथुनेच्छाकेशवेशेषु |
|
4.1.43 |
शोणात् प्राचाम् |
|
4.1.44 |
वोतो गुणवचनात् |
|
4.1.45 |
बह्वादिभ्यश्च |
|
4.1.46 |
नित्यं छन्दसि |
|
4.1.47 |
भुवश्च |
|
4.1.48 |
पुंयोगादाख्यायाम् |
|
4.1.49 |
इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलाचार्याणामानुक् |
|
4.1.50 |
क्रीतात् करणपूर्वात् |
|
4.1.51 |
क्तादल्पाख्यायाम् |
|
4.1.52 |
बहुव्रीहेश्चान्तोदात्तात् |
|
4.1.53 |
अस्वाङ्गपूर्वपदाद्वा |
|
4.1.54 |
स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात् |
|
4.1.55 |
नासिकोदरौष्ठजङ्घादन्तकर्णशृङ्गाच्च |
|
4.1.56 |
न क्रोडादिबह्वचः |
|
4.1.57 |
सहनञ्विद्यमानपूर्वाच्च |
|
4.1.58 |
नखमुखात् संज्ञायाम् |
|
4.1.59 |
दीर्घजिह्वी च च्छन्दसि |
|
4.1.60 |
दिक्पूर्वपदान्ङीप् |
|
4.1.61 |
वाहः |
|
4.1.62 |
सख्यशिश्वीति भाषायाम् |
|
4.1.63 |
जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् |
|
4.1.64 |
पाककर्णपर्णपुष्पफलमूलबालोत्तरपदाच्च |
|
4.1.65 |
इतो मनुष्यजातेः |
|
4.1.66 |
ऊङुतः |
|
4.1.67 |
बाह्वन्तात् संज्ञायाम् |
|
4.1.68 |
पङ्गोश्च |
|
4.1.69 |
ऊरूत्तरपदादौपम्ये |
|
4.1.70 |
संहितशफलक्षणवामादेश्च |
|
4.1.71 |
कद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि |
|
4.1.72 |
संज्ञायाम् |
|
4.1.73 |
शार्ङ्गरवाद्यञो ङीन् |
|
4.1.74 |
यङश्चाप् |
|
4.1.75 |
आवट्याच्च |
|
4.1.76 |
तद्धिताः |
|
4.1.77 |
यूनस्तिः |
|
4.1.78 |
अणिञोरनार्षयोर्गुरूपोत्तमयोः ष्यङ् गोत्रे |
|
4.1.79 |
गोत्रावयवात् |
|
4.1.80 |
क्रौड्यादिभ्यश्च |
|
4.1.81 |
दैवयज्ञिशौचिवृक्षिसात्यमुग्रिकाण्ठेविद्धिभ्योऽन्यतरस्याम् |
|
4.1.82 |
समर्थानां प्रथमाद्वा |
|
4.1.83 |
प्राग्दीव्यतोऽण् |
|
4.1.84 |
अश्वपत्यादिभ्यश्च |
|
4.1.85 |
दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्ण्यः |
|
4.1.86 |
उत्सादिभ्योऽञ् |
|
4.1.87 |
स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञौ भवनात् |
|
4.1.88 |
द्विगोर्लुगनपत्ये |
|
4.1.89 |
गोत्रेऽलुगचि |
|
4.1.90 |
यूनि लुक् |
|
4.1.91 |
फक्फिञोरन्यतरस्याम् |
|
4.1.92 |
तस्यापत्यम् |
|
4.1.93 |
एको गोत्रे |
|
4.1.94 |
गोत्राद्यून्यस्त्रियाम् |
|
4.1.95 |
अत इञ् |
|
4.1.96 |
बाह्वादिभ्यश्च |
|
4.1.97 |
सुधातुरकङ् च |
|
4.1.98 |
गोत्रे कुञ्जादिभ्यश्च्फञ् |
|
4.1.99 |
नडादिभ्यः फक् |
|
4.1.100 |
हरितादिभ्योऽञः |
|
4.1.101 |
यञिञोश्च |
|
4.1.102 |
शरद्वच्छुनकदर्भाद्भृगुवत्साग्रायणेषु |
|
4.1.103 |
द्रोणपर्वतजीवन्तादन्यतरस्याम् |
|
4.1.104 |
अनृष्यानन्तर्ये बिदादिभ्योऽञ् |
|
4.1.105 |
गर्गादिभ्यो यञ् |
|
4.1.106 |
मधुबभ्र्वोर्ब्राह्मणकौशिकयोः |
|
4.1.107 |
कपिबोधादाङ्गिरसे |
|
4.1.108 |
वतण्डाच्च |
|
4.1.109 |
लुक् स्त्रियाम् |
|
4.1.110 |
अश्वादिभ्यः फञ् |
|
4.1.111 |
भर्गात् त्रैगर्ते |
|
4.1.112 |
शिवादिभ्योऽण् |
|
4.1.113 |
अवृद्धाभ्यो नदीमानुषीभ्यस्तन्नामिकाभ्यः |
|
4.1.114 |
ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च |
|
4.1.115 |
मातुरुत् संख्यासम्भद्रपूर्वायाः |
|
4.1.116 |
कन्यायाः कनीन च |
|
4.1.117 |
विकर्णशुङ्गच्छगलाद्वत्सभरद्वाजात्रिषु |
|
4.1.118 |
पीलाया वा |
|
4.1.119 |
ढक् च मण्डूकात् |
|
4.1.120 |
स्त्रीभ्यो ढक् |
|
4.1.121 |
द्व्यचः |
|
4.1.122 |
इतश्चानिञः |
|
4.1.123 |
शुभ्रादिभ्यश्च |
|
4.1.124 |
विकर्णकुषीतकात् काश्यपे |
|
4.1.125 |
भ्रुवो वुक् च |
|
4.1.126 |
कल्याण्यादीनामिनङ् |
|
4.1.127 |
कुलटाया वा |
|
4.1.128 |
चटकाया ऐरक् |
|
4.1.129 |
गोधाया ढ्रक् |
|
4.1.130 |
आरगुदीचाम् |
|
4.1.131 |
क्षुद्राभ्यो वा |
|
4.1.132 |
पितृष्वसुश्छण् |
|
4.1.133 |
ढकि लोपः |
|
4.1.134 |
मातृष्वसुश्च |
|
4.1.135 |
चतुष्पाद्भ्यो ढञ् |
|
4.1.136 |
गृष्ट्यादिभ्यश्च |
|
4.1.137 |
राजश्वशुराद्यत् |
|
4.1.138 |
क्षत्राद्घः |
|
4.1.139 |
कुलात् खः |
|
4.1.140 |
अपूर्वपदादन्यतरस्यां यड्ढकञौ |
|
4.1.141 |
महाकुलादञ्खञौ |
|
4.1.142 |
दुष्कुलाड्ढक् |
|
4.1.143 |
स्वसुश्छः |
|
4.1.144 |
भ्रातुर्व्यच्च |
|
4.1.145 |
व्यन् सपत्ने |
|
4.1.146 |
रेवत्यादिभ्यष्ठक् |
|
4.1.147 |
गोत्रस्त्रियाः कुत्सने ण च |
|
4.1.148 |
वृद्धाट्ठक् सौवीरेषु बहुलम् |
|
4.1.149 |
फेश्छ च |
|
4.1.150 |
फाण्टाहृतिमिमताभ्यां णफिञौ |
|
4.1.151 |
कुर्वादिभ्यो ण्यः |
|
4.1.152 |
सेनान्तलक्षणकारिभ्यश्च |
|
4.1.153 |
उदीचामिञ् |
|
4.1.154 |
तिकादिभ्यः फिञ् |
|
4.1.155 |
कौसल्यकार्मार्याभ्यां च |
|
4.1.156 |
अणो द्व्यचः |
|
4.1.157 |
उदीचां वृद्धादगोत्रात् |
|
4.1.158 |
वाकिनादीनां कुक् च |
|
4.1.159 |
पुत्रान्तादन्यतरस्याम् |
|
4.1.160 |
प्राचामवृद्धात् फिन् बहुलम् |
|
4.1.161 |
मनोर्जातावञ्यतौ षुक् च |
|
4.1.162 |
अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम् |
|
4.1.163 |
जीवति तु वंश्ये युवा |
|
4.1.164 |
भ्रातरि च ज्यायसि |
|
4.1.165 |
वाऽन्यस्मिन् सपिण्डे स्थविरतरे जीवति |
|
4.1.166 |
वृद्धस्य च पूजायाम् |
|
4.1.167 |
यूनश्च कुत्सायाम् |
|
4.1.168 |
जनपदशब्दात् क्षत्रियादञ् |
|
4.1.169 |
साल्वेयगान्धारिभ्यां च |
|
4.1.170 |
द्व्यञ्मगधकलिङ्गसूरमसादण् |
|
4.1.171 |
वृद्धेत्कोसलाजादाञ्ञ्यङ् |
|
4.1.172 |
कुरुणादिभ्यो ण्यः |
|
4.1.173 |
साल्वावयवप्रत्यग्रथकलकूटाश्मकादिञ् |
|
4.1.174 |
ते तद्राजाः |
|
4.1.175 |
कम्बोजाल्लुक् |
|
4.1.176 |
स्त्रियामवन्तिकुन्तिकुरुभ्यश्च |
|
4.1.177 |
अतश्च |
|
4.1.178 |
न प्राच्यभर्गादियौधेयादिभ्यः |
|
4.2.1 |
तेन रक्तं रागात् |
|
4.2.2 |
लाक्षारोचना(शकलकर्दमा)ट्ठक् |
|
4.2.3 |
नक्षत्रेण युक्तः कालः |
|
4.2.4 |
लुबविशेषे |
|
4.2.5 |
संज्ञायां श्रवणाश्वत्थाभ्याम् |
|
4.2.6 |
द्वंद्वाच्छः |
|
4.2.7 |
दृष्टं साम |
|
4.2.8 |
कलेर्ढक् |
|
4.2.9 |
वामदेवाड्ड्यड्ड्यौ |
|
4.2.10 |
परिवृतो रथः |
|
4.2.11 |
पाण्डुकम्बलादिनिः |
|
4.2.12 |
द्वैपवैयाघ्रादञ् |
|
4.2.13 |
कौमारापूर्ववचने |
|
4.2.14 |
तत्रोद्धृतममत्रेभ्यः |
|
4.2.15 |
स्थण्डिलाच्छयितरि व्रते |
|
4.2.16 |
संस्कृतं भक्षाः |
|
4.2.17 |
शूलोखाद्यत् |
|
4.2.18 |
दध्नष्ठक् |
|
4.2.19 |
उदश्वितोऽन्यतरस्याम् |
|
4.2.20 |
क्षीराड्ढञ् |
|
4.2.21 |
साऽस्मिन् पौर्णमासीति (संज्ञायाम्) |
|
4.2.22 |
आग्रहायण्यश्वत्थाट्ठक् |
|
4.2.23 |
विभाषा फाल्गुनीश्रवणाकार्त्तिकीचैत्रीभ्यः |
|
4.2.24 |
साऽस्य देवता |
|
4.2.25 |
कस्येत् |
|
4.2.26 |
शुक्राद्घन् |
|
4.2.27 |
अपोनप्त्रपान्नप्तृभ्यां घः |
|
4.2.28 |
छ च |
|
4.2.29 |
महेन्द्राद्घाणौ च |
|
4.2.30 |
सोमाट्ट्यण् |
|
4.2.31 |
वाय्वृतुपित्रुषसो यत् |
|
4.2.32 |
द्यावापृथिवीशुनासीरमरुत्वदग्नीषोमवास्तोष्पतिगृहमेधाच्छ च |
|
4.2.33 |
अग्नेर्ढक् |
|
4.2.34 |
कालेभ्यो भववत् |
|
4.2.35 |
महाराजप्रोष्ठपदाट्ठञ् |
|
4.2.36 |
पितृव्यमातुलमातामहपितामहाः |
|
4.2.37 |
तस्य समूहः |
|
4.2.38 |
भिक्षाऽऽदिभ्योऽण् |
|
4.2.39 |
गोत्रोक्षोष्ट्रोरभ्रराजराजन्यराजपुत्रवत्समनुष्याजाद्वुञ् |
|
4.2.40 |
केदाराद्यञ् च |
|
4.2.41 |
ठञ् कवचिनश्च |
|
4.2.42 |
ब्राह्मणमाणववाडवाद्यन् |
|
4.2.43 |
ग्रामजनबन्धुसहायेभ्यः तल् |
|
4.2.44 |
अनुदात्तादेरञ् |
|
4.2.45 |
खण्डिकादिभ्यश्च |
|
4.2.46 |
चरणेभ्यो धर्मवत् |
|
4.2.47 |
अचित्तहस्तिधेनोष्ठक् |
|
4.2.48 |
केशाश्वाभ्यां यञ्छावन्यतरस्याम् |
|
4.2.49 |
पाशादिभ्यो यः |
|
4.2.50 |
खलगोरथात् |
|
4.2.51 |
इनित्रकट्यचश्च |
|
4.2.52 |
विषयो देशे |
|
4.2.53 |
राजन्यादिभ्यो वुञ् |
|
4.2.54 |
भौरिक्याद्यैषुकार्यादिभ्यो विधल्भक्तलौ |
|
4.2.55 |
सोऽस्यादिरिति च्छन्दसः प्रगाथेषु |
|
4.2.56 |
संग्रामे प्रयोजनयोद्धृभ्यः |
|
4.2.57 |
तदस्यां प्रहरणमिति क्रीडायाम् णः |
|
4.2.58 |
घञः साऽस्यां क्रियेति ञः |
|
4.2.59 |
तदधीते तद्वेद |
|
4.2.60 |
क्रतूक्थादिसूत्रान्ताट्ठक् |
|
4.2.61 |
क्रमादिभ्यो वुन् |
|
4.2.62 |
अनुब्राह्मणादिनिः |
|
4.2.63 |
वसन्तादिभ्यष्ठक् |
|
4.2.64 |
प्रोक्ताल्लुक् |
|
4.2.65 |
सूत्राच्च कोपधात् |
|
4.2.66 |
छन्दोब्राह्मणानि च तद्विषयाणि |
|
4.2.67 |
तदस्मिन्नस्तीति देशे तन्नाम्नि |
|
4.2.68 |
तेन निर्वृत्तम् |
|
4.2.69 |
तस्य निवासः |
|
4.2.70 |
अदूरभवश्च |
|
4.2.71 |
ओरञ् |
|
4.2.72 |
मतोश्च बह्वजङ्गात् |
|
4.2.73 |
बह्वचः कूपेषु |
|
4.2.74 |
उदक् च विपाशः |
|
4.2.75 |
संकलादिभ्यश्च |
|
4.2.76 |
स्त्रीषु सौवीरसाल्वप्राक्षु |
|
4.2.77 |
सुवास्त्वादिभ्योऽण् |
|
4.2.78 |
रोणी |
|
4.2.79 |
कोपधाच्च |
|
4.2.80 |
वुञ्छण्कठजिलशेनिरढञ्ण्ययफक्फिञिञ्ञ्यकक्ठकोऽरीहणकृशाश्वर्श्यकुमुदकाशतृणप्रेक्षाऽश्मसखिसंकाशबलपक्षकर्णसुतंगमप्रगदिन्वराहकुमुदादिभ्यः |
|
4.2.81 |
जनपदे लुप् |
|
4.2.82 |
वरणादिभ्यश्च |
|
4.2.83 |
शर्कराया वा |
|
4.2.84 |
ठक्छौ च |
|
4.2.85 |
नद्यां मतुप् |
|
4.2.86 |
मध्वादिभ्यश्च |
|
4.2.87 |
कुमुदनडवेतसेभ्यो ड्मतुप् |
|
4.2.88 |
नडशादाड्ड्वलच् |
|
4.2.89 |
शिखाया वलच् |
|
4.2.90 |
उत्करादिभ्यश्छः |
|
4.2.91 |
नडादीनां कुक् च |
|
4.2.92 |
शेषे |
|
4.2.93 |
राष्ट्रावारपाराद्घखौ |
|
4.2.94 |
ग्रामाद्यखञौ |
|
4.2.95 |
कत्त्र्यादिभ्यो ढकञ् |
|
4.2.96 |
कुलकुक्षिग्रीवाभ्यः श्वास्यलंकारेषु |
|
4.2.97 |
नद्यादिभ्यो ढक् |
|
4.2.98 |
दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक् |
|
4.2.99 |
कापिश्याः ष्फक् |
|
4.2.100 |
रंकोरमनुष्येऽण् च |
|
4.2.101 |
द्युप्रागपागुदक्प्रतीचो यत् |
|
4.2.102 |
कन्थायाष्ठक् |
|
4.2.103 |
वर्णौ वुक् |
|
4.2.104 |
अव्ययात्त्यप् |
|
4.2.105 |
ऐषमोह्यःश्वसोऽन्यतरस्याम् |
|
4.2.106 |
तीररूप्योत्तरपदादञ्ञौ |
|
4.2.107 |
दिक्पूर्वपदादसंज्ञायां ञः |
|
4.2.108 |
मद्रेभ्योऽञ् |
|
4.2.109 |
उदीच्यग्रामाच्च बह्वचोऽन्तोदात्तात् |
|
4.2.110 |
प्रस्थोत्तरपदपलद्यादिकोपधादण् |
|
4.2.111 |
कण्वादिभ्यो गोत्रे |
|
4.2.112 |
इञश्च |
|
4.2.113 |
न द्व्यचः प्राच्यभरतेषु |
|
4.2.114 |
वृद्धाच्छः |
|
4.2.115 |
भवतष्ठक्छसौ |
|
4.2.116 |
काश्यादिभ्यष्ठञ्ञिठौ |
|
4.2.117 |
वाहीकग्रामेभ्यश्च |
|
4.2.118 |
विभाषोशीनरेषु |
|
4.2.119 |
ओर्देशे ठञ् |
|
4.2.120 |
वृद्धात् प्राचाम् |
|
4.2.121 |
धन्वयोपधाद्वुञ् |
|
4.2.122 |
प्रस्थपुरवहान्ताच्च |
|
4.2.123 |
रोपधेतोः प्राचाम् |
|
4.2.124 |
जनपदतदवध्योश्च |
|
4.2.125 |
अवृद्धादपि बहुवचनविषयात् |
|
4.2.126 |
कच्छाग्निवक्त्रगर्त्तोत्तरपदात् |
|
4.2.127 |
धूमादिभ्यश्च |
|
4.2.128 |
नगरात् कुत्सनप्रावीण्ययोः |
|
4.2.129 |
अरण्यान्मनुष्ये |
|
4.2.130 |
विभाषा कुरुयुगन्धराभ्याम् |
|
4.2.131 |
मद्रवृज्योः कन् |
|
4.2.132 |
कोपधादण् |
|
4.2.133 |
कच्छादिभ्यश्च |
|
4.2.134 |
मनुष्यतत्स्थयोर्वुञ् |
|
4.2.135 |
अपदातौ साल्वात् |
|
4.2.136 |
गोयवाग्वोश्च |
|
4.2.137 |
गर्तोत्तरपदाच्छः |
|
4.2.138 |
गहादिभ्यश्च |
|
4.2.139 |
प्राचां कटादेः |
|
4.2.140 |
राज्ञः क च |
|
4.2.141 |
वृद्धादकेकान्तखोपधात् |
|
4.2.142 |
कन्थापलदनगरग्रामह्रदोत्तरपदात् |
|
4.2.143 |
पर्वताच्च |
|
4.2.144 |
विभाषाऽमनुष्ये |
|
4.2.145 |
कृकणपर्णाद्भारद्वाजे |
|
4.3.1 |
युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ् च |
|
4.3.2 |
तस्मिन् नणि च युष्माकास्माकौ |
|
4.3.3 |
तवकममकावेकवचने |
|
4.3.4 |
अर्धाद्यत् |
|
4.3.5 |
परावराधमोत्तमपूर्वाच्च |
|
4.3.6 |
दिक्पूर्वपदाट्ठञ् च |
|
4.3.7 |
ग्रामजनपदैकदेशादञ्ठञौ |
|
4.3.8 |
मध्यान्मः |
|
4.3.9 |
अ साम्प्रतिके |
|
4.3.10 |
द्वीपादनुसमुद्रं यञ् |
|
4.3.11 |
कालाट्ठञ् |
|
4.3.12 |
श्राद्धे शरदः |
|
4.3.13 |
विभाषा रोगातपयोः |
|
4.3.14 |
निशाप्रदोषाभ्यां च |
|
4.3.15 |
श्वसस्तुट् च |
|
4.3.16 |
संधिवेलाऽऽद्यृतुनक्षत्रेभ्योऽण् |
|
4.3.17 |
प्रावृष एण्यः |
|
4.3.18 |
वर्षाभ्यष्ठक् |
|
4.3.19 |
छन्दसि ठञ् |
|
4.3.20 |
वसन्ताच्च |
|
4.3.21 |
हेमन्ताच्च |
|
4.3.22 |
सर्वत्राण् च तलोपश्च |
|
4.3.23 |
सायंचिरम्प्राह्णेप्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलौ तुट् च |
|
4.3.24 |
विभाषा पूर्वाह्णापराह्णाभ्याम् |
|
4.3.25 |
तत्र जातः |
|
4.3.26 |
प्रावृषष्ठप् |
|
4.3.27 |
संज्ञायां शरदो वुञ् |
|
4.3.28 |
पूर्वाह्णापराह्णार्द्रामूलप्रदोषावस्कराद्वुन् |
|
4.3.29 |
पथः पन्थ च |
|
4.3.30 |
अमावास्याया वा |
|
4.3.31 |
अ च |
|
4.3.32 |
सिन्ध्वपकराभ्यां कन् |
|
4.3.33 |
अणञौ च |
|
4.3.34 |
श्रविष्ठाफल्गुन्यनुराधास्वातितिष्यपुनर्वसुहस्तविशाखाऽषाढाबहुलाल्लुक् |
|
4.3.35 |
स्थानान्तगोशालखरशालाच्च |
|
4.3.36 |
वत्सशालाऽभिजिदश्वयुक्छतभिषजो वा |
|
4.3.37 |
नक्षत्रेभ्यो बहुलम् |
|
4.3.38 |
कृतलब्धक्रीतकुशलाः |
|
4.3.39 |
प्रायभवः |
|
4.3.40 |
उपजानूपकर्णोपनीवेष्ठक् |
|
4.3.41 |
संभूते |
|
4.3.42 |
कोशाड्ढञ् |
|
4.3.43 |
कालात् साधुपुष्प्यत्पच्यमानेषु |
|
4.3.44 |
उप्ते च |
|
4.3.45 |
आश्वयुज्या वुञ् |
|
4.3.46 |
ग्रीष्मवसन्तादन्यतरस्याम् |
|
4.3.47 |
देयमृणे |
|
4.3.48 |
कलाप्यश्वत्थयवबुसाद्वुन् |
|
4.3.49 |
ग्रीष्मावरसमाद्वुञ् |
|
4.3.50 |
संवत्सराग्रहायणीभ्यां ठञ् च |
|
4.3.51 |
व्याहरति मृगः |
|
4.3.52 |
तदस्य सोढम् |
|
4.3.53 |
तत्र भवः |
|
4.3.54 |
दिगादिभ्यो यत् |
|
4.3.55 |
शरीरावयवाच्च |
|
4.3.56 |
दृतिकुक्षिकलशिवस्त्यस्त्यहेर्ढञ् |
|
4.3.57 |
ग्रीवाभ्योऽण् च |
|
4.3.58 |
गम्भीराञ्ञ्यः |
|
4.3.59 |
अव्ययीभावाच्च |
|
4.3.60 |
अन्तःपूर्वपदाट्ठञ् |
|
4.3.61 |
ग्रामात् पर्यनुपूर्वात् |
|
4.3.62 |
जिह्वामूलाङ्गुलेश्छः |
|
4.3.63 |
वर्गान्ताच्च |
|
4.3.64 |
अशब्दे यत्खावन्यतरस्याम् |
|
4.3.65 |
कर्णललाटात् कनलंकारे |
|
4.3.66 |
तस्य व्याख्यान इति च व्याख्यातव्यनाम्नः |
|
4.3.67 |
बह्वचोऽन्तोदात्ताट्ठञ् |
|
4.3.68 |
क्रतुयज्ञेभ्यश्च |
|
4.3.69 |
अध्यायेष्वेवर्षेः |
|
4.3.70 |
पौरोडाशपुरोडाशात् ष्ठन् |
|
4.3.71 |
छन्दसो यदणौ |
|
4.3.72 |
द्व्यजृद्ब्राह्मणर्क्प्रथमाध्वरपुरश्चरणनामाख्याताट्ठक् |
|
4.3.73 |
अणृगयनादिभ्यः |
|
4.3.74 |
तत आगतः |
|
4.3.75 |
ठगायस्थानेभ्यः |
|
4.3.76 |
शुण्डिकादिभ्योऽण् |
|
4.3.77 |
विद्यायोनिसंबन्धेभ्यो वुञ् |
|
4.3.78 |
ऋतष्ठञ् |
|
4.3.79 |
पितुर्यच्च |
|
4.3.80 |
गोत्रादङ्कवत् |
|
4.3.81 |
हेतुमनुष्येभ्योऽन्यतरस्यां रूप्यः |
|
4.3.82 |
मयट् च |
|
4.3.83 |
प्रभवति |
|
4.3.84 |
विदूराञ्ञ्यः |
|
4.3.85 |
तद्गच्छति पथिदूतयोः |
|
4.3.86 |
अभिनिष्क्रामति द्वारम् |
|
4.3.87 |
अधिकृत्य कृते ग्रन्थे |
|
4.3.88 |
शिशुक्रन्दयमसभद्वंद्वेन्द्रजननादिभ्यश्छः |
|
4.3.89 |
सोऽस्य निवासः |
|
4.3.90 |
अभिजनश्च |
|
4.3.91 |
आयुधजीविभ्यश्छः पर्वते |
|
4.3.92 |
शण्डिकादिभ्यो ञ्यः |
|
4.3.93 |
सिन्धुतक्षशिलाऽऽदिभ्योऽणञौ |
|
4.3.94 |
तूदीशलातुरवर्मतीकूचवाराड्ढक्छण्ढञ्यकः |
|
4.3.95 |
भक्तिः |
|
4.3.96 |
अचित्ताददेशकालाट्ठक् |
|
4.3.97 |
महाराजाट्ठञ् |
|
4.3.98 |
वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन् |
|
4.3.99 |
गोत्रक्षत्रियाख्येभ्यो बहुलं वुञ् |
|
4.3.100 |
जनपदिनां जनपदवत् सर्वं जनपदेन समानशब्दानां बहुवचने |
|
4.3.101 |
तेन प्रोक्तम् |
|
4.3.102 |
तित्तिरिवरतन्तुखण्डिकोखाच्छण् |
|
4.3.103 |
काश्यपकौशिकाभ्यामृषिभ्यां णिनिः |
|
4.3.104 |
कलापिवैशम्पायनान्तेवासिभ्यश्च |
|
4.3.105 |
पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु |
|
4.3.106 |
शौनकादिभ्यश्छन्दसि |
|
4.3.107 |
कठचरकाल्लुक् |
|
4.3.108 |
कलापिनोऽण् |
|
4.3.109 |
छगलिनो ढिनुक् |
|
4.3.110 |
पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः |
|
4.3.111 |
कर्मन्दकृशाश्वादिनिः |
|
4.3.112 |
तेनैकदिक् |
|
4.3.113 |
तसिश्च |
|
4.3.114 |
उरसो यच्च |
|
4.3.115 |
उपज्ञाते |
|
4.3.116 |
कृते ग्रन्थे |
|
4.3.117 |
संज्ञायाम् |
|
4.3.118 |
कुलालादिभ्यो वुञ् |
|
4.3.119 |
क्षुद्राभ्रमरवटरपादपादञ् |
|
4.3.120 |
तस्येदम् |
|
4.3.121 |
रथाद्यत् |
|
4.3.122 |
पत्त्रपूर्वादञ् |
|
4.3.123 |
पत्त्राध्वर्युपरिषदश्च |
|
4.3.124 |
हलसीराट्ठक् |
|
4.3.125 |
द्वंद्वाद्वुन् वैरमैथुनिकयोः |
|
4.3.126 |
गोत्रचरणाद्वुञ् |
|
4.3.127 |
संघाङ्कलक्षणेष्वञ्यञिञामण् |
|
4.3.128 |
शाकलाद्वा |
|
4.3.129 |
छन्दोगौक्थिकयाज्ञिकबह्वृचनटाञ्ञ्यः |
|
4.3.130 |
न दण्डमाणवान्तेवासिषु |
|
4.3.131 |
रैवतिकादिभ्यश्छः |
|
4.3.132 |
कौपिञ्जलहास्तिपदादण् |
|
4.3.133 |
आथर्वणिकस्येकलोपश्च |
|
4.3.134 |
तस्य विकारः |
|
4.3.135 |
अवयवे च प्राण्योषधिवृक्षेभ्यः |
|
4.3.136 |
बिल्वादिभ्योऽण् |
|
4.3.137 |
कोपधाच्च |
|
4.3.138 |
त्रपुजतुनोः षुक् |
|
4.3.139 |
ओरञ् |
|
4.3.140 |
अनुदात्तादेश्च |
|
4.3.141 |
पलाशादिभ्यो वा |
|
4.3.142 |
शम्याः ष्लञ् ।
|
4.3.143 |
मयड्वैतयोर्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः |
|
4.3.144 |
नित्यं वृद्धशरादिभ्यः |
|
4.3.145 |
गोश्च पुरीषे |
|
4.3.146 |
पिष्टाच्च |
|
4.3.147 |
संज्ञायां कन् |
|
4.3.148 |
व्रीहेः पुरोडाशे |
|
4.3.149 |
असंज्ञायां तिलयवाभ्याम् |
|
4.3.150 |
द्व्यचश्छन्दसि |
|
4.3.151 |
नोत्वद्वर्ध्रबिल्वात् |
|
4.3.152 |
तालादिभ्योऽण् |
|
4.3.153 |
जातरूपेभ्यः परिमाणे |
|
4.3.154 |
प्राणिरजतादिभ्योऽञ् |
|
4.3.155 |
ञितश्च तत्प्रत्ययात् |
|
4.3.156 |
क्रीतवत् परिमाणात् |
|
4.3.157 |
उष्ट्राद्वुञ् |
|
4.3.158 |
उमोर्णयोर्वा |
|
4.3.159 |
एण्या ढञ् |
|
4.3.160 |
गोपयसोर्यत् |
|
4.3.161 |
द्रोश्च |
|
4.3.162 |
माने वयः |
|
4.3.163 |
फले लुक् |
|
4.3.164 |
प्लक्षादिभ्योऽण् |
|
4.3.165 |
जम्ब्वा वा |
|
4.3.166 |
लुप् च |
|
4.3.167 |
हरीतक्यादिभ्यश्च |
|
4.3.168 |
कंसीयपरशव्ययोर्यञञौ लुक् च |
|
4.4.1 |
प्राग्वहतेष्ठक् |
|
4.4.2 |
तेन दीव्यति खनति जयति जितम् |
|
4.4.3 |
संस्कृतम् |
|
4.4.4 |
कुलत्थकोपधादण् |
|
4.4.5 |
तरति |
|
4.4.6 |
गोपुच्छाट्ठञ् |
|
4.4.7 |
नौद्व्यचष्ठन् |
|
4.4.8 |
चरति |
|
4.4.9 |
आकर्षात् ष्ठल् |
|
4.4.10 |
पर्पादिभ्यः ष्ठन् |
|
4.4.11 |
श्वगणाट्ठञ्च |
|
4.4.12 |
वेतनादिभ्यो जीवति |
|
4.4.13 |
वस्नक्रयविक्रयाट्ठन् |
|
4.4.14 |
आयुधाच्छ च |
|
4.4.15 |
हरत्युत्सङ्गादिभ्यः |
|
4.4.16 |
भस्त्राऽऽदिभ्यः ष्ठन् |
|
4.4.17 |
विभाषा विवधवीवधात् |
|
4.4.18 |
अण् कुटिलिकायाः |
|
4.4.19 |
निर्वृत्तेऽक्षद्यूतादिभ्यः |
|
4.4.20 |
क्त्रेर्मम् नित्यं |
|
4.4.21 |
अपमित्ययाचिताभ्यां कक्कनौ |
|
4.4.22 |
संसृष्टे |
|
4.4.23 |
चूर्णादिनिः |
|
4.4.24 |
लवणाल्लुक् |
|
4.4.25 |
मुद्गादण् |
|
4.4.26 |
व्यञ्जनैरुपसिक्ते |
|
4.4.27 |
ओजस्सहोऽम्भसा वर्तते |
|
4.4.28 |
तत् प्रत्यनुपूर्वमीपलोमकूलम् |
|
4.4.29 |
परिमुखं च |
|
4.4.30 |
प्रयच्छति गर्ह्यम् |
|
4.4.31 |
कुसीददशैकादशात् ष्ठन्ष्ठचौ |
|
4.4.32 |
उञ्छति |
|
4.4.33 |
रक्षति |
|
4.4.34 |
शब्ददर्दुरं करोति |
|
4.4.35 |
पक्षिमत्स्यमृगान् हन्ति |
|
4.4.36 |
परिपन्थं च तिष्ठति |
|
4.4.37 |
माथोत्तरपदपदव्यनुपदं धावति |
|
4.4.38 |
आक्रन्दाट्ठञ्च |
|
4.4.39 |
पदोत्तरपदं गृह्णाति |
|
4.4.40 |
प्रतिकण्ठार्थललामं च |
|
4.4.41 |
धर्मं चरति |
|
4.4.42 |
प्रतिपथमेति ठंश्च |
|
4.4.43 |
समवायान् समवैति |
|
4.4.44 |
परिषदो ण्यः |
|
4.4.45 |
सेनाया वा |
|
4.4.46 |
संज्ञायां ललाटकुक्कुट्यौ पश्यति |
|
4.4.47 |
तस्य धर्म्यम् |
|
4.4.48 |
अण् महिष्यादिभ्यः |
|
4.4.49 |
ऋतोऽञ् |
|
4.4.50 |
अवक्रयः |
|
4.4.51 |
तदस्य पण्यम् |
|
4.4.52 |
लवणाट्ठञ् |
|
4.4.53 |
किशरादिभ्यः ष्ठन् |
|
4.4.54 |
शलालुनोऽन्यतरस्याम् |
|
4.4.55 |
शिल्पम् |
|
4.4.56 |
मड्डुकझर्झरादणन्यतरस्याम् |
|
4.4.57 |
प्रहरणम् |
|
4.4.58 |
परश्वधाट्ठञ्च |
|
4.4.59 |
शक्तियष्ट्योरीकक् |
|
4.4.60 |
अस्तिनास्तिदिष्टं मतिः |
|
4.4.61 |
शीलम् |
|
4.4.62 |
छत्रादिभ्यो णः |
|
4.4.63 |
कर्माध्ययने वृत्तम् |
|
4.4.64 |
बह्वच्पूर्वपदाट्ठच् |
|
4.4.65 |
हितं भक्षाः |
|
4.4.66 |
तदस्मै दीयते नियुक्तम् |
|
4.4.67 |
श्राणामांसौदनाट्टिठन् |
|
4.4.68 |
भक्तादणन्यतरस्याम् |
|
4.4.69 |
तत्र नियुक्तः |
|
4.4.70 |
अगारान्ताट्ठन् |
|
4.4.71 |
अध्यायिन्यदेशकालात् |
|
4.4.72 |
कठिनान्तप्रस्तारसंस्थानेषु व्यवहरति |
|
4.4.73 |
निकटे वसति |
|
4.4.74 |
आवसथात् ष्ठल् |
|
4.4.75 |
प्राग्घिताद्यत् |
|
4.4.76 |
तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम् |
|
4.4.77 |
धुरो यड्ढकौ |
|
4.4.78 |
खः सर्वधुरात् |
|
4.4.79 |
एकधुराल्लुक् च |
|
4.4.80 |
शकटादण् |
|
4.4.81 |
हलसीराट्ठक् |
|
4.4.82 |
संज्ञायां जन्याः |
|
4.4.83 |
विध्यत्यधनुषा |
|
4.4.84 |
धनगणं लब्धा |
|
4.4.85 |
अन्नाण्णः |
|
4.4.86 |
वशं गतः |
|
4.4.87 |
पदमस्मिन् दृश्यम् |
|
4.4.88 |
मूलमस्याबर्हि |
|
4.4.89 |
संज्ञायां धेनुष्या |
|
4.4.90 |
गृहपतिना संयुक्ते ञ्यः |
|
4.4.91 |
नौवयोधर्मविषमूलमूलसीतातुलाभ्यस्तार्यतुल्यप्राप्यवध्यानाम्यसमसमितसम्मितेषु |
|
4.4.92 |
धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते |
|
4.4.93 |
छन्दसो निर्मिते |
|
4.4.94 |
उरसोऽण् च |
|
4.4.95 |
हृदयस्य प्रियः |
|
4.4.96 |
बन्धने चर्षौ |
|
4.4.97 |
मतजनहलात् करणजल्पकर्षेषु |
|
4.4.98 |
तत्र साधुः |
|
4.4.99 |
प्रतिजनादिभ्यः खञ् |
|
4.4.100 |
भक्ताण्णः |
|
4.4.101 |
परिषदो ण्यः |
|
4.4.102 |
कथाऽऽदिभ्यष्ठक् |
|
4.4.103 |
गुडादिभ्यष्ठञ् |
|
4.4.104 |
पथ्यतिथिवसतिस्वपतेर्ढञ् |
|
4.4.105 |
सभाया यः |
|
4.4.106 |
ढश्छन्दसि |
|
4.4.107 |
समानतीर्थे वासी |
|
4.4.108 |
समानोदरे शयित ओ चोदात्तः |
|
4.4.109 |
सोदराद्यः |
|
4.4.110 |
भवे छन्दसि |
|
4.4.111 |
पाथोनदीभ्यां ड्यण् |
|
4.4.112 |
वेशन्तहिमवद्भ्यामण् |
|
4.4.113 |
स्रोतसो विभाषा ड्यड्ड्यौ |
|
4.4.114 |
सगर्भसयूथसनुताद्यन् |
|
4.4.115 |
तुग्राद्घन् |
|
4.4.116 |
अग्राद्यत् |
|
4.4.117 |
घच्छौ च |
|
4.4.118 |
समुद्राभ्राद्घः |
|
4.4.119 |
बर्हिषि दत्तम् |
|
4.4.120 |
दूतस्य भागकर्मणी |
|
4.4.121 |
रक्षोयातूनां हननी |
|
4.4.122 |
रेवतीजगतीहविष्याभ्यः प्रशस्ये |
|
4.4.123 |
असुरस्य स्वम् |
|
4.4.124 |
मायायामण् |
|
4.4.125 |
तद्वानासामुपधानो मन्त्र इतीष्टकासु लुक् च मतोः |
|
4.4.126 |
अश्विमानण् |
|
4.4.127 |
वयस्यासु मूर्ध्नो मतुप् |
|
4.4.128 |
मत्वर्थे मासतन्वोः |
|
4.4.129 |
मधोर्ञ च |
|
4.4.130 |
ओजसोऽहनि यत्खौ |
|
4.4.131 |
वेशोयशआदेर्भगाद्यल् |
|
4.4.132 |
ख च |
|
4.4.133 |
पूर्वैः कृतमिनियौ च |
|
4.4.134 |
अद्भिः संस्कृतम् |
|
4.4.135 |
सहस्रेण संमितौ घः |
|
4.4.136 |
मतौ च |
|
4.4.137 |
सोममर्हति यः |
|
4.4.138 |
मये च |
|
4.4.139 |
मधोः |
|
4.4.140 |
वसोः समूहे च |
|
4.4.141 |
नक्षत्राद्घः |
|
4.4.142 |
सर्वदेवात् तातिल् |
|
4.4.143 |
शिवशमरिष्टस्य करे |
|
4.4.144 |
भावे च |
|
5.1.1 |
प्राक् क्रीताच्छः |
|
5.1.2 |
उगवादिभ्योऽत् |
|
5.1.3 |
कम्बलाच्च संज्ञायाम् |
|
5.1.4 |
विभाषा हविरपूपादिभ्यः |
|
5.1.5 |
तस्मै हितम् |
|
5.1.6 |
शरीरावयवाद्यत् |
|
5.1.7 |
खलयवमाषतिलवृषब्रह्मणश्च |
|
5.1.8 |
अजाविभ्यां थ्यन् |
|
5.1.9 |
आत्मन्विश्वजनभोगोत्तरपदात् खः |
|
5.1.10 |
सर्वपुरुषाभ्यां णढञौ |
|
5.1.11 |
माणवचरकाभ्यां खञ् |
|
5.1.12 |
तदर्थं विकृतेः प्रकृतौ |
|
5.1.13 |
छदिरुपधिबलेः ढञ् |
|
5.1.14 |
ऋषभोपानहोर्ञ्यः |
|
5.1.15 |
चर्म्मणोऽञ् |
|
5.1.16 |
तदस्य तदस्मिन् स्यादिति |
|
5.1.17 |
परिखाया ढञ् |
|
5.1.18 |
प्राग्वतेष्ठञ् |
|
5.1.19 |
आर्हादगोपुच्छसंख्यापरिमाणाट्ठक् |
|
5.1.20 |
असमासे निष्कादिभ्यः |
|
5.1.21 |
शताच्च ठन्यतावशते |
|
5.1.22 |
संख्याया अतिशदन्तायाः कन् |
|
5.1.23 |
वतोरिड्वा |
|
5.1.24 |
विंशतित्रिंशद्भ्यां ड्वुन्नसंज्ञायाम् |
|
5.1.25 |
कंसाट्टिठन् |
|
5.1.26 |
शूर्पादञन्यतरस्याम् |
|
5.1.27 |
शतमानविंशतिकसहस्रवसनादण् |
|
5.1.28 |
अध्यर्धपूर्वद्विगोर्लुगसंज्ञायाम् |
|
5.1.29 |
विभाषा कार्षापणसहस्राभ्याम् |
|
5.1.30 |
द्वित्रिपूर्वान्निष्कात् |
|
5.1.31 |
बिस्ताच्च |
|
5.1.32 |
विंशतिकात् खः |
|
5.1.33 |
खार्या ईकन् |
|
5.1.34 |
पणपादमाषशतादत् |
|
5.1.35 |
शाणाद्वा |
|
5.1.36 |
द्वित्रिपूर्वादण् च |
|
5.1.37 |
तेन क्रीतम् |
|
5.1.38 |
तस्य निमित्तं संयोगोत्पातौ |
|
5.1.39 |
गोद्व्यचोरसंख्यापरिमाणाश्वादेर्यत् |
|
5.1.40 |
पुत्राच्छ च |
|
5.1.41 |
सर्वभूमिपृथिवीभ्यामणञौ |
|
5.1.42 |
तस्येश्वरः |
|
5.1.43 |
तत्र विदित इति च |
|
5.1.44 |
लोकसर्वलोकाट्ठञ् |
|
5.1.45 |
तस्य वापः |
|
5.1.46 |
पात्रात् ष्ठन् |
|
5.1.47 |
तदस्मिन् वृद्ध्यायलाभशुल्कोपदा दीयते |
|
5.1.48 |
पूरणार्धाट्ठन् |
|
5.1.49 |
भागाद्यच्च |
|
5.1.50 |
तद्धरति वहत्यावहति भाराद्वंशादिभ्यः |
|
5.1.51 |
वस्नद्रव्याभ्यां ठन्कनौ |
|
5.1.52 |
सम्भवत्यवहरति पचति |
|
5.1.53 |
आढकाचितपात्रात् खोऽन्यतरयाम् |
|
5.1.54 |
द्विगोष्ठंश्च |
|
5.1.55 |
कुलिजाल्लुक्खौ च |
|
5.1.56 |
सोऽस्यांशवस्नभृतयः |
|
5.1.57 |
तदस्य परिमाणम् |
|
5.1.58 |
संख्यायाः संज्ञासंघसूत्राध्ययनेषु |
|
5.1.59 |
पङ्क्तिविंशतित्रिंशत्चत्वारिंशत्पञ्चाशत्षष्टिसप्तत्यशीतिनवतिशतम् |
|
5.1.60 |
पञ्चद्दशतौ वर्गे वा |
|
5.1.61 |
सप्तनोऽञ् छन्दसि |
|
5.1.62 |
त्रिंशच्चत्वारिंशतोर्ब्राह्मणे संज्ञायां डण् |
|
5.1.63 |
तद् अर्हति |
|
5.1.64 |
छेदादिभ्यो नित्यम् |
|
5.1.65 |
शीर्षच्छेदाद्यच्च |
|
5.1.66 |
दण्डादिभ्यः |
|
5.1.67 |
छन्दसि च |
|
5.1.68 |
पात्राद्घंश्च |
|
5.1.69 |
कडङ्गरदक्षिणाच्छ च |
|
5.1.70 |
स्थालीबिलात् |
|
5.1.71 |
यज्ञर्त्विग्भ्यां घखञौ |
|
5.1.72 |
पारायणतुरायणचान्द्रायणं वर्तयति |
|
5.1.73 |
संशयमापन्नः |
|
5.1.74 |
योजनं गच्छति |
|
5.1.75 |
पथः ष्कन् |
|
5.1.76 |
पन्थो ण नित्यम् |
|
5.1.77 |
उत्तरपथेनाहृतं च |
|
5.1.78 |
कालात् |
|
5.1.79 |
तेन निर्वृत्तम् |
|
5.1.80 |
तमधीष्टो भृतो भूतो भावी |
|
5.1.81 |
मासाद्वयसि यत्खञौ |
|
5.1.82 |
द्विगोर्यप् |
|
5.1.83 |
षण्मासाण्ण्यच्च |
|
5.1.84 |
अवयसि ठंश्च |
|
5.1.85 |
समायाः खः |
|
5.1.86 |
द्विगोर्वा |
|
5.1.87 |
रात्र्यहस्संवत्सराच्च |
|
5.1.88 |
वर्षाल्लुक् च |
|
5.1.89 |
चित्तवति नित्यम् |
|
5.1.90 |
षष्टिकाः षष्टिरात्रेण पच्यन्ते |
|
5.1.91 |
वत्सरान्ताच्छश्छन्दसि |
|
5.1.92 |
सम्परिपूर्वात् ख च |
|
5.1.93 |
तेन परिजय्यलभ्यकार्यसुकरम् |
|
5.1.94 |
तदस्य ब्रह्मचर्यम् |
|
5.1.95 |
तस्य च दक्षिणा यज्ञाख्येभ्यः |
|
5.1.96 |
तत्र च दीयते कार्यं भववत् |
|
5.1.97 |
व्युष्टादिभ्योऽण् |
|
5.1.98 |
तेन यथाकथाचहस्ताभ्यां णयतौ |
|
5.1.99 |
सम्पादिनि |
|
5.1.100 |
कर्मवेषाद्यत् |
|
5.1.101 |
तस्मै प्रभवति संतापादिभ्यः |
|
5.1.102 |
योगाद्यच्च |
|
5.1.103 |
कर्मण उकञ् |
|
5.1.104 |
समयस्तदस्य प्राप्तम् |
|
5.1.105 |
ऋतोरण् |
|
5.1.106 |
छन्दसि घस् |
|
5.1.107 |
कालाद्यत् |
|
5.1.108 |
प्रकृष्टे ठञ् |
|
5.1.109 |
प्रयोजनम् |
|
5.1.110 |
विशाखाऽऽषाढादण् मन्थदण्डयोः |
|
5.1.111 |
अनुप्रवचनादिभ्यश्छः |
|
5.1.112 |
समापनात् सपूर्वपदात् |
|
5.1.113 |
ऐकागारिकट् चौरे |
|
5.1.114 |
आकालिकडाद्यन्तवचने |
|
5.1.115 |
तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः |
|
5.1.116 |
तत्र तस्येव |
|
5.1.117 |
तदर्हम् |
|
5.1.118 |
उपसर्गाच्छन्दसि धात्वर्थे |
|
5.1.119 |
तस्य भावस्त्वतलौ |
|
5.1.120 |
आ च त्वात् |
|
5.1.121 |
न नञ्पूर्वात्तत्पुरुषादचतुरसंगतलवणवटयुधकतरसलसेभ्यः |
|
5.1.122 |
पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा |
|
5.1.123 |
वर्णदृढादिभ्यः ष्यञ् च |
|
5.1.124 |
गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च |
|
5.1.125 |
स्तेनाद्यन्नलोपश्च |
|
5.1.126 |
सख्युर्यः |
|
5.1.127 |
कपिज्ञात्योर्ढक् |
|
5.1.128 |
पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक् |
|
5.1.129 |
प्राणभृज्जातिवयोवचनोद्गात्रादिभ्योऽञ् |
|
5.1.130 |
हायनान्तयुवादिभ्योऽण् |
|
5.1.131 |
इगन्ताच्च लघुपूर्वात् |
|
5.1.132 |
योपधाद्गुरूपोत्तमाद्वुञ् |
|
5.1.133 |
द्वंद्वमनोज्ञादिभ्यश्च |
|
5.1.134 |
गोत्रचरणाच्श्लाघाऽत्याकारतदवेतेषु |
|
5.1.135 |
होत्राभ्यश्छः |
|
5.1.136 |
ब्रह्मणस्त्वः |
|
5.2.1 |
धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ् |
|
5.2.2 |
व्रीहिशाल्योर्ढक् |
|
5.2.3 |
यवयवकषष्टिकादत् |
|
5.2.4 |
विभाषा तिलमाषोमाभङ्गाऽणुभ्यः |
|
5.2.5 |
सर्वचर्मणः कृतः खखञौ |
|
5.2.6 |
यथामुखसंमुखस्य दर्शनः खः |
|
5.2.7 |
तत्सर्वादेः पथ्यङ्गकर्मपत्रपात्रं व्याप्नोति |
|
5.2.8 |
आप्रपदं प्राप्नोति |
|
5.2.9 |
अनुपदसर्वान्नायानयं बद्धाभक्षयतिनेयेषु |
|
5.2.10 |
परोवरपरम्परपुत्रपौत्रमनुभवति |
|
5.2.11 |
अवारपारात्यन्तानुकामं गामी |
|
5.2.12 |
समांसमां विजायते |
|
5.2.13 |
अद्यश्वीनाऽवष्टब्धे |
|
5.2.14 |
आगवीनः |
|
5.2.15 |
अनुग्वलंगामी |
|
5.2.16 |
अध्वनो यत्खौ |
|
5.2.17 |
अभ्यमित्राच्छ च |
|
5.2.18 |
गोष्ठात् खञ् भूतपूर्वे |
|
5.2.19 |
अश्वस्यैकाहगमः |
|
5.2.20 |
शालीनकौपीने अधृष्टाकार्ययोः |
|
5.2.21 |
व्रातेन जीवति |
|
5.2.22 |
साप्तपदीनं सख्यम् |
|
5.2.23 |
हैयंगवीनं संज्ञायाम् |
|
5.2.24 |
तस्य पाकमूले पील्वादिकर्णादिभ्यः कुणब्जाहचौ |
|
5.2.25 |
पक्षात्तिः |
|
5.2.26 |
तेन वित्तश्चुञ्चुप्चणपौ |
|
5.2.27 |
विनञ्भ्यां नानाञौ नसह |
|
5.2.28 |
वेः शालच्छङ्कटचौ |
|
5.2.29 |
सम्प्रोदश्च कटच् |
|
5.2.30 |
अवात् कुटारच्च |
|
5.2.31 |
नते नासिकायाः संज्ञायां टीटञ्नाटज्भ्रटचः |
|
5.2.32 |
नेर्बिडज्बिरीसचौ |
|
5.2.33 |
इनच्पिटच्चिकचि च |
|
5.2.34 |
उपाधिभ्यां त्यकन्नासन्नारूढयोः |
|
5.2.35 |
कर्मणि घटोऽठच् |
|
5.2.36 |
तदस्य संजातं तारकाऽऽदिभ्य इतच् |
|
5.2.37 |
प्रमाणे द्वयसज्दघ्नञ्मात्रचः |
|
5.2.38 |
पुरुषहस्तिभ्यामण् च |
|
5.2.39 |
यद्तदेतेभ्यः परिमाणे वतुप् |
|
5.2.40 |
किमिदंभ्यां वो घः |
|
5.2.41 |
किमः संख्यापरिमाणे डति च |
|
5.2.42 |
संख्याया अवयवे तयप् |
|
5.2.43 |
द्वित्रिभ्यां तयस्यायज्वा |
|
5.2.44 |
उभादुदात्तो नित्यम् |
|
5.2.45 |
तदस्मिन्नधिकमिति दशान्ताड्डः |
|
5.2.46 |
शदन्तविंशतेश्च |
|
5.2.47 |
संख्याया गुणस्य निमाने मयट् |
|
5.2.48 |
तस्य पूरणे डट् |
|
5.2.49 |
नान्तादसंख्याऽऽदेर्मट् |
|
5.2.50 |
थट् च च्छन्दसि |
|
5.2.51 |
षट्कतिकतिपयचतुरां थुक् |
|
5.2.52 |
बहुपूगगणसंघस्य तिथुक् |
|
5.2.53 |
वतोरिथुक् |
|
5.2.54 |
द्वेस्तीयः |
|
5.2.55 |
त्रेः सम्प्रसारणम् च |
|
5.2.56 |
विंशत्यादिभ्यस्तमडन्यतरस्याम् |
|
5.2.57 |
नित्यं शतादिमासार्धमाससंवत्सराच्च |
|
5.2.58 |
षष्ट्यादेश्चासंख्याऽऽदेः |
|
5.2.59 |
मतौ च्छः सूक्तसाम्नोः |
|
5.2.60 |
अध्यायानुवाकयोर्लुक् |
|
5.2.61 |
विमुक्तादिभ्योऽण् |
|
5.2.62 |
गोषदादिभ्यो वुन् |
|
5.2.63 |
तत्र कुशलः पथः |
|
5.2.64 |
आकर्षादिभ्यः कन् |
|
5.2.65 |
धनहिरण्यात् कामे |
|
5.2.66 |
स्वाङ्गेभ्यः प्रसिते |
|
5.2.67 |
उदराट्ठगाद्यूने |
|
5.2.68 |
सस्येन परिजातः |
|
5.2.69 |
अंशं हारी |
|
5.2.70 |
तन्त्रादचिरापहृते |
|
5.2.71 |
ब्राह्मणकोष्णिके संज्ञायाम् |
|
5.2.72 |
शीतोष्णाभ्यां कारिणि |
|
5.2.73 |
अधिकम् |
|
5.2.74 |
अनुकाभिकाभीकः कमिता |
|
5.2.75 |
पार्श्वेनान्विच्छति |
|
5.2.76 |
अयःशूलदण्डाजिनाभ्यां ठक्ठञौ |
|
5.2.77 |
तावतिथं ग्रहणमिति लुग्वा |
|
5.2.78 |
स एषां ग्रामणीः |
|
5.2.79 |
शृङ्खलमस्य बन्धनं करभे |
|
5.2.80 |
उत्क उन्मनाः |
|
5.2.81 |
कालप्रयोजनाद्रोगे |
|
5.2.82 |
तदस्मिन्नन्नं प्राये संज्ञायाम् |
|
5.2.83 |
कुल्माषादञ् |
|
5.2.84 |
श्रोत्रियंश्छन्दोऽधीते |
|
5.2.85 |
श्राद्धमनेन भुक्तमिनिठनौ |
|
5.2.86 |
पूर्वादिनिः |
|
5.2.87 |
सपूर्वाच्च |
|
5.2.88 |
इष्टादिभ्यश्च |
|
5.2.89 |
छन्दसि परिपन्थिपरिपरिणौ पर्यवस्थातरि |
|
5.2.90 |
अनुपद्यन्वेष्टा |
|
5.2.91 |
साक्षाद्द्रष्टरि संज्ञायाम् |
|
5.2.92 |
क्षेत्रियच् परक्षेत्रे चिकित्स्यः |
|
5.2.93 |
'इन्द्रियमिन्द्रलिंगमिन्द्रदृष्टमिन्द्रसृष्टमिन्द्रजुष्टम्इन्द्रदत्तमिति वा |
|
5.2.94 |
तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् |
|
5.2.95 |
रसादिभ्यश्च |
|
5.2.96 |
प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम् |
|
5.2.97 |
सिध्मादिभ्यश्च |
|
5.2.98 |
वत्सांसाभ्यां कामबले |
|
5.2.99 |
फेनादिलच् च |
|
5.2.100 |
लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः |
|
5.2.101 |
प्रज्ञाश्रद्धाऽर्चावृत्तिभ्यो णः |
|
5.2.102 |
तपःसहस्राभ्यां विनीनी |
|
5.2.103 |
अण् च |
|
5.2.104 |
सिकताशर्कराभ्यां च |
|
5.2.105 |
देशे लुबिलचौ च |
|
5.2.106 |
दन्त उन्नत उरच् |
|
5.2.107 |
ऊषसुषिमुष्कमधो रः |
|
5.2.108 |
द्युद्रुभ्यां मः |
|
5.2.109 |
केशाद्वोऽन्यतरस्याम् |
|
5.2.110 |
गाण्ड्यजगात् संज्ञायाम् |
|
5.2.111 |
काण्डाण्डादीरन्नीरचौ |
|
5.2.112 |
रजःकृष्यासुतिपरिषदो वलच् |
|
5.2.113 |
दन्तशिखात् संज्ञायाम् |
|
5.2.114 |
ज्योत्स्नातमिस्राशृङ्गिणोजस्विन्नूर्जस्वलगोमिन्मलिनमलीमसाः |
|
5.2.115 |
अत इनिठनौ |
|
5.2.116 |
व्रीह्यादिभ्यश्च |
|
5.2.117 |
तुन्दादिभ्य इलच् च |
|
5.2.118 |
एकगोपूर्वाट्ठञ् नित्यम् |
|
5.2.119 |
शतसहस्रान्ताच्च निष्कात् |
|
5.2.120 |
रूपादाहतप्रशंसयोरप् |
|
5.2.121 |
अस्मायामेधास्रजो विनिः |
|
5.2.122 |
बहुलं छन्दसि |
|
5.2.123 |
ऊर्णाया युस् |
|
5.2.124 |
वाचो ग्मिनिः |
|
5.2.125 |
आलजाटचौ बहुभाषिणि |
|
5.2.126 |
स्वामिन्नैश्वर्ये |
|
5.2.127 |
अर्शआदिभ्योऽच् |
|
5.2.128 |
द्वंद्वोपतापगर्ह्यात् प्राणिस्थादिनिः |
|
5.2.129 |
वातातिसाराभ्यां कुक् च |
|
5.2.130 |
वयसि पूरणात् |
|
5.2.131 |
सुखादिभ्यश्च |
|
5.2.132 |
धर्मशीलवर्णान्ताच्च |
|
5.2.133 |
हस्ताज्जातौ |
|
5.2.134 |
वर्णाद्ब्रह्मचारिणि |
|
5.2.135 |
पुष्करादिभ्यो देशे |
|
5.2.136 |
बलादिभ्यो मतुबन्यतरस्याम् |
|
5.2.137 |
संज्ञायां मन्माभ्याम् |
|
5.2.138 |
कंशंभ्यां बभयुस्तितुतयसः |
|
5.2.139 |
तुन्दिवलिवटेर्भः |
|
5.2.140 |
अहंशुभमोर्युस् |
|
5.3.1 |
प्राग्दिशो विभक्तिः |
|
5.3.2 |
किंसर्वनामबहुभ्योऽद्व्यादिभ्यः |
|
5.3.3 |
इदम इश् |
|
5.3.4 |
एतेतौ रथोः |
|
5.3.5 |
एतदोऽश् |
|
5.3.6 |
सर्वस्य सोऽन्यतरस्यां दि |
|
5.3.7 |
पञ्चम्यास्तसिल् |
|
5.3.8 |
तसेश्च |
|
5.3.9 |
पर्यभिभ्यां च |
|
5.3.10 |
सप्तम्यास्त्रल् |
|
5.3.11 |
इदमो हः |
|
5.3.12 |
किमोऽत् |
|
5.3.13 |
वा ह च च्छन्दसि |
|
5.3.14 |
इतराभ्योऽपि दृश्यन्ते |
|
5.3.15 |
सर्वैकान्यकिंयत्तदः काले दा |
|
5.3.16 |
इदमो र्हिल् |
|
5.3.17 |
अधुना |
|
5.3.18 |
दानीं च |
|
5.3.19 |
तदो दा च |
|
5.3.20 |
तयोर्दार्हिलौ च च्छन्दसि |
|
5.3.21 |
अनद्यतने र्हिलन्यतरस्याम् |
|
5.3.22 |
सद्यःपरुत्परार्यैषमःपरेद्यव्यद्यपूर्वेद्युरन्येद्युरन्यतरेद्युरितरेद्युरपरेद्युरधरेद्युरुभयेद्युरुत्तरेद्युः |
|
5.3.23 |
प्रकारवचने थाल् |
|
5.3.24 |
इदमस्थमुः |
|
5.3.25 |
किमश्च |
|
5.3.26 |
था हेतौ च च्छन्दसि |
|
5.3.27 |
दिक्शब्देभ्यः सप्तमीपञ्चमीप्रथमाभ्यो दिग्देशकालेष्वस्तातिः |
|
5.3.28 |
दक्षिणोत्तराभ्यामतसुच् |
|
5.3.29 |
विभाषा परावराभ्याम् |
|
5.3.30 |
अञ्चेर्लुक् |
|
5.3.31 |
उपर्युपरिष्टात् |
|
5.3.32 |
पश्चात् |
|
5.3.33 |
पश्च पश्चा च च्छन्दसि |
|
5.3.34 |
उत्तराधरदक्षिणादातिः |
|
5.3.35 |
एनबन्यतरस्यामदूरेऽपञ्चम्याः |
|
5.3.36 |
दक्षिणादाच् |
|
5.3.37 |
आहि च दूरे |
|
5.3.38 |
उत्तराच्च |
|
5.3.39 |
पूर्वाधरावराणामसि पुरधवश्चैषाम् |
|
5.3.40 |
अस्ताति च |
|
5.3.41 |
विभाषाऽवरस्य |
|
5.3.42 |
संख्याया विधाऽर्थे धा |
|
5.3.43 |
अधिकरणविचाले च |
|
5.3.44 |
एकाद्धो ध्यमुञन्यारयाम् |
|
5.3.45 |
द्वित्र्योश्च धमुञ् |
|
5.3.46 |
एधाच्च |
|
5.3.47 |
याप्ये पाशप् |
|
5.3.48 |
पूरणाद्भागे तीयादन् |
|
5.3.49 |
प्रागेकादशभ्योऽच्छन्दसि |
|
5.3.50 |
षष्ठाष्टमाभ्यां ञ च |
|
5.3.51 |
मानपश्वङ्गयोः कन्लुकौ च |
|
5.3.52 |
एकादाकिनिच्चासहाये |
|
5.3.53 |
भूतपूर्वे चरट् |
|
5.3.54 |
षष्ठ्या रूप्य च |
|
5.3.55 |
अतिशायने तमबिष्ठनौ |
|
5.3.56 |
तिङश्च |
|
5.3.57 |
द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ |
|
5.3.58 |
अजादी गुणवचनादेव |
|
5.3.59 |
तुश्छन्दसि |
|
5.3.60 |
प्रशस्यस्य श्रः |
|
5.3.61 |
ज्य च |
|
5.3.62 |
वृद्धस्य च |
|
5.3.63 |
अन्तिकबाढयोर्नेदसाधौ |
|
5.3.64 |
युवाल्पयोः कनन्यतरस्याम् |
|
5.3.65 |
विन्मतोर्लुक् |
|
5.3.66 |
प्रशंसायां रूपप् |
|
5.3.67 |
ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः |
|
5.3.68 |
विभाषा सुपो बहुच् पुरस्तात्तु |
|
5.3.69 |
प्रकारवचने जातीयर्|
|
5.3.70 |
प्रागिवात्कः |
|
5.3.71 |
अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक् टेः |
|
5.3.72 |
कस्य च दः |
|
5.3.73 |
अज्ञाते |
|
5.3.74 |
कुत्सिते |
|
5.3.75 |
संज्ञायां कन् |
|
5.3.76 |
अनुकम्पायाम् |
|
5.3.77 |
नीतौ च तद्युक्तात् |
|
5.3.78 |
बह्वचो मनुष्यनाम्नष्ठज्वा |
|
5.3.79 |
घनिलचौ च |
|
5.3.80 |
प्राचामुपादेरडज्वुचौ च |
|
5.3.81 |
जातिनाम्नः कन् |
|
5.3.82 |
अजिनान्तस्योत्तरपदलोपश्च |
|
5.3.83 |
ठाजादावूर्ध्वं द्वितीयादचः |
|
5.3.84 |
शेवलसुपरिविशालवरुणार्यमादीनां तृतीयात् |
|
5.3.85 |
अल्पे |
|
5.3.86 |
ह्रस्वे |
|
5.3.87 |
संज्ञायां कन् |
|
5.3.88 |
कुटीशमीशुण्डाभ्यो रः |
|
5.3.89 |
कुत्वा डुपच् |
|
5.3.90 |
कासूगोणीभ्यां ष्टरच् |
|
5.3.91 |
वत्सोक्षाश्वर्षभेभ्यश्च तनुत्वे |
|
5.3.92 |
किंयत्तदो निर्द्धारणे द्वयोरेकस्य डतरच् |
|
5.3.93 |
वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच् |
|
5.3.94 |
एकाच्च प्राचाम् |
|
5.3.95 |
अवक्षेपणे कन् |
|
5.3.96 |
इवे प्रतिकृतौ |
|
5.3.97 |
संज्ञायां च |
|
5.3.98 |
लुम्मनुष्ये |
|
5.3.99 |
जीविकाऽर्थे चापण्ये |
|
5.3.100 |
देवपथादिभ्यश्च |
|
5.3.101 |
वस्तेर्ढञ् |
|
5.3.102 |
शिलाया ढः |
|
5.3.103 |
शाखाऽऽदिभ्यो यत् |
|
5.3.104 |
द्रव्यं च भव्ये |
|
5.3.105 |
कुशाग्राच्छः |
|
5.3.106 |
समासाच्च तद्विषयात् |
|
5.3.107 |
शर्कराऽऽदिभ्योऽण् |
|
5.3.108 |
अङ्गुल्यादिभ्यष्ठक् |
|
5.3.109 |
एकशालायाष्ठजन्यतरस्याम् |
|
5.3.110 |
कर्कलोहितादीकक् |
|
5.3.111 |
प्रत्नपूर्वविश्वेमात्थाल् छन्दसि |
|
5.3.112 |
पूगाञ्ञ्योऽग्रामणीपूर्वात् |
|
5.3.113 |
व्रातच्फञोरस्त्रियाम् |
|
5.3.114 |
आयुधजीविसंघाञ्ञ्यड्वाहीकेष्वब्राह्मणराजन्यात् |
|
5.3.115 |
वृकाट्टेण्यण् |
|
5.3.116 |
दामन्यादित्रिगर्तषष्ठाच्छः |
|
5.3.117 |
पर्श्वादियौधेयादिभ्यामणञौ |
|
5.3.118 |
'अभिजिद्विदभृच्छालावच्छिखावच्छमीवदूर्णावच्छ्रुमदणो यञ् |
|
5.3.119 |
ञ्य्आदयस्तद्राजाः |
|
5.4.1 |
पादशतस्य संख्याऽऽदेर्वीप्सायां वुन् लोपश्च |
|
5.4.2 |
दण्डव्यवसर्गयोश्च |
|
5.4.3 |
स्थूलादिभ्यः प्रकारवचने कन् |
|
5.4.4 |
अनत्यन्तगतौ क्तात् |
|
5.4.5 |
न सामिवचने |
|
5.4.6 |
बृहत्या आच्छादने |
|
5.4.7 |
अषडक्षाशितङ्ग्वलंकर्मालम्पुरुषाध्युत्तरपदात् खः |
|
5.4.8 |
विभाषा अञ्चेरदिक्स्त्रियाम् |
|
5.4.9 |
जात्यन्ताच्छ बन्धुनि |
|
5.4.10 |
स्थानान्ताद्विभाषा सस्थानेनेति चेत् |
|
5.4.11 |
किमेत्तिङव्ययघादाम्वद्रव्यप्रकर्षे |
|
5.4.12 |
अमु च च्छन्दसि |
|
5.4.13 |
अनुगादिनष्ठक् |
|
5.4.14 |
णचः स्त्रियामञ् |
|
5.4.15 |
अणिनुणः |
|
5.4.16 |
विसारिणो मत्स्ये |
|
5.4.17 |
संख्यायाः क्रियाऽभ्यावृत्तिगणने कृत्वसुच् |
|
5.4.18 |
द्वित्रिचतुर्भ्यः सुच् |
|
5.4.19 |
एकस्य सकृच्च |
|
5.4.20 |
विभाषा बहोर्धाऽविप्रकृष्टकाले |
|
5.4.21 |
तत्प्रकृतवचने मयट् |
|
5.4.22 |
समूहवच्च बहुषु |
|
5.4.23 |
अनन्तावसथेतिहभेषजाञ्ञ्यः |
|
5.4.24 |
देवतान्तात्तादर्थ्ये यत् |
|
5.4.25 |
पादार्घाभ्यां च |
|
5.4.26 |
अतिथेर्ञ्यः |
|
5.4.27 |
देवात्तल् |
|
5.4.28 |
अवेः कः |
|
5.4.29 |
यावादिभ्यः कन् |
|
5.4.30 |
लोहितान्मणौ |
|
5.4.31 |
वर्णे चानित्ये |
|
5.4.32 |
रक्ते |
|
5.4.33 |
कालाच्च |
|
5.4.34 |
विनयादिभ्यष्ठक् |
|
5.4.35 |
वाचो व्याहृतार्थायाम् |
|
5.4.36 |
तद्युक्तात् कर्मणोऽण् |
|
5.4.37 |
ओषधेरजातौ |
|
5.4.38 |
प्रज्ञादिभ्यश्च |
|
5.4.39 |
मृदस्तिकन् |
|
5.4.40 |
सस्नौ प्रशंसायाम् |
|
5.4.41 |
वृकज्येष्ठाभ्यां तिल्तातिलौ च च्छन्दसि |
|
5.4.42 |
बह्वल्पार्थाच्छस् कारकादन्यतरस्याम् |
|
5.4.43 |
संख्यैकवचनाच्च वीप्सायाम् |
|
5.4.44 |
प्रतियोगे पञ्चम्यास्तसिः |
|
5.4.45 |
अपादाने चाहीयरुहोः |
|
5.4.46 |
अतिग्रहाव्यथनक्षेपेष्वकर्तरि तृतीयायाः |
|
5.4.47 |
हीयमानपापयोगाच्च |
|
5.4.48 |
षष्ठ्या व्याश्रये |
|
5.4.49 |
रोगाच्चापनयने |
|
5.4.50 |
अभूततद्भावे कृभ्वस्तियोगे सम्पद्यकर्तरि च्विः |
|
5.4.51 |
अरुर्मनश्चक्षुश्चेतोरहोरजसां लोपश्च |
|
5.4.52 |
विभाषा साति कार्त्स्न्ये |
|
5.4.53 |
अभिविधौ सम्पदा च |
|
5.4.54 |
तदधीनवचने |
|
5.4.55 |
देये त्रा च |
|
5.4.56 |
देवमनुष्यपुरुषमर्त्येभ्यो द्वितीयासप्तम्योर्बहुलम् |
|
5.4.57 |
अव्यक्तानुकरणाद्द्व्यजवरार्धादनितौ डाच् |
|
5.4.58 |
कृञो द्वितीयतृतीयशम्बबीजात् कृषौ |
|
5.4.59 |
संख्यायाश्च गुणान्तायाः |
|
5.4.60 |
समयाच्च यापनायाम् |
|
5.4.61 |
सपत्त्रनिष्पत्रादतिव्यथने |
|
5.4.62 |
निष्कुलान्निष्कोषणे |
|
5.4.63 |
सुखप्रियादानुलोम्ये |
|
5.4.64 |
दुःखात् प्रातिलोम्ये |
|
5.4.65 |
शूलात् पाके |
|
5.4.66 |
सत्यादशपथे |
|
5.4.67 |
मद्रात् परिवापणे |
|
5.4.68 |
समासान्ताः |
|
5.4.69 |
न पूजनात् |
|
5.4.70 |
किमः क्षेपे |
|
5.4.71 |
नञस्तत्पुरुषात् |
|
5.4.72 |
पथो विभाषा |
|
5.4.73 |
बहुव्रीहौ संख्येये डजबहुगणात् |
|
5.4.74 |
ऋक्पूरप्धूःपथामानक्षे |
|
5.4.75 |
अच् प्रत्यन्ववपूर्वात् सामलोम्नः |
|
5.4.76 |
अक्ष्णोऽदर्शनात् |
|
5.4.77 |
अचतुरविचतुरसुचतुरस्त्रीपुंसधेन्वनडुहर्क्सामवाङ्मनसाक्षिभ्रुवदारगवोर्वष्ठीवपदष्ठीवनक्तंदिवरत्रिंदिवाहर्दिवसरजसनिःश्रेयसपुरुषायुषद्व्यायुषत्र्यायुषर्ग्यजुषजातोक्षमहोक्षवृद्धोक्षोपशुनगोष्ठश्वाः |
|
5.4.78 |
ब्रह्महस्तिभ्याम् वर्च्चसः |
|
5.4.79 |
अवसमन्धेभ्यस्तमसः |
|
5.4.80 |
श्वसो वसीयःश्रेयसः |
|
5.4.81 |
अन्ववतप्ताद्रहसः |
|
5.4.82 |
प्रतेरुरसः सप्तमीस्थात् |
|
5.4.83 |
अनुगवमायामे |
|
5.4.84 |
द्विस्तावा त्रिस्तावा वेदिः |
|
5.4.85 |
उपसर्गादध्वनः |
|
5.4.86 |
तत्पुरुषस्याङ्गुलेः संख्याऽव्ययादेः |
|
5.4.87 |
अहस्सर्वैकदेशसंख्यातपुण्याच्च रात्रेः |
|
5.4.88 |
अह्नोऽह्न एतेभ्यः |
|
5.4.89 |
न संख्याऽऽदेः समाहारे |
|
5.4.90 |
उत्तमैकाभ्यां च |
|
5.4.91 |
राजाऽहस्सखिभ्यष्टच् |
|
5.4.92 |
गोरतद्धितलुकि |
|
5.4.93 |
अग्राख्यायामुरसः |
|
5.4.94 |
अनोऽश्मायस्सरसाम् जातिसंज्ञयोः |
|
5.4.95 |
ग्रामकौटाभ्यां च तक्ष्णः |
|
5.4.96 |
अतेः शुनः |
|
5.4.97 |
उपमानादप्राणिषु |
|
5.4.98 |
उत्तरमृगपूर्वाच्च सक्थ्नः |
|
5.4.99 |
नावो द्विगोः |
|
5.4.100 |
अर्धाच्च |
|
5.4.101 |
खार्याः प्राचाम् |
|
5.4.102 |
द्वित्रिभ्यामञ्जलेः |
|
5.4.103 |
अनसन्तान्नपुंसकाच्छन्दसि |
|
5.4.104 |
ब्रह्मणो जानपदाख्यायाम् |
|
5.4.105 |
कुमहद्भ्यामन्यतरस्याम् |
|
5.4.106 |
द्वंद्वाच्चुदषहान्तात् समाहारे |
|
5.4.107 |
अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः |
|
5.4.108 |
अनश्च |
|
5.4.109 |
नपुंसकादन्यतर्अस्याम् |
|
5.4.110 |
नदीपौर्णमास्याग्रहायणीभ्यः |
|
5.4.111 |
झयः |
|
5.4.112 |
गिरेश्च सेनकस्य |
|
5.4.113 |
बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् षच् |
|
5.4.114 |
अङ्गुलेर्दारुणि |
|
5.4.115 |
द्वित्रिभ्यां ष मूर्ध्नः |
|
5.4.116 |
अप् पूरणीप्रमाण्योः |
|
5.4.117 |
अन्तर्बहिर्भ्यां च लोम्नः |
|
5.4.118 |
अञ्नासिकायाः संज्ञायां नसं चास्थूलात् |
|
5.4.119 |
उपसर्गाच्च |
|
5.4.120 |
सुप्रातसुश्वसुदिवशारिकुक्षचतुरश्रैणीपदाजपदप्रोष्ठपदाः |
|
5.4.121 |
नञ्दुःसुभ्यो हलिसक्थ्योरन्यतरस्याम् |
|
5.4.122 |
नित्यमसिच् प्रजामेधयोः |
|
5.4.123 |
बहुप्रजाश्छन्दसि |
|
5.4.124 |
धर्मादनिच् केवलात् |
|
5.4.125 |
जम्भा सुहरिततृणसोमेभ्यः |
|
5.4.126 |
दक्षिणेर्मा लुब्धयोगे |
|
5.4.127 |
इच् कर्मव्यतिहारे |
|
5.4.128 |
द्विदण्ड्यादिभ्यश्च |
|
5.4.129 |
प्रसम्भ्यां जानुनोर्ज्ञुः |
|
5.4.130 |
ऊर्ध्वाद्विभाषा |
|
5.4.131 |
ऊधसोऽनङ् |
|
5.4.132 |
धनुषश्च |
|
5.4.133 |
वा संज्ञायाम् |
|
5.4.134 |
जायाया निङ् |
|
5.4.135 |
गन्धस्येदुत्पूतिसुसुरभिभ्यः |
|
5.4.136 |
अल्पाख्यायाम् |
|
5.4.137 |
उपमानाच्च |
|
5.4.138 |
पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः |
|
5.4.139 |
कुम्भपदीषु च |
|
5.4.140 |
संख्यासुपूर्वस्य |
|
5.4.141 |
वयसि दन्तस्य दतृ |
|
5.4.142 |
छन्दसि च |
|
5.4.143 |
स्त्रियां संज्ञायाम् |
|
5.4.144 |
विभाषा श्यावारोकाभ्याम् |
|
5.4.145 |
अग्रान्तशुद्धशुभ्रवृषवराहेभ्यश्च |
|
5.4.146 |
ककुदस्यावस्थायां लोपः |
|
5.4.147 |
त्रिककुत् पर्वते |
|
5.4.148 |
उद्विभ्यां काकुदस्य |
|
5.4.149 |
पूर्णाद्विभाषा |
|
5.4.150 |
सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः |
|
5.4.151 |
उरःप्रभृतिभ्यः कप् |
|
5.4.152 |
इनः स्त्रियाम् |
|
5.4.153 |
नद्यृतश्च |
|
5.4.154 |
शेषाद्विभाषा |
|
5.4.155 |
न संज्ञायाम् |
|
5.4.156 |
ईयसश्च |
|
5.4.157 |
वन्दिते भ्रातुः |
|
5.4.158 |
ऋतश्छन्दसि |
|
5.4.159 |
नाडीतन्त्र्योः स्वाङ्गे |
|
5.4.160 |
निष्प्रवाणिश्च |
|
6.1.1 |
एकाचो द्वे प्रथमस्य |
|
6.1.2 |
अजादेर्द्वितीयस्य |
|
6.1.3 |
न न्द्राः संयोगादयः |
|
6.1.4 |
पूर्वोऽभ्यासः |
|
6.1.5 |
उभे अभ्यस्तम् |
|
6.1.6 |
जक्षित्यादयः षट् |
|
6.1.7 |
तुजादीनां दीर्घोऽभ्यासस्य |
|
6.1.8 |
लिटि धातोरनभ्यासस्य |
|
6.1.9 |
सन्यङोः |
|
6.1.10 |
श्लौ |
|
6.1.11 |
चङि |
|
6.1.12 |
दाश्वान् साह्वान् मीढ्वांश्च |
|
6.1.13 |
ष्यङः सम्प्रसारणं पुत्रपत्योस्तत्पुरुषे |
|
6.1.14 |
बन्धुनि बहुव्रीहौ |
|
6.1.15 |
वचिस्वपियजादीनां किति |
|
6.1.16 |
ग्रहिज्यावयिव्यधिवष्टिविचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां ङिति च |
|
6.1.17 |
लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् |
|
6.1.18 |
स्वापेश्चङि |
|
6.1.19 |
स्वपिस्यमिव्येञां यङि |
|
6.1.20 |
न वशः |
|
6.1.21 |
चायः की |
|
6.1.22 |
स्फायः स्फी निष्ठायाम् |
|
6.1.23 |
स्त्यः प्रपूर्वस्य |
|
6.1.24 |
द्रवमूर्तिस्पर्शयोः श्यः |
|
6.1.25 |
प्रतेश्च |
|
6.1.26 |
विभाषाऽभ्यवपूर्वस्य |
|
6.1.27 |
शृतं पाके |
|
6.1.28 |
प्यायः पी |
|
6.1.29 |
लिड्यङोश्च |
|
6.1.30 |
विभाषा श्वेः |
|
6.1.31 |
णौ च संश्चङोः |
|
6.1.32 |
ह्वः सम्प्रसारणम् |
|
6.1.33 |
अभ्यस्तस्य च |
|
6.1.34 |
बहुलं छन्दसि |
|
6.1.35 |
चायः की |
|
6.1.36 |
अपस्पृधेथामानृचुरानृहुश्चिच्युषेतित्याजश्राताःश्रितमाशीराशीर्त्तः |
|
6.1.37 |
न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् |
|
6.1.38 |
लिटि वयो यः |
|
6.1.39 |
वश्चास्यान्यतरस्याम् किति |
|
6.1.40 |
वेञः |
|
6.1.41 |
ल्यपि च |
|
6.1.42 |
ज्यश्च |
|
6.1.43 |
व्यश्च |
|
6.1.44 |
विभाषा परेः |
|
6.1.45 |
आदेच उपदेशेऽशिति |
|
6.1.46 |
न व्यो लिटि |
|
6.1.47 |
स्फुरतिस्फुलत्योर्घञि |
|
6.1.48 |
क्रीङ्जीनां णौ |
|
6.1.49 |
सिध्यतेरपारलौकिके |
|
6.1.50 |
मीनातिमिनोतिदीङां ल्यपि च |
|
6.1.51 |
विभाषा लीयतेः |
|
6.1.52 |
खिदेश्छन्दसि |
|
6.1.53 |
अपगुरो णमुँल्ि |
|
6.1.54 |
चिस्फुरोर्णौ |
|
6.1.55 |
प्रजने वीयतेः |
|
6.1.56 |
बिभेतेर्हेतुभये |
|
6.1.57 |
नित्यं स्मयतेः |
|
6.1.58 |
सृजिदृशोर्झल्यमकिति |
|
6.1.59 |
अनुदात्तस्य चर्दुपधस्यान्यतरस्याम् |
|
6.1.60 |
शीर्षंश्छन्दसि |
|
6.1.61 |
ये च तद्धिते |
|
6.1.62 |
अचि शीर्षः |
|
6.1.63 |
पद्दन्नोमास्हृन्निशसन्यूषन्दोषन्यकञ्छकन्नुदन्नासञ्छस्प्रभृतिषु |
|
6.1.64 |
धात्वादेः षः सः |
|
6.1.65 |
णो नः |
|
6.1.66 |
लोपो व्योर्वलि |
|
6.1.67 |
वेरपृक्तस्य |
|
6.1.68 |
हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात् सुतिस्यपृक्तं हल् |
|
6.1.69 |
एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः |
|
6.1.70 |
शेश्छन्दसि बहुलम् |
|
6.1.71 |
ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् |
|
6.1.72 |
संहितायाम् |
|
6.1.73 |
छे च |
|
6.1.74 |
आङ्माङोश्च |
|
6.1.75 |
दीर्घात् |
|
6.1.76 |
पदान्ताद्वा |
|
6.1.77 |
इको यणचि |
|
6.1.78 |
एचोऽयवायावः |
|
6.1.79 |
वान्तो यि प्रत्यये |
|
6.1.80 |
धातोस्तन्निमित्तस्यैव |
|
6.1.81 |
क्षय्यजय्यौ शक्यार्थे |
|
6.1.82 |
क्रय्यस्तदर्थे |
|
6.1.83 |
भय्यप्रवय्ये च च्छन्दसि |
|
6.1.84 |
एकः पूर्वपरयोः |
|
6.1.85 |
अन्तादिवच्च |
|
6.1.86 |
षत्वतुकोरसिद्धः |
|
6.1.87 |
आद्गुणः |
|
6.1.88 |
वृद्धिरेचि |
|
6.1.89 |
एत्येधत्यूठ्सु |
|
6.1.90 |
आटश्च |
|
6.1.91 |
उपसर्गादृति धातौ |
|
6.1.92 |
वा सुप्यापिशलेः |
|
6.1.93 |
औतोऽम्शसोः |
|
6.1.94 |
एङि पररूपम् |
|
6.1.95 |
ओमाङोश्च |
|
6.1.96 |
उस्यपदान्तात् |
|
6.1.97 |
अतो गुणे |
|
6.1.98 |
अव्यक्तानुकरणस्यात इतौ |
|
6.1.99 |
नाम्रेडितस्यान्त्यस्य तु वा |
|
6.1.100 |
नित्यमाम्रेडिते डाचि |
|
6.1.101 |
अकः सवर्णे दीर्घः |
|
6.1.102 |
प्रथमयोः पूर्वसवर्णः |
|
6.1.103 |
तस्माच्छसो नः पुंसि |
|
6.1.104 |
नादिचि |
|
6.1.105 |
दीर्घाज्जसि च |
|
6.1.106 |
वा छन्दसि |
|
6.1.107 |
अमि पूर्वः |
|
6.1.108 |
सम्प्रसारणाच्च |
|
6.1.109 |
एङः पदान्तादति |
|
6.1.110 |
ङसिङसोश्च |
|
6.1.111 |
ऋत उत् |
|
6.1.112 |
ख्यत्यात् परस्य |
|
6.1.113 |
अतो रोरप्लुतादप्लुते |
|
6.1.114 |
हशि च |
|
6.1.115 |
प्रकृत्याऽन्तःपादमव्यपरे |
|
6.1.116 |
अव्यादवद्यादवक्रमुरव्रतायमवन्त्ववस्युषु च |
|
6.1.117 |
यजुष्युरः |
|
6.1.118 |
आपोजुषाणोवृष्णोवर्षिष्ठेऽम्बेऽम्बालेऽम्बिकेपूर्वे |
|
6.1.119 |
अङ्ग इत्यादौ च |
|
6.1.120 |
अनुदात्ते च कुधपरे |
|
6.1.121 |
अवपथासि च |
|
6.1.122 |
सर्वत्र विभाषा गोः |
|
6.1.123 |
अवङ् स्फोटायनस्य |
|
6.1.124 |
इन्द्रे च (नित्यम्) |
|
6.1.125 |
प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् |
|
6.1.126 |
आङोऽनुनासिकश्छन्दसि |
|
6.1.127 |
इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च |
|
6.1.128 |
ऋत्यकः |
|
6.1.129 |
अप्लुतवदुपस्थिते |
|
6.1.130 |
ई३ चाक्रवर्मणस्य |
|
6.1.131 |
दिव उत् |
|
6.1.132 |
एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि |
|
6.1.133 |
स्यश्छन्दसि बहुलम् |
|
6.1.134 |
सोऽचि लोपे चेत् पादपूरणम् |
|
6.1.135 |
सुट् कात् पूर्वः |
|
6.1.136 |
अडभ्यासव्यवायेऽपि |
|
6.1.137 |
सम्पर्युपेभ्यः करोतौ भूषणे |
|
6.1.138 |
समवाये च |
|
6.1.139 |
उपात् प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु |
|
6.1.140 |
किरतौ लवने |
|
6.1.141 |
हिंसायां प्रतेश्च |
|
6.1.142 |
अपाच्चतुष्पाच्छकुनिष्वालेखने |
|
6.1.143 |
कुस्तुम्बुरूणि जातिः |
|
6.1.144 |
अपरस्पराः क्रियासातत्ये |
|
6.1.145 |
गोष्पदं सेवितासेवितप्रमाणेषु |
|
6.1.146 |
आस्पदं प्रतिष्ठायाम् |
|
6.1.147 |
आश्चर्यमनित्ये |
|
6.1.148 |
वर्चस्केऽवस्करः |
|
6.1.149 |
अपस्करो रथाङ्गम् |
|
6.1.150 |
विष्किरः शकुनिर्विकरो वा |
|
6.1.151 |
ह्रस्वाच्चन्द्रोत्तरपदे मन्त्रे |
|
6.1.152 |
प्रतिष्कशश्च कशेः |
|
6.1.153 |
प्रस्कण्वहरिश्चन्द्रावृषी |
|
6.1.154 |
मस्करमस्करिणौ वेणुपरिव्राजकयोः |
|
6.1.155 |
कास्तीराजस्तुन्दे नगरे |
|
6.1.156 |
कारस्करो वृक्षः |
|
6.1.157 |
पारस्करप्रभृतीनि च संज्ञायाम् |
|
6.1.158 |
अनुदात्तं पदमेकवर्जम् |
|
6.1.159 |
कर्षात्वतो घञोऽन्त उदात्तः |
|
6.1.160 |
उञ्छादीनां च |
|
6.1.161 |
अनुदात्तस्य च यत्रोदात्तलोपः |
|
6.1.162 |
धातोः |
|
6.1.163 |
चितः |
|
6.1.164 |
तद्धितस्य |
|
6.1.165 |
कितः |
|
6.1.166 |
तिसृभ्यो जसः |
|
6.1.167 |
चतुरः शसि |
|
6.1.168 |
सावेकाचस्तृतीयाऽऽदिर्विभक्तिः |
|
6.1.169 |
अन्तोदात्तादुत्तरपदादन्यतरस्यामनित्यसमासे |
|
6.1.170 |
अञ्चेश्छन्दस्यसर्वनामस्थानम् |
|
6.1.171 |
ऊडिदम्पदाद्यप्पुम्रैद्युभ्यः |
|
6.1.172 |
अष्टनो दीर्घात् |
|
6.1.173 |
शतुरनुमो नद्यजादी |
|
6.1.174 |
उदात्तयणो हल्पूर्वात् |
|
6.1.175 |
नोङ्धात्वोः |
|
6.1.176 |
ह्रस्वनुड्भ्यां मतुप् |
|
6.1.177 |
नामन्यतरस्याम् |
|
6.1.178 |
ङ्याश्छन्दसि बहुलम् |
|
6.1.179 |
षट्त्रिचतुर्भ्यो हलादिः |
|
6.1.180 |
झल्युपोत्तमम् |
|
6.1.181 |
विभाषा भाषायाम् |
|
6.1.182 |
न गोश्वन्त्साववर्णराडङ्क्रुङ्कृद्भ्यः |
|
6.1.183 |
दिवो झल् |
|
6.1.184 |
नृ चान्यतरस्याम् |
|
6.1.185 |
तित्स्वरितम् |
|
6.1.186 |
तास्यनुदात्तेन्ङिददुपदेशाल्लसार्वधातुकमनुदात्तमहन्विङोः |
|
6.1.187 |
आदिः सिचोऽन्यतरस्याम् |
|
6.1.188 |
स्वपादिर्हिंसामच्यनिटि |
|
6.1.189 |
अभ्यस्तानामादिः |
|
6.1.190 |
अनुदात्ते च |
|
6.1.191 |
सर्वस्य सुपि |
|
6.1.192 |
भीह्रीभृहुमदजनधनदरिद्राजागरां प्रत्ययात् पूर्वम् पिति |
|
6.1.193 |
लिति |
|
6.1.194 |
आदिर्णमुँल््यन्यतरस्याम् |
|
6.1.195 |
अचः कर्तृयकि |
|
6.1.196 |
थलि च सेटीडन्तो वा |
|
6.1.197 |
ञ्णित्यादिर्नित्यम् |
|
6.1.198 |
आमन्त्रितस्य च |
|
6.1.199 |
पथिमथोः सर्वनामस्थाने |
|
6.1.200 |
अन्तश्च तवै युगपत् |
|
6.1.201 |
क्षयो निवासे |
|
6.1.202 |
जयः करणम् |
|
6.1.203 |
वृषादीनां च |
|
6.1.204 |
संज्ञायामुपमानम् |
|
6.1.205 |
निष्ठा च द्व्यजनात् |
|
6.1.206 |
शुष्कधृष्टौ |
|
6.1.207 |
आशितः कर्ता |
|
6.1.208 |
रिक्ते विभाषा |
|
6.1.209 |
जुष्टार्पिते च छन्दसि |
|
6.1.210 |
नित्यं मन्त्रे |
|
6.1.211 |
युष्मदस्मदोर्ङसि |
|
6.1.212 |
ङयि च |
|
6.1.213 |
यतोऽनावः |
|
6.1.214 |
ईडवन्दवृशंसदुहां ण्यतः |
|
6.1.215 |
विभाषा वेण्विन्धानयोः |
|
6.1.216 |
त्यागरागहासकुहश्वठक्रथानाम् |
|
6.1.217 |
उपोत्तमं रिति |
|
6.1.218 |
चङ्यन्यतरस्याम् |
|
6.1.219 |
मतोः पूर्वमात् संज्ञायां स्त्रियाम् |
|
6.1.220 |
अन्तोऽवत्याः |
|
6.1.221 |
ईवत्याः |
|
6.1.222 |
चौ |
|
6.1.223 |
समासस्य |
|
6.2.1 |
बहुव्रीहौ प्रकृत्या पूर्वपदम् |
|
6.2.2 |
तत्पुरुषे तुल्यार्थतृतीयासप्तम्युपमानाव्ययद्वितीयाकृत्याः |
|
6.2.3 |
वर्णः वर्णेष्वनेते |
|
6.2.4 |
गाधलवणयोः प्रमाणे |
|
6.2.5 |
दायाद्यं दायादे |
|
6.2.6 |
प्रतिबन्धि चिरकृच्छ्रयोः |
|
6.2.7 |
पदेऽपदेशे |
|
6.2.8 |
निवाते वातत्राणे |
|
6.2.9 |
शारदेअनार्तवे |
|
6.2.10 |
अध्वर्युकषाययोर्जातौ |
|
6.2.11 |
सदृशप्रतिरूपयोः सादृश्ये |
|
6.2.12 |
द्विगौ प्रमाणे |
|
6.2.13 |
गन्तव्यपण्यं वाणिजे |
|
6.2.14 |
मात्रोपज्ञोपक्रमच्छाये नपुंसके |
|
6.2.15 |
सुखप्रिययोर्हिते |
|
6.2.16 |
प्रीतौ च |
|
6.2.17 |
स्वं स्वामिनि |
|
6.2.18 |
पत्यावैश्वर्ये |
|
6.2.19 |
न भूवाक्चिद्दिधिषु |
|
6.2.20 |
वा भुवनम् |
|
6.2.21 |
आशङ्काबाधनेदीयस्सु संभावने |
|
6.2.22 |
पूर्वे भूतपूर्वे |
|
6.2.23 |
सविधसनीडसमर्यादसवेशसदेशेषु सामीप्ये |
|
6.2.24 |
विस्पष्टादीनि गुणवचनेषु |
|
6.2.25 |
श्रज्याऽवमकन्पापवत्सु भावे कर्मधारये |
|
6.2.26 |
कुमारश्च |
|
6.2.27 |
आदिः प्रत्येनसि |
|
6.2.28 |
पूगेष्वन्यतरस्याम् |
|
6.2.29 |
इगन्तकालकपालभगालशरावेषु द्विगौ |
|
6.2.30 |
बह्वन्यतरस्याम् |
|
6.2.31 |
दिष्टिवितस्त्योश्च |
|
6.2.32 |
सप्तमी सिद्धशुष्कपक्वबन्धेष्वकालात् |
|
6.2.33 |
परिप्रत्युपापा वर्ज्यमानाहोरात्रावयवेषु |
|
6.2.34 |
राजन्यबहुवचनद्वंद्वेऽन्धकवृष्णिषु |
|
6.2.35 |
संख्या |
|
6.2.36 |
आचार्योपसर्जनश्चान्तेवासी |
|
6.2.37 |
कार्तकौजपादयश्च |
|
6.2.38 |
महान् व्रीह्यपराह्णगृष्टीष्वासजाबालभारभारतहैलिहिलरौरवप्रवृद्धेषु |
|
6.2.39 |
क्षुल्लकश्च वैश्वदेवे |
|
6.2.40 |
उष्ट्रः सादिवाम्योः |
|
6.2.41 |
गौः सादसादिसारथिषु |
|
6.2.42 |
कुरुगार्हपतरिक्तगुर्वसूतजरत्यश्लीलदृढरूपापारेवडवातैतिलकद्रूःपण्यकम्बलो दासीभाराणां च |
|
6.2.43 |
चतुर्थी तदर्थे |
|
6.2.44 |
अर्थे |
|
6.2.45 |
क्ते च |
|
6.2.46 |
कर्मधारयेऽनिष्ठा |
|
6.2.47 |
अहीने द्वितीया |
|
6.2.48 |
तृतीया कर्मणि |
|
6.2.49 |
गतिरनन्तरः |
|
6.2.50 |
तादौ च निति कृत्यतौ |
|
6.2.51 |
तवै चान्तश्च युगपत् |
|
6.2.52 |
अनिगन्तोऽञ्चतौ वप्रत्यये |
|
6.2.53 |
न्यधी च |
|
6.2.54 |
ईषदन्यतरस्याम् |
|
6.2.55 |
हिरण्यपरिमाणं धने |
|
6.2.56 |
प्रथमोऽचिरोपसम्पत्तौ |
|
6.2.57 |
कतरकतमौ कर्मधारये |
|
6.2.58 |
आर्यो ब्राह्मणकुमारयोः |
|
6.2.59 |
राजा च |
|
6.2.60 |
षष्ठी प्रत्येनसि |
|
6.2.61 |
क्ते नित्यार्थे |
|
6.2.62 |
ग्रामः शिल्पिनि |
|
6.2.63 |
राजा च प्रशंसायाम् |
|
6.2.64 |
आदिरुदात्तः |
|
6.2.65 |
सप्तमीहारिणौ धर्म्येऽहरणे |
|
6.2.66 |
युक्ते च |
|
6.2.67 |
विभाषाऽध्यक्षे |
|
6.2.68 |
पापं च शिल्पिनि |
|
6.2.69 |
गोत्रान्तेवासिमाणवब्राह्मणेषु क्षेपे |
|
6.2.70 |
अङ्गानि मैरेये |
|
6.2.71 |
भक्ताख्यास्तदर्थेषु |
|
6.2.72 |
गोबिडालसिंहसैन्धवेषूपमाने |
|
6.2.73 |
अके जीविकाऽर्थे |
|
6.2.74 |
प्राचां क्रीडायाम् |
|
6.2.75 |
अणि नियुक्ते |
|
6.2.76 |
शिल्पिनि चाकृञः |
|
6.2.77 |
संज्ञायां च |
|
6.2.78 |
गोतन्तियवं पाले |
|
6.2.79 |
णिनि |
|
6.2.80 |
उपमानं शब्दार्थप्रकृतावेव |
|
6.2.81 |
युक्तारोह्यादयश्च |
|
6.2.82 |
दीर्घकाशतुषभ्राष्ट्रवटं जे |
|
6.2.83 |
अन्त्यात् पूर्वं बह्वचः |
|
6.2.84 |
ग्रामेऽनिवसन्तः |
|
6.2.85 |
घोषादिषु |
|
6.2.86 |
छात्र्यादयः शालायाम् |
|
6.2.87 |
प्रस्थेऽवृद्धमकर्क्यादीनाम् |
|
6.2.88 |
मालाऽऽदीनां च |
|
6.2.89 |
अमहन्नवं नगरेऽनुदीचाम् |
|
6.2.90 |
अर्मे चावर्णं द्व्यच्त्र्यच् |
|
6.2.91 |
न भूताधिकसंजीवमद्राश्मकज्जलम् |
|
6.2.92 |
अन्तः |
|
6.2.93 |
सर्वं गुणकार्त्स्न्ये |
|
6.2.94 |
संज्ञायां गिरिनिकाययोः |
|
6.2.95 |
कुमार्यां वयसि |
|
6.2.96 |
उदकेऽकेवले |
|
6.2.97 |
द्विगौ क्रतौ |
|
6.2.98 |
सभायां नपुंसके |
|
6.2.99 |
पुरे प्राचाम् |
|
6.2.100 |
अरिष्टगौडपूर्वे च |
|
6.2.101 |
न हास्तिनफलकमार्देयाः |
|
6.2.102 |
कुसूलकूपकुम्भशालं बिले |
|
6.2.103 |
दिक्शब्दा ग्रामजनपदाख्यानचानराटेषु |
|
6.2.104 |
आचार्योपसर्जनश्चान्तेवासिनि |
|
6.2.105 |
उत्तरपदवृद्धौ सर्वं च |
|
6.2.106 |
बहुव्रीहौ विश्वं संज्ञायाम् |
|
6.2.107 |
उदराश्वेषुषु |
|
6.2.108 |
क्षेपे |
|
6.2.109 |
नदी बन्धुनि |
|
6.2.110 |
निष्ठोपसर्गपूर्वमन्यतरस्याम् |
|
6.2.111 |
उत्तरपदादिः |
|
6.2.112 |
कर्णो वर्णलक्षणात् |
|
6.2.113 |
संज्ञौपम्ययोश्च |
|
6.2.114 |
कण्ठपृष्ठग्रीवाजंघं च |
|
6.2.115 |
शृङ्गमवस्थायां च |
|
6.2.116 |
नञो जरमरमित्रमृताः |
|
6.2.117 |
सोर्मनसी अलोमोषसी |
|
6.2.118 |
क्रत्वादयश्च |
|
6.2.119 |
आद्युदात्तं द्व्यच् छन्दसि |
|
6.2.120 |
वीरवीर्यौ च |
|
6.2.121 |
कूलतीरतूलमूलशालाऽक्षसममव्ययीभावे |
|
6.2.122 |
कंसमन्थशूर्पपाय्यकाण्डं द्विगौ |
|
6.2.123 |
तत्पुरुषे शालायां नपुंसके |
|
6.2.124 |
कन्था च |
|
6.2.125 |
आदिश्चिहणादीनाम् |
|
6.2.126 |
चेलखेटकटुककाण्डं गर्हायाम् |
|
6.2.127 |
चीरमुपमानम् |
|
6.2.128 |
पललसूपशाकं मिश्रे |
|
6.2.129 |
कूलसूदस्थलकर्षाः संज्ञायाम् |
|
6.2.130 |
अकर्मधारये राज्यम् |
|
6.2.131 |
वर्ग्यादयश्च |
|
6.2.132 |
पुत्रः पुंभ्यः |
|
6.2.133 |
नाचार्यराजर्त्विक्संयुक्तज्ञात्याख्येभ्यः |
|
6.2.134 |
चूर्णादीन्यप्राणिषष्ठ्याः |
|
6.2.135 |
षट् च काण्डादीनि |
|
6.2.136 |
कुण्डं वनम् |
|
6.2.137 |
प्रकृत्या भगालम् |
|
6.2.138 |
शितेर्नित्याबह्वज्बहुव्रीहावभसत् |
|
6.2.139 |
गतिकारकोपपदात् कृत् |
|
6.2.140 |
उभे वनस्पत्यादिषु युगपत् |
|
6.2.141 |
देवताद्वंद्वे च |
|
6.2.142 |
नोत्तरपदेऽनुदात्तादावपृथिवीरुद्रपूषमन्थिषु |
|
6.2.143 |
अन्तः |
|
6.2.144 |
थाथघञ्क्ताजबित्रकाणाम् |
|
6.2.145 |
सूपमानात् क्तः |
|
6.2.146 |
संज्ञायामनाचितादीनाम् |
|
6.2.147 |
प्रवृद्धादीनां च |
|
6.2.148 |
कारकाद्दत्तश्रुतयोरेवाशिषि |
|
6.2.149 |
इत्थम्भूतेन कृतमिति च |
|
6.2.150 |
अनो भावकर्मवचनः |
|
6.2.151 |
मन्क्तिन्व्याख्यानशयनासनस्थानयाजकादिक्रीताः |
|
6.2.152 |
सप्तम्याः पुण्यम् |
|
6.2.153 |
ऊनार्थकलहं तृतीयायाः |
|
6.2.154 |
मिश्रं चानुपसर्गमसंधौ |
|
6.2.155 |
नञो गुणप्रतिषेधे सम्पाद्यर्हहितालमर्थास्तद्धिताः |
|
6.2.156 |
ययतोश्चातदर्थे |
|
6.2.157 |
अच्कावशक्तौ |
|
6.2.158 |
आक्रोशे च |
|
6.2.159 |
संज्ञायाम् |
|
6.2.160 |
कृत्योकेष्णुच्चार्वादयश्च |
|
6.2.161 |
विभाषा तृन्नन्नतीक्ष्णशुचिषु |
|
6.2.162 |
बहुव्रीहाविदमेतत्तद्भ्यः प्रथमपूरणयोः क्रियागणने |
|
6.2.163 |
संख्यायाः स्तनः |
|
6.2.164 |
विभाषा छन्दसि |
|
6.2.165 |
संज्ञायां मित्राजिनयोः |
|
6.2.166 |
व्यवायिनोऽन्तरम् |
|
6.2.167 |
मुखं स्वाङ्गम् |
|
6.2.168 |
नाव्ययदिक्शब्दगोमहत्स्थूलमुष्टिपृथुवत्सेभ्यः |
|
6.2.169 |
निष्ठोपमानादन्यतरस्याम् |
|
6.2.170 |
जातिकालसुखादिभ्योऽनाच्छादनात् क्तोऽकृतमितप्रतिपन्नाः |
|
6.2.171 |
वा जाते |
|
6.2.172 |
नञ्सुभ्याम् |
|
6.2.173 |
कपि पूर्वम् |
|
6.2.174 |
ह्रस्वान्तेऽन्त्यात् पूर्वम् |
|
6.2.175 |
बहोर्नञ्वदुत्तरपदभूम्नि |
|
6.2.176 |
न गुणादयोऽवयवाः |
|
6.2.177 |
उपसर्गात् स्वाङ्गं ध्रुवमपर्शु |
|
6.2.178 |
वनं समासे |
|
6.2.179 |
अन्तः |
|
6.2.180 |
अन्तश्च |
|
6.2.181 |
न निविभ्याम् |
|
6.2.182 |
परेरभितोभाविमण्डलम् |
|
6.2.183 |
प्रादस्वाङ्गं संज्ञायाम् |
|
6.2.184 |
निरुदकादीनि च |
|
6.2.185 |
अभेर्मुखम् |
|
6.2.186 |
अपाच्च |
|
6.2.187 |
स्फिगपूतवीणाऽञ्जोऽध्वकुक्षिसीरनामनाम च |
|
6.2.188 |
अधेरुपरिस्थम् |
|
6.2.189 |
अनोरप्रधानकनीयसी |
|
6.2.190 |
पुरुषश्चान्वादिष्टः |
|
6.2.191 |
अतेरकृत्पदे |
|
6.2.192 |
नेरनिधाने |
|
6.2.193 |
प्रतेरंश्वादयस्तत्पुरुषे |
|
6.2.194 |
उपाद् द्व्यजजिनमगौरादयः |
|
6.2.195 |
सोरवक्षेपणे |
|
6.2.196 |
विभाषोत्पुच्छे |
|
6.2.197 |
द्वित्रिभ्यां पाद्दन्मूर्धसु बहुव्रीहौ |
|
6.2.198 |
सक्थं चाक्रान्तात् |
|
6.2.199 |
परादिश्छन्दसि बहुलम् |
|
6.3.1 |
अलुगुत्तरपदे |
|
6.3.2 |
पञ्चम्याः स्तोकादिभ्यः |
|
6.3.3 |
ओजःसहोऽम्भस्तमसः तृतीयायाः |
|
6.3.4 |
मनसः संज्ञायाम् |
|
6.3.5 |
आज्ञायिनि च |
|
6.3.6 |
आत्मनश्च पूरणे |
|
6.3.7 |
वैयाकरणाख्यायां चतुर्थ्याः |
|
6.3.8 |
परस्य च |
|
6.3.9 |
हलदन्तात् सप्तम्याः संज्ञायाम् |
|
6.3.10 |
कारनाम्नि च प्राचां हलादौ |
|
6.3.11 |
मध्याद्गुरौ |
|
6.3.12 |
अमूर्धमस्तकात् स्वाङ्गादकामे |
|
6.3.13 |
बन्धे च विभाषा |
|
6.3.14 |
तत्पुरुषे कृति बहुलम् |
|
6.3.15 |
प्रावृट्शरत्कालदिवां जे |
|
6.3.16 |
विभाषा वर्षक्षरशरवरात् |
|
6.3.17 |
घकालतनेषु कालनाम्नः |
|
6.3.18 |
शयवासवासिषु अकालात् |
|
6.3.19 |
नेन्सिद्धबध्नातिषु |
|
6.3.20 |
स्थे च भाषायाम् |
|
6.3.21 |
षष्ठ्या आक्रोशे |
|
6.3.22 |
पुत्रेऽन्यतरस्याम् |
|
6.3.23 |
ऋतो विद्यायोनिसम्बन्धेभ्यः |
|
6.3.24 |
विभाषा स्वसृपत्योः |
|
6.3.25 |
आनङ् ऋतो द्वंद्वे |
|
6.3.26 |
देवताद्वंद्वे च |
|
6.3.27 |
ईदग्नेः सोमवरुणयोः |
|
6.3.28 |
इद्वृद्धौ |
|
6.3.29 |
दिवो द्यावा |
|
6.3.30 |
दिवसश्च पृथिव्याम् |
|
6.3.31 |
उषासोषसः |
|
6.3.32 |
मातरपितरावुदीचाम् |
|
6.3.33 |
पितरामातरा च च्छन्दसि |
|
6.3.34 |
स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियाऽऽदिषु |
|
6.3.35 |
तसिलादिषु आकृत्वसुचः |
|
6.3.36 |
क्यङ्मानिनोश्च |
|
6.3.37 |
न कोपधायाः |
|
6.3.38 |
संज्ञापूरण्योश्च |
|
6.3.39 |
वृद्धिनिमित्तस्य च तद्धितस्यारक्तविकारे |
|
6.3.40 |
स्वाङ्गाच्चेतोऽमानिनि |
|
6.3.41 |
जातेश्च |
|
6.3.42 |
पुंवत् कर्मधारयजातीयदेशीयेषु |
|
6.3.43 |
घरूपकल्पचेलड्ब्रुवगोत्रमतहतेषु ङ्योऽनेकाचो ह्रस्वः |
|
6.3.44 |
नद्याः शेषस्यान्यतरस्याम् |
|
6.3.45 |
उगितश्च |
|
6.3.46 |
आन्महतः समानाधिकरणजातीययोः |
|
6.3.47 |
द्व्यष्टनः संख्यायामबहुव्रीह्यशीत्योः |
|
6.3.48 |
त्रेस्त्रयः |
|
6.3.49 |
विभाषा चत्वारिंशत्प्रभृतौ सर्वेषाम् |
|
6.3.50 |
हृदयस्य हृल्लेखयदण्लासेषु |
|
6.3.51 |
वा शोकष्यञ्रोगेषु |
|
6.3.52 |
पादस्य पदाज्यातिगोपहतेषु |
|
6.3.53 |
पद् यत्यतदर्थे |
|
6.3.54 |
हिमकाषिहतिषु च |
|
6.3.55 |
ऋचः शे |
|
6.3.56 |
वा घोषमिश्रशब्देषु |
|
6.3.57 |
उदकस्योदः संज्ञायाम् |
|
6.3.58 |
पेषंवासवाहनधिषु च |
|
6.3.59 |
एकहलादौ पूरयितव्येऽन्यतरस्याम् |
|
6.3.60 |
मन्थौदनसक्तुबिन्दुवज्रभारहारवीवधगाहेषु च |
|
6.3.61 |
इको ह्रस्वोऽङ्यो गालवस्य |
|
6.3.62 |
एक तद्धिते च |
|
6.3.63 |
ङ्यापोः संज्ञाछन्दसोर्बहुलम् |
|
6.3.64 |
त्वे च |
|
6.3.65 |
इष्टकेषीकामालानां चिततूलभारिषु |
|
6.3.66 |
खित्यनव्ययस्य |
|
6.3.67 |
अरुर्द्विषदजन्तस्य मुम् |
|
6.3.68 |
इच एकाचोऽम्प्रत्ययवच्च |
|
6.3.69 |
वाचंयमपुरंदरौ च |
|
6.3.70 |
कारे सत्यागदस्य |
|
6.3.71 |
श्येनतिलस्य पाते ञे |
|
6.3.72 |
रात्रेः कृति विभाषा |
|
6.3.73 |
नलोपो नञः |
|
6.3.74 |
तस्मान्नुडचि |
|
6.3.75 |
नभ्राण्नपान्नवेदानासत्यानमुचिनकुलनखनपुंसकनक्षत्रनक्रनाकेषु प्रकृत्या |
|
6.3.76 |
एकादिश्चैकस्य चादुक् |
|
6.3.77 |
नगोऽप्राणिष्वन्यतरस्याम् |
|
6.3.78 |
सहस्य सः संज्ञायाम् |
|
6.3.79 |
ग्रन्थान्ताधिके च |
|
6.3.80 |
द्वितीये चानुपाख्ये |
|
6.3.81 |
अव्ययीभावे चाकाले |
|
6.3.82 |
वोपसर्जनस्य |
|
6.3.83 |
प्रकृत्याऽऽशिष्यगोवत्सहलेषु |
|
6.3.84 |
समानस्य छन्दस्यमूर्धप्रभृत्युदर्केषु |
|
6.3.85 |
ज्योतिर्जनपदरात्रिनाभिनामगोत्ररूपस्थानवर्णवयोवचनबन्धुषु |
|
6.3.86 |
चरणे ब्रह्मचारिणि |
|
6.3.87 |
तीर्थे ये |
|
6.3.88 |
विभाषोदरे |
|
6.3.89 |
दृग्दृशवतुषु |
|
6.3.90 |
इदङ्किमोरीश्की |
|
6.3.91 |
आ सर्वनाम्नः |
|
6.3.92 |
विष्वग्देवयोश्च टेरद्र्यञ्चतौ वप्रत्यये |
|
6.3.93 |
समः समि |
|
6.3.94 |
तिरसस्तिर्यलोपे |
|
6.3.95 |
सहस्य सध्रिः |
|
6.3.96 |
सध मादस्थयोश्छन्दसि |
|
6.3.97 |
द्व्यन्तरुपसर्गेभ्योऽप ईत् |
|
6.3.98 |
ऊदनोर्देशे |
|
6.3.99 |
अषष्ठ्यतृतीयास्थस्यान्यस्य दुगाशिराशाऽऽस्थाऽऽस्थितोत्सुकोतिकारकरागच्छेषु |
|
6.3.100 |
अर्थे विभाषा |
|
6.3.101 |
कोः कत् तत्पुरुषेऽचि |
|
6.3.102 |
रथवदयोश्च |
|
6.3.103 |
तृणे च जातौ |
|
6.3.104 |
का पथ्यक्षयोः |
|
6.3.105 |
ईषदर्थे |
|
6.3.106 |
विभाषा पुरुषे |
|
6.3.107 |
कवं चोष्णे |
|
6.3.108 |
पथि च च्छन्दसि |
|
6.3.109 |
पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम् |
|
6.3.110 |
संख्याविसायपूर्वस्याह्नस्याहन्नन्यतरस्यां ङौ |
|
6.3.111 |
ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः |
|
6.3.112 |
सहिवहोरोदवर्णस्य |
|
6.3.113 |
साढ्यै साढ्वा साढेति निगमे |
|
6.3.114 |
संहितायाम् |
|
6.3.115 |
कर्णे लक्षणस्याविष्टाष्टपञ्चमणिभिन्नछिन्नछिद्रस्रुवस्वस्तिकस्य |
|
6.3.116 |
नहिवृतिवृषिव्यधिरुचिसहितनिषु क्वौ |
|
6.3.117 |
वनगिर्योः संज्ञायां कोटरकिंशुलकादीनाम् |
|
6.3.118 |
वले |
|
6.3.119 |
मतौ बह्वचोऽनजिरादीनाम् |
|
6.3.120 |
शरादीनां च |
|
6.3.121 |
इकः वहे अपीलोः |
|
6.3.122 |
उपसर्गस्य घञ्यमनुष्ये बहुलम् |
|
6.3.123 |
इकः काशे |
|
6.3.124 |
दस्ति |
|
6.3.125 |
अष्टनः संज्ञायाम् |
|
6.3.126 |
छन्दसि च |
|
6.3.127 |
चितेः कपि |
|
6.3.128 |
विश्वस्य वसुराटोः |
|
6.3.129 |
नरे संज्ञायाम् |
|
6.3.130 |
मित्रे चर्षौ |
|
6.3.131 |
मन्त्रे सोमाश्वेन्द्रियविश्वदेव्यस्य मतौ |
|
6.3.132 |
ओषधेश्च विभक्तावप्रथमायाम् |
|
6.3.133 |
ऋचि तुनुघमक्षुतङ्कुत्रोरुष्याणाम् |
|
6.3.134 |
इकः सुञि |
|
6.3.135 |
द्व्यचोऽतस्तिङः |
|
6.3.136 |
निपातस्य च |
|
6.3.137 |
अन्येषामपि दृश्यते |
|
6.3.138 |
चौ |
|
6.3.139 |
सम्प्रसारणस्य |
|
6.4.1 |
अङ्गस्य |
|
6.4.2 |
हलः |
|
6.4.3 |
नामि |
|
6.4.4 |
न तिसृचतसृ |
|
6.4.5 |
छन्दस्युभयथा |
|
6.4.6 |
नृ च |
|
6.4.7 |
नोपधायाः |
|
6.4.8 |
सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ |
|
6.4.9 |
वा षपूर्वस्य निगमे |
|
6.4.10 |
सान्तमहतः संयोगस्य |
|
6.4.11 |
अप्तृन्तृच्स्वसृनप्तृनेष्टृत्वष्टृक्षत्तृहोतृपोतृप्रशास्तॄणाम् |
|
6.4.12 |
इन्हन्पूषार्यम्णां शौ |
|
6.4.13 |
सौ च |
|
6.4.14 |
अत्वसन्तस्य चाधातोः |
|
6.4.15 |
अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति |
|
6.4.16 |
अज्झनगमां सनि |
|
6.4.17 |
तनोतेर्विभाषा |
|
6.4.18 |
क्रमश्च क्त्वि |
|
6.4.19 |
च्छ्वोः शूडनुनासिके च |
|
6.4.20 |
ज्वरत्वरश्रिव्यविमवामुपधायाश्च |
|
6.4.21 |
राल्लोपः |
|
6.4.22 |
असिद्धवदत्राभात् |
|
6.4.23 |
श्नान्नलोपः |
|
6.4.24 |
अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति |
|
6.4.25 |
दंशसञ्जस्वञ्जां शपि |
|
6.4.26 |
रञ्जेश्च |
|
6.4.27 |
घञि च भावकरणयोः |
|
6.4.28 |
स्यदो जवे |
|
6.4.29 |
अवोदैधौद्मप्रश्रथहिमश्रथाः |
|
6.4.30 |
नाञ्चेः पूजायाम् |
|
6.4.31 |
क्त्वि स्कन्दिस्यन्दोः |
|
6.4.32 |
जान्तनशां विभाषा |
|
6.4.33 |
भञ्जेश्च चिणि |
|
6.4.34 |
शास इदङ्हलोः |
|
6.4.35 |
शा हौ |
|
6.4.36 |
हन्तेर्जः |
|
6.4.37 |
अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलि क्ङिति |
|
6.4.38 |
वा ल्यपि |
|
6.4.39 |
न क्तिचि दीर्घश्च |
|
6.4.40 |
गमः क्वौ |
|
6.4.41 |
विड्वनोरनुनासिकस्यात् |
|
6.4.42 |
जनसनखनां सञ्झलोः |
|
6.4.43 |
ये विभाषा |
|
6.4.44 |
तनोतेर्यकि |
|
6.4.45 |
सनः क्तिचि लोपश्चास्यान्यतरस्याम् |
|
6.4.46 |
आर्धधातुके |
|
6.4.47 |
भ्रस्जो रोपधयोः रमन्यतरस्याम् |
|
6.4.48 |
अतो लोपः |
|
6.4.49 |
यस्य हलः |
|
6.4.50 |
क्यस्य विभाषा |
|
6.4.51 |
णेरनिटि |
|
6.4.52 |
निष्ठायां सेटि |
|
6.4.53 |
जनिता मन्त्रे |
|
6.4.54 |
शमिता यज्ञे |
|
6.4.55 |
अयामन्ताल्वाय्येत्न्विष्णुषु |
|
6.4.56 |
ल्यपि लघुपूर्वात् |
|
6.4.57 |
विभाषाऽऽपः |
|
6.4.58 |
युप्लुवोर्दीर्घश्छन्दसि |
|
6.4.59 |
क्षियः |
|
6.4.60 |
निष्ठायां अण्यदर्थे |
|
6.4.61 |
वाऽऽक्रोशदैन्ययोः |
|
6.4.62 |
स्यसिच्सीयुट्तासिषु भावकर्मणोरुपदेशेऽज्झनग्रहदृशां वा चिण्वदिट् च |
|
6.4.63 |
दीङो युडचि क्ङिति |
|
6.4.64 |
आतो लोप इटि च |
|
6.4.65 |
ईद्यति |
|
6.4.66 |
घुमास्थागापाजहातिसां हलि |
|
6.4.67 |
एर्लिङि |
|
6.4.68 |
वाऽन्यस्य संयोगादेः |
|
6.4.69 |
न ल्यपि |
|
6.4.70 |
मयतेरिदन्यतरस्याम् |
|
6.4.71 |
लुङ्लङ्लृङ्क्ष्वडुदात्तः |
|
6.4.72 |
आडजादीनाम् |
|
6.4.73 |
छन्दस्यपि दृश्यते |
|
6.4.74 |
न माङ्योगे |
|
6.4.75 |
बहुलं छन्दस्यमाङ्योगेऽपि |
|
6.4.76 |
इरयो रे |
|
6.4.77 |
अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ |
|
6.4.78 |
अभ्यासस्यासवर्णे |
|
6.4.79 |
स्त्रियाः |
|
6.4.80 |
वाऽम्शसोः |
|
6.4.81 |
इणो यण् |
|
6.4.82 |
एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य |
|
6.4.83 |
ओः सुपि |
|
6.4.84 |
वर्षाभ्वश्च |
|
6.4.85 |
न भूसुधियोः |
|
6.4.86 |
छन्दस्युभयथा |
|
6.4.87 |
हुश्नुवोः सार्वधातुके |
|
6.4.88 |
भुवो वुग्लुङ्लिटोः |
|
6.4.89 |
ऊदुपधाया गोहः |
|
6.4.90 |
दोषो णौ |
|
6.4.91 |
वा चित्तविरागे |
|
6.4.92 |
मितां ह्रस्वः |
|
6.4.93 |
चिण्णमुँल्ोर्दीर्घोऽन्यतरस्याम् |
|
6.4.94 |
खचि ह्रस्वः |
|
6.4.95 |
ह्लादो निष्ठायाम् |
|
6.4.96 |
छादेर्घेऽद्व्युपसर्गस्य |
|
6.4.97 |
इस्मन्त्रन्क्विषु च |
|
6.4.98 |
गमहनजनखनघसां लोपः क्ङित्यनङि |
|
6.4.99 |
तनिपत्योश्छन्दसि |
|
6.4.100 |
घसिभसोर्हलि च |
|
6.4.101 |
हुझल्भ्यो हेर्धिः |
|
6.4.102 |
श्रुशृणुपॄकृवृभ्यश्छन्दसि |
|
6.4.103 |
अङितश्च |
|
6.4.104 |
चिणो लुक् |
|
6.4.105 |
अतो हेः |
|
6.4.106 |
उतश्च प्रत्ययादसंयोगपूर्वात् |
|
6.4.107 |
लोपश्चास्यान्यतरस्यां म्वोः |
|
6.4.108 |
नित्यं करोतेः |
|
6.4.109 |
ये च |
|
6.4.110 |
अत उत् सार्वधातुके |
|
6.4.111 |
श्नसोरल्लोपः |
|
6.4.112 |
श्नाऽभ्यस्तयोरातः |
|
6.4.113 |
ई हल्यघोः |
|
6.4.114 |
इद्दरिद्रस्य |
|
6.4.115 |
भियोऽन्यतरस्याम् |
|
6.4.116 |
जहातेश्च |
|
6.4.117 |
आ च हौ |
|
6.4.118 |
लोपो यि |
|
6.4.119 |
घ्वसोरेद्धावभ्यासलोपश्च |
|
6.4.120 |
अत एकहल्मध्येऽनादेशादेर्लिटि |
|
6.4.121 |
थलि च सेटि |
|
6.4.122 |
तॄफलभजत्रपश्च |
|
6.4.123 |
राधो हिंसायाम् |
|
6.4.124 |
वा जॄभ्रमुत्रसाम् |
|
6.4.125 |
फणां च सप्तानाम् |
|
6.4.126 |
न शसददवादिगुणानाम् |
|
6.4.127 |
अर्वणस्त्रसावनञः |
|
6.4.128 |
मघवा बहुलम् |
|
6.4.129 |
भस्य |
|
6.4.130 |
पादः पत् |
|
6.4.131 |
वसोः सम्प्रसारणम् |
|
6.4.132 |
वाह ऊठ् |
|
6.4.133 |
श्वयुवमघोनामतद्धिते |
|
6.4.134 |
अल्लोपोऽनः |
|
6.4.135 |
षपूर्वहन्धृतराज्ञामणि |
|
6.4.136 |
विभाषा ङिश्योः |
|
6.4.137 |
न संयोगाद्वमन्तात् |
|
6.4.138 |
अचः |
|
6.4.139 |
उद ईत् |
|
6.4.140 |
आतो धातोः |
|
6.4.141 |
मन्त्रेष्वाङ्यादेरात्मनः |
|
6.4.142 |
ति विंशतेर्डिति |
|
6.4.143 |
टेः |
|
6.4.144 |
नस्तद्धिते |
|
6.4.145 |
अह्नष्टखोरेव |
|
6.4.146 |
ओर्गुणः |
|
6.4.147 |
ढे लोपोऽकद्र्वाः |
|
6.4.148 |
यस्येति च |
|
6.4.149 |
सूर्यतिष्यागस्त्यमत्स्यानां य उपधायाः |
|
6.4.150 |
हलस्तद्धितस्य |
|
6.4.151 |
आपत्यस्य च तद्धितेऽनाति |
|
6.4.152 |
क्यच्व्योश्च |
|
6.4.153 |
बिल्वकादिभ्यश्छस्य लुक् |
|
6.4.154 |
तुरिष्ठेमेयस्सु |
|
6.4.155 |
टेः |
|
6.4.156 |
स्थूलदूरयुवह्रस्वक्षिप्रक्षुद्राणां यणादिपरं पूर्वस्य च गुणः |
|
6.4.157 |
प्रियस्थिरस्फिरोरुबहुलगुरुवृद्धतृप्रदीर्घवृन्दारकाणां प्रस्थस्फवर्बंहिगर्वर्षित्रब्द्राघिवृन्दाः |
|
6.4.158 |
बहोर्लोपो भू च बहोः |
|
6.4.159 |
इष्ठस्य यिट् च |
|
6.4.160 |
ज्यादादीयसः |
|
6.4.161 |
र ऋतो हलादेर्लघोः |
|
6.4.162 |
विभाषर्जोश्छन्दसि |
|
6.4.163 |
प्रकृत्यैकाच् |
|
6.4.164 |
इनण्यनपत्ये |
|
6.4.165 |
गाथिविदथिकेशिगणिपणिनश्च |
|
6.4.166 |
संयोगादिश्च |
|
6.4.167 |
अन् |
|
6.4.168 |
ये चाभावकर्मणोः |
|
6.4.169 |
आत्माध्वानौ खे |
|
6.4.170 |
न मपूर्वोऽपत्येऽवर्मणः |
|
6.4.171 |
ब्राह्मोअजातौ |
|
6.4.172 |
कार्मस्ताच्छील्ये |
|
6.4.173 |
औक्षमनपत्ये |
|
6.4.174 |
दाण्डिनायनहास्तिनायनाथर्वणिकजैह्माशिनेयवाशिनायनिभ्रौणहत्यधैवत्यसारवैक्ष्वाकमैत्रेयहिरण्मयानि |
|
6.4.175 |
ऋत्व्यवास्त्व्यवास्त्वमाध्वीहिरण्ययानि च्छन्दसि |
|
7.1.1 |
युवोरनाकौ |
|
7.1.2 |
आयनेयीनीयियः फढखच्छघां प्रत्ययादीनाम् |
|
7.1.3 |
झोऽन्तः |
|
7.1.4 |
अदभ्यस्तात् |
|
7.1.5 |
आत्मनेपदेष्वनतः |
|
7.1.6 |
शीङो रुट् |
|
7.1.7 |
वेत्तेर्विभाषा |
|
7.1.8 |
बहुलं छन्दसि |
|
7.1.9 |
अतो भिस ऐस् |
|
7.1.10 |
बहुलं छन्दसि |
|
7.1.11 |
नेदमदसोरकोः |
|
7.1.12 |
टाङसिङसामिनात्स्याः |
|
7.1.13 |
ङेर्यः |
|
7.1.14 |
सर्वनाम्नः स्मै |
|
7.1.15 |
ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ |
|
7.1.16 |
पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा |
|
7.1.17 |
जसः शी |
|
7.1.18 |
औङ आपः |
|
7.1.19 |
नपुंसकाच्च |
|
7.1.20 |
जश्शसोः शिः |
|
7.1.21 |
अष्टाभ्य औश् |
|
7.1.22 |
षड्भ्यो लुक् |
|
7.1.23 |
स्वमोर्नपुंसकात् |
|
7.1.24 |
अतोऽम् |
|
7.1.25 |
अद्ड् डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः |
|
7.1.26 |
नेतराच्छन्दसि |
|
7.1.27 |
युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् |
|
7.1.28 |
ङे प्रथमयोरम् |
|
7.1.29 |
शसो न |
|
7.1.30 |
भ्यसो भ्यम् |
|
7.1.31 |
पञ्चम्या अत् |
|
7.1.32 |
एकवचनस्य च |
|
7.1.33 |
साम आकम् |
|
7.1.34 |
आत औ णलः |
|
7.1.35 |
तुह्योस्तातङाशिष्यन्यतरस्याम् |
|
7.1.36 |
विदेः शतुर्वसुः |
|
7.1.37 |
समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप् |
|
7.1.38 |
क्त्वाऽपि छन्दसि |
|
7.1.39 |
सुपां सुलुक्पूर्वसवर्णाऽऽच्छेयाडाड्यायाजालः |
|
7.1.40 |
अमो मश् |
|
7.1.41 |
लोपस्त आत्मनेपदेषु |
|
7.1.42 |
ध्वमो ध्वात् |
|
7.1.43 |
यजध्वैनमिति च |
|
7.1.44 |
तस्य तात् |
|
7.1.45 |
तप्तनप्तनथनाश्च |
|
7.1.46 |
इदन्तो मसि |
|
7.1.47 |
क्त्वो यक् |
|
7.1.48 |
इष्ट्वीनमिति च |
|
7.1.49 |
स्नात्व्यादयश्च |
|
7.1.50 |
आज्जसेरसुक् |
|
7.1.51 |
अश्वक्षीरवृषलवणानामात्मप्रीतौ क्यचि |
|
7.1.52 |
आमि सर्वनाम्नः सुट् |
|
7.1.53 |
त्रेस्त्रयः |
|
7.1.54 |
ह्रस्वनद्यापो नुट् |
|
7.1.55 |
षट्चतुर्भ्यश्च |
|
7.1.56 |
श्रीग्रामण्योश्छन्दसि |
|
7.1.57 |
गोः पादान्ते |
|
7.1.58 |
इदितो नुम् धातोः |
|
7.1.59 |
शे मुचादीनाम् |
|
7.1.60 |
मस्जिनशोर्झलि |
|
7.1.61 |
रधिजभोरचि |
|
7.1.62 |
नेट्यलिटि रधेः |
|
7.1.63 |
रभेरशब्लिटोः |
|
7.1.64 |
लभेश्च |
|
7.1.65 |
आङो यि |
|
7.1.66 |
उपात् प्रशंसायाम् |
|
7.1.67 |
उपसर्गात् खल्घञोः |
|
7.1.68 |
न सुदुर्भ्यां केवलाभ्याम् |
|
7.1.69 |
विभाषा चिण्णमुँल्ोः |
|
7.1.70 |
उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः |
|
7.1.71 |
युजेरसमासे |
|
7.1.72 |
नपुंसकस्य झलचः |
|
7.1.73 |
इकोऽचि विभक्तौ |
|
7.1.74 |
तृतीयाऽऽदिषु भाषितपुंस्कं पुंवद्गालवस्य |
|
7.1.75 |
अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णामनङुदात्तः |
|
7.1.76 |
छन्दस्यपि दृश्यते |
|
7.1.77 |
ई च द्विवचने |
|
7.1.78 |
नाभ्यस्ताच्छतुः |
|
7.1.79 |
वा नपुंसकस्य |
|
7.1.80 |
आच्छीनद्योर्नुम् |
|
7.1.81 |
शप्श्यनोर्नित्यम् |
|
7.1.82 |
सावनडुहः |
|
7.1.83 |
दृक्स्ववस्स्वतवसां छन्दसि |
|
7.1.84 |
दिव औत् |
|
7.1.85 |
पथिमथ्यृभुक्षामात् |
|
7.1.86 |
इतोऽत् सर्वनामस्थाने |
|
7.1.87 |
थो न्थः |
|
7.1.88 |
भस्य टेर्लोपः |
|
7.1.89 |
पुंसोऽसुङ् |
|
7.1.90 |
गोतो णित् |
|
7.1.91 |
णलुत्तमो वा |
|
7.1.92 |
सख्युरसम्बुद्धौ |
|
7.1.93 |
अनङ् सौ |
|
7.1.94 |
ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसां च |
|
7.1.95 |
तृज्वत् क्रोष्टुः |
|
7.1.96 |
स्त्रियां च |
|
7.1.97 |
विभाषा तृतीयाऽऽदिष्वचि |
|
7.1.98 |
चतुरनडुहोरामुदात्तः |
|
7.1.99 |
अम् सम्बुद्धौ |
|
7.1.100 |
ॠत इद्धातोः |
|
7.1.101 |
उपधायाश्च |
|
7.1.102 |
उदोष्ठ्यपूर्वस्य |
|
7.1.103 |
बहुलं छन्दसि |
|
7.2.1 |
सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु |
|
7.2.2 |
अतो र्लान्तस्य |
|
7.2.3 |
वदव्रजहलन्तस्याचः |
|
7.2.4 |
नेटि |
|
7.2.5 |
ह्म्यन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम् |
|
7.2.6 |
ऊर्णोतेर्विभाषा |
|
7.2.7 |
अतो हलादेर्लघोः |
|
7.2.8 |
नेड् वशि कृति |
|
7.2.9 |
तितुत्रतथसिसुसरकसेषु च |
|
7.2.10 |
एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् |
|
7.2.11 |
श्र्युकः किति |
|
7.2.12 |
सनि ग्रहगुहोश्च |
|
7.2.13 |
कृसृभृवृस्तुद्रुस्रुश्रुवो लिटि |
|
7.2.14 |
श्वीदितो निष्ठायाम् |
|
7.2.15 |
यस्य विभाषा |
|
7.2.16 |
आदितश्च |
|
7.2.17 |
विभाषा भावादिकर्मणोः |
|
7.2.18 |
क्षुब्धस्वान्तध्वान्तलग्नम्लिष्टविरिब्धफाण्टबाढानि मन्थमनस्तमःसक्ताविस्पष्टस्वरानायासभृशेषु |
|
7.2.19 |
धृषिशसी वैयात्ये |
|
7.2.20 |
दृढः स्थूलबलयोः |
|
7.2.21 |
प्रभौ परिवृढः |
|
7.2.22 |
कृच्छ्रगहनयोः कषः |
|
7.2.23 |
घुषिरविशब्दने |
|
7.2.24 |
अर्देः संनिविभ्यः |
|
7.2.25 |
अभेश्चाविदूर्ये |
|
7.2.26 |
णेरध्ययने वृत्तम् |
|
7.2.27 |
वा दान्तशान्तपूर्णदस्तस्पष्टच्छन्नज्ञप्ताः |
|
7.2.28 |
रुष्यमत्वरसंघुषास्वनाम् |
|
7.2.29 |
हृषेर्लोमसु |
|
7.2.30 |
अपचितश्च |
|
7.2.31 |
ह्रु ह्वरेश्छन्दसि |
|
7.2.32 |
अपरिह्वृताश्च |
|
7.2.33 |
सोमे ह्वरितः |
|
7.2.34 |
ग्रसितस्कभितस्तभितोत्तभितचत्तविकस्तविशस्तॄशंस्तृशास्तृतरुतृतरूतृवरुतृवरूतृवरुत्रीरुज्ज्वलितिक्षरितिक्षमितिवमित्यमितीति च |
|
7.2.35 |
आर्धधातुकस्येड् वलादेः |
|
7.2.36 |
स्नुक्रमोरनात्मनेपदनिमित्ते |
|
7.2.37 |
ग्रहोऽलिटि दीर्घः |
|
7.2.38 |
वॄतो वा |
|
7.2.39 |
न लिङि |
|
7.2.40 |
सिचि च परस्मैपदेषु |
|
7.2.41 |
इट् सनि वा |
|
7.2.42 |
लिङ्सिचोरात्मनेपदेषु |
|
7.2.43 |
ऋतश्च संयोगादेः |
|
7.2.44 |
स्वरतिसूतिसूयतिधूञूदितो वा |
|
7.2.45 |
रधादिभ्यश्च |
|
7.2.46 |
निरः कुषः |
|
7.2.47 |
इण्निष्ठायाम् |
|
7.2.48 |
तीषसहलुभरुषरिषः |
|
7.2.49 |
सनीवन्तर्धभ्रस्जदम्भुश्रिस्वृयूर्णुभरज्ञपिसनाम् |
|
7.2.50 |
क्लिशः क्त्वानिष्ठयोः |
|
7.2.51 |
पूङश्च |
|
7.2.52 |
वसतिक्षुधोरिट् |
|
7.2.53 |
अञ्चेः पूजायाम् |
|
7.2.54 |
लुभो विमोचने |
|
7.2.55 |
जॄव्रश्च्योः क्त्वि |
|
7.2.56 |
उदितो वा |
|
7.2.57 |
सेऽसिचि कृतचृतच्छृदतृदनृतः |
|
7.2.58 |
गमेरिट् परस्मैपदेषु |
|
7.2.59 |
न वृद्भ्यश्चतुर्भ्यः |
|
7.2.60 |
तासि च कॢपः |
|
7.2.61 |
अचस्तास्वत् थल्यनिटो नित्यम् |
|
7.2.62 |
उपदेशेऽत्वतः |
|
7.2.63 |
ऋतो भारद्वाजस्य |
|
7.2.64 |
बभूथाततन्थजगृम्भववर्थेति निगमे |
|
7.2.65 |
विभाषा सृजिदृषोः |
|
7.2.66 |
इडत्त्यर्तिव्ययतीनाम् |
|
7.2.67 |
वस्वेकाजाद्घसाम् |
|
7.2.68 |
विभाषा गमहनविदविशाम् |
|
7.2.69 |
सनिंससनिवांसम् |
|
7.2.70 |
ऋद्धनोः स्ये |
|
7.2.71 |
अञ्जेः सिचि |
|
7.2.72 |
स्तुसुधूञ्भ्यः परस्मैपदेषु |
|
7.2.73 |
यमरमनमातां सक् च |
|
7.2.74 |
स्मिपूङ्रञ्ज्वशां सनि |
|
7.2.75 |
किरश्च पञ्चभ्यः |
|
7.2.76 |
रुदादिभ्यः सार्वधातुके |
|
7.2.77 |
ईशः से |
|
7.2.78 |
ईडजनोर्ध्वे च |
|
7.2.79 |
लिङः सलोपोऽनन्त्यस्य |
|
7.2.80 |
अतो येयः |
|
7.2.81 |
आतो ङितः |
|
7.2.82 |
आने मुक् |
|
7.2.83 |
ईदासः |
|
7.2.84 |
अष्टन आ विभक्तौ |
|
7.2.85 |
रायो हलि |
|
7.2.86 |
युष्मदस्मदोरनादेशे |
|
7.2.87 |
द्वितीयायां च |
|
7.2.88 |
प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् |
|
7.2.89 |
योऽचि |
|
7.2.90 |
शेषे लोपः |
|
7.2.91 |
मपर्यन्तस्य |
|
7.2.92 |
युवावौ द्विवचने |
|
7.2.93 |
यूयवयौ जसि |
|
7.2.94 |
त्वाहौ सौ |
|
7.2.95 |
तुभ्यमह्यौ ङयि |
|
7.2.96 |
तवममौ ङसि |
|
7.2.97 |
त्वमावेकवचने |
|
7.2.98 |
प्रत्ययोत्तरपदयोश्च |
|
7.2.99 |
त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ |
|
7.2.100 |
अचि र ऋतः |
|
7.2.101 |
जराया जरसन्यतरस्याम् |
|
7.2.102 |
त्यदादीनामः |
|
7.2.103 |
किमः कः |
|
7.2.104 |
कु तिहोः |
|
7.2.105 |
क्वाति |
|
7.2.106 |
तदोः सः सावनन्त्ययोः |
|
7.2.107 |
अदस औ सुलोपश्च |
|
7.2.108 |
इदमो मः |
|
7.2.109 |
दश्च |
|
7.2.110 |
यः सौ |
|
7.2.111 |
इदोऽय् पुंसि |
|
7.2.112 |
अनाप्यकः |
|
7.2.113 |
हलि लोपः |
|
7.2.114 |
मृजेर्वृद्धिः |
|
7.2.115 |
अचो ञ्णिति |
|
7.2.116 |
अत उपधायाः |
|
7.2.117 |
तद्धितेष्वचामादेः |
|
7.2.118 |
किति च |
|
7.3.1 |
देविकाशिंशपादित्यवाड्दीर्घसत्रश्रेयसामात् |
|
7.3.2 |
केकयमित्त्रयुप्रलयानां यादेरियः |
|
7.3.3 |
न य्वाभ्यां पदान्ताभ्याम् पूर्वौ तु ताभ्यामैच् |
|
7.3.4 |
द्वारादीनां च |
|
7.3.5 |
न्यग्रोधस्य च केवलस्य |
|
7.3.6 |
न कर्मव्यतिहारे |
|
7.3.7 |
स्वागतादीनां च |
|
7.3.8 |
श्वादेरिञि |
|
7.3.9 |
पदान्तस्यान्यतरस्याम् |
|
7.3.10 |
उत्तरपदस्य |
|
7.3.11 |
अवयवादृतोः |
|
7.3.12 |
सुसर्वार्धाज्जनपदस्य |
|
7.3.13 |
दिशोऽमद्राणाम् |
|
7.3.14 |
प्राचां ग्रामनगराणाम् |
|
7.3.15 |
संख्यायाः संवत्सरसंख्यस्य च |
|
7.3.16 |
वर्षस्याभविष्यति |
|
7.3.17 |
परिमाणान्तस्यासंज्ञाशाणयोः |
|
7.3.18 |
जे प्रोष्ठपदानाम् |
|
7.3.19 |
हृद्भगसिन्ध्वन्ते पूर्वपदस्य च |
|
7.3.20 |
अनुशतिकादीनां च |
|
7.3.21 |
देवताद्वंद्वे च |
|
7.3.22 |
नेन्द्रस्य परस्य |
|
7.3.23 |
दीर्घाच्च वरुणस्य |
|
7.3.24 |
प्राचां नगरान्ते |
|
7.3.25 |
जङ्गलधेनुवलजान्तस्य विभाषितमुत्तरम् |
|
7.3.26 |
अर्धात् परिमाणस्य पूर्वस्य तु वा |
|
7.3.27 |
नातः परस्य |
|
7.3.28 |
प्रवाहणस्य ढे |
|
7.3.29 |
तत्प्रत्ययस्य च |
|
7.3.30 |
नञः शुचीश्वरक्षेत्रज्ञकुशलनिपुणानाम् |
|
7.3.31 |
यथातथयथापुरयोः पर्यायेण |
|
7.3.32 |
हनस्तोऽचिण्णलोः |
|
7.3.33 |
आतो युक् चिण्कृतोः |
|
7.3.34 |
नोदात्तोपदेशस्य मान्तस्यानाचमेः |
|
7.3.35 |
जनिवध्योश्च |
|
7.3.36 |
अर्त्तिह्रीब्लीरीक्नूयीक्ष्माय्यातां पुङ्णौ |
|
7.3.37 |
शाच्छासाह्वाव्यावेपां युक् |
|
7.3.38 |
वो विधूनने जुक् |
|
7.3.39 |
लीलोर्नुग्लुकावन्यतरस्यां स्नेहविपातने |
|
7.3.40 |
भियो हेतुभये षुक् |
|
7.3.41 |
स्फायो वः |
|
7.3.42 |
शदेरगतौ तः |
|
7.3.43 |
रुहः पोऽन्यतरस्याम् |
|
7.3.44 |
प्रत्ययस्थात् कात् पूर्वस्यात इदाप्यसुपः |
|
7.3.45 |
न यासयोः |
|
7.3.46 |
उदीचामातः स्थाने यकपूर्वायाः |
|
7.3.47 |
भस्त्रैषाऽजाज्ञाद्वास्वानञ्पूर्वाणामपि |
|
7.3.48 |
अभाषितपुंस्काच्च |
|
7.3.49 |
आदाचार्याणाम् |
|
7.3.50 |
ठस्येकः |
|
7.3.51 |
इसुसुक्तान्तात् कः |
|
7.3.52 |
चजोः कु घिन्ण्यतोः |
|
7.3.53 |
न्यङ्क्वादीनां च |
|
7.3.54 |
हो हन्तेर्ञ्णिन्नेषु |
|
7.3.55 |
अभ्यासाच्च |
|
7.3.56 |
हेरचङि |
|
7.3.57 |
सन्लिटोर्जेः |
|
7.3.58 |
विभाषा चेः |
|
7.3.59 |
न क्वादेः |
|
7.3.60 |
अजिवृज्योश्च |
|
7.3.61 |
भुजन्युब्जौ पाण्युपतापयोः |
|
7.3.62 |
प्रयाजानुयाजौ यज्ञाङ्गे |
|
7.3.63 |
वञ्चेर्गतौ |
|
7.3.64 |
ओक उचः के |
|
7.3.65 |
ण्य आवश्यके |
|
7.3.66 |
यजयाचरुचप्रवचर्चश्च |
|
7.3.67 |
वचोऽशब्दसंज्ञायाम् |
|
7.3.68 |
प्रयोज्यनियोज्यौ शक्यार्थे |
|
7.3.69 |
भोज्यं भक्ष्ये |
|
7.3.70 |
घोर्लोपो लेटि वा |
|
7.3.71 |
ओतः श्यनि |
|
7.3.72 |
क्सस्याचि |
|
7.3.73 |
लुग्वा दुहदिहलिहगुहामात्मनेपदे दन्त्ये |
|
7.3.74 |
शमामष्टानां दीर्घः श्यनि |
|
7.3.75 |
ष्ठिवुक्लम्याचमां शिति |
|
7.3.76 |
क्रमः परस्मैपदेषु |
|
7.3.77 |
इषुगमियमां छः |
|
7.3.78 |
पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्दृश्यर्त्तिसर्त्तिशदसदाम् ६/३ पिबजिघ्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यर्च्छधौशीयसीदाः १/३
|
7.3.79 |
ज्ञाजनोर्जा |
|
7.3.80 |
प्वादीनां ह्रस्वः |
|
7.3.81 |
मीनातेर्निगमे |
|
7.3.82 |
मिदेर्गुणः |
|
7.3.83 |
जुसि च |
|
7.3.84 |
सार्वधातुकार्धधातुकयोः |
|
7.3.85 |
जाग्रोऽविचिण्णल्ङित्सु |
|
7.3.86 |
पुगन्तलघूपधस्य च |
|
7.3.87 |
नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके |
|
7.3.88 |
भूसुवोस्तिङि |
|
7.3.89 |
उतो वृद्धिर्लुकि हलि |
|
7.3.90 |
ऊर्णोतेर्विभाषा |
|
7.3.91 |
गुणोऽपृक्ते |
|
7.3.92 |
तृणह इम् |
|
7.3.93 |
ब्रुव ईट् |
|
7.3.94 |
यङो वा |
|
7.3.95 |
तुरुस्तुशम्यमः सार्वधातुके |
|
7.3.96 |
अस्तिसिचोऽपृक्ते |
|
7.3.97 |
बहुलं छन्दसि |
|
7.3.98 |
रुदश्च पञ्चभ्यः |
|
7.3.99 |
अड्गार्ग्यगालवयोः |
|
7.3.100 |
अदः सर्वेषाम् |
|
7.3.101 |
अतो दीर्घो यञि |
|
7.3.102 |
सुपि च |
|
7.3.103 |
बहुवचने झल्येत् |
|
7.3.104 |
ओसि च |
|
7.3.105 |
आङि चापः |
|
7.3.106 |
सम्बुद्धौ च |
|
7.3.107 |
अम्बाऽर्थनद्योर्ह्रस्वः |
|
7.3.108 |
ह्रस्वस्य गुणः |
|
7.3.109 |
जसि च |
|
7.3.110 |
ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः |
|
7.3.111 |
घेर्ङिति |
|
7.3.112 |
आण्नद्याः |
|
7.3.113 |
याडापः |
|
7.3.114 |
सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च |
|
7.3.115 |
विभाषा द्वितीयातृतीयाभ्याम् |
|
7.3.116 |
ङेराम्नद्याम्नीभ्यः |
|
7.3.117 |
इदुद्भ्याम् |
|
7.3.118 |
औत् |
|
7.3.119 |
अच्च घेः |
|
7.3.120 |
आङो नाऽस्त्रियाम् |
|
7.4.1 |
णौ चङ्युपधाया ह्रस्वः |
|
7.4.2 |
नाग्लोपिशास्वृदिताम् |
|
7.4.3 |
भ्राजभासभाषदीपजीवमीलपीडामन्यतरस्याम् |
|
7.4.4 |
लोपः पिबतेरीच्चाभ्यासस्य |
|
7.4.5 |
तिष्ठतेरित् |
|
7.4.6 |
जिघ्रतेर्वा |
|
7.4.7 |
उर्ऋत् |
|
7.4.8 |
नित्यं छन्दसि |
|
7.4.9 |
दयतेर्दिगि लिटि |
|
7.4.10 |
ऋतश्च संयोगादेर्गुणः |
|
7.4.11 |
ऋच्छत्यॄताम् |
|
7.4.12 |
शृदॄप्रां ह्रस्वो वा |
|
7.4.13 |
केऽणः |
|
7.4.14 |
न कपि |
|
7.4.15 |
आपोऽन्यतरस्याम् |
|
7.4.16 |
ऋदृशोऽङि गुणः |
|
7.4.17 |
अस्यतेस्थुक् |
|
7.4.18 |
श्वयतेरः |
|
7.4.19 |
पतः पुम् |
|
7.4.20 |
वच उम् |
|
7.4.21 |
शीङः सार्वधातुके गुणः |
|
7.4.22 |
अयङ् यि क्ङिति |
|
7.4.23 |
उपसर्गाद्ध्रस्व ऊहतेः |
|
7.4.24 |
एतेर्लिङि |
|
7.4.25 |
अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः |
|
7.4.26 |
च्वौ च |
|
7.4.27 |
रीङ् ऋतः |
|
7.4.28 |
रिङ् शयग्लिङ्क्षु |
|
7.4.29 |
गुणोऽर्तिसंयोगाद्योः |
|
7.4.30 |
यङि च |
|
7.4.31 |
ई घ्राध्मोः |
|
7.4.32 |
अस्य च्वौ |
|
7.4.33 |
क्यचि च |
|
7.4.34 |
अशनायोदन्यधनाया बुभुक्षापिपासागर्द्धेषु |
|
7.4.35 |
न च्छन्दस्यपुत्रस्य |
|
7.4.36 |
दुरस्युर्द्रविणस्युर्वृषण्यतिरिषण्यति |
|
7.4.37 |
अश्वाघस्यात् |
|
7.4.38 |
देवसुम्नयोर्यजुषि काठके |
|
7.4.39 |
कव्यध्वरपृतनस्यर्चि लोपः |
|
7.4.40 |
द्यतिस्यतिमास्थामित्ति किति |
|
7.4.41 |
शाछोरन्यतरस्याम् |
|
7.4.42 |
दधातेर्हिः |
|
7.4.43 |
जहातेश्च क्त्वि |
|
7.4.44 |
विभाषा छन्दसि |
|
7.4.45 |
सुधितवसुधितनेमधितधिष्वधिषीय च |
|
7.4.46 |
दो दद् घोः |
|
7.4.47 |
अच उपसर्गात्तः |
|
7.4.48 |
अपो भि |
|
7.4.49 |
सः स्यार्द्धधातुके |
|
7.4.50 |
तासस्त्योर्लोपः |
|
7.4.51 |
रि च |
|
7.4.52 |
ह एति |
|
7.4.53 |
यीवर्णयोर्दीधीवेव्योः |
|
7.4.54 |
सनि मीमाघुरभलभशकपतपदामच इस् |
|
7.4.55 |
आप्ज्ञप्यृधामीत् |
|
7.4.56 |
दम्भ इच्च |
|
7.4.57 |
मुचोऽकर्मकस्य गुणो वा |
|
7.4.58 |
अत्र लोपोऽभ्यासस्य |
|
7.4.59 |
ह्रस्वः |
|
7.4.60 |
हलादिः शेषः |
|
7.4.61 |
शर्पूर्वाः खयः |
|
7.4.62 |
कुहोश्चुः |
|
7.4.63 |
न कवतेर्यङि |
|
7.4.64 |
कृषेश्छन्दसि |
|
7.4.65 |
दाधर्तिदर्धर्तिदर्धर्षिबोभूतुतेतिक्तेऽलर्ष्यापनीफणत्संसनिष्यदत्करिक्रत्कनिक्रदद्भरिभ्रद्दविध्वतोदविद्युतत्तरित्रतःसरीसृपतंवरीवृजन्मर्मृज्यागनीगन्तीति च |
|
7.4.66 |
उरत् |
|
7.4.67 |
द्युतिस्वाप्योः सम्प्रसारणम् |
|
7.4.68 |
व्यथो लिटि |
|
7.4.69 |
दीर्घ इणः किति |
|
7.4.70 |
अत आदेः |
|
7.4.71 |
तस्मान्नुड् द्विहलः |
|
7.4.72 |
अश्नोतेश्च |
|
7.4.73 |
भवतेरः |
|
7.4.74 |
ससूवेति निगमे |
|
7.4.75 |
निजां त्रयाणां गुणः श्लौ |
|
7.4.76 |
भृञामित् |
|
7.4.77 |
अर्तिपिपर्त्योश्च |
|
7.4.78 |
बहुलं छन्दसि |
|
7.4.79 |
सन्यतः |
|
7.4.80 |
ओः पुयण्ज्यपरे |
|
7.4.81 |
स्रवतिशृणोतिद्रवतिप्रवतिप्लवतिच्यवतीनां वा |
|
7.4.82 |
गुणो यङ्लुकोः |
|
7.4.83 |
दीर्घोऽकितः |
|
7.4.84 |
नीग्वञ्चुस्रंसुध्वंसुभ्रंसुकसपतपदस्कन्दाम् |
|
7.4.85 |
नुगतोऽनुनासिकान्तस्य |
|
7.4.86 |
जपजभदहदशभञ्जपशां च |
|
7.4.87 |
चरफलोश्च |
|
7.4.88 |
उत् परस्यातः |
|
7.4.89 |
ति च |
|
7.4.90 |
रीगृदुपधस्य च |
|
7.4.91 |
रुग्रिकौ च लुकि |
|
7.4.92 |
ऋतश्च |
|
7.4.93 |
सन्वल्लघुनि चङ्परेऽनग्लोपे |
|
7.4.94 |
दीर्घो लघोः |
|
7.4.95 |
अत् स्मृदृत्वरप्रथम्रदस्तॄस्पशाम् |
|
7.4.96 |
विभाषा वेष्टिचेष्ट्योः |
|
7.4.97 |
ई च गणः |
|
8.1.1 |
सर्वस्य द्वे |
|
8.1.2 |
तस्य परमाम्रेडितम् |
|
8.1.3 |
अनुदात्तं च |
|
8.1.4 |
नित्यवीप्सयोः |
|
8.1.5 |
परेर्वर्जने |
|
8.1.6 |
प्रसमुपोदः पादपूरणे |
|
8.1.7 |
उपर्यध्यधसः सामीप्ये |
|
8.1.8 |
वाक्यादेरामन्त्रितस्यासूयासम्मतिकोपकुत्सनभर्त्सनेषु |
|
8.1.9 |
एकं बहुव्रीहिवत् |
|
8.1.10 |
आबाधे च |
|
8.1.11 |
कर्मधारयवत् उत्तरेषु |
|
8.1.12 |
प्रकारे गुणवचनस्य |
|
8.1.13 |
अकृच्छ्रे प्रियसुखयोरन्यतरस्याम् |
|
8.1.14 |
यथास्वे यथायथम् |
|
8.1.15 |
द्वन्द्वं रहस्यमर्यादावचनव्युत्क्रमणयज्ञपात्रप्रयोगाभिव्यक्तिषु |
|
8.1.16 |
पदस्य |
|
8.1.17 |
पदात् |
|
8.1.18 |
अनुदात्तं सर्वमपादादौ |
|
8.1.19 |
आमन्त्रितस्य च |
|
8.1.20 |
युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोर्वान्नावौ |
|
8.1.21 |
बहुवचने वस्नसौ |
|
8.1.22 |
तेमयावेकवचनस्य |
|
8.1.23 |
त्वामौ द्वितीयायाः |
|
8.1.24 |
न चवाहाहैवयुक्ते |
|
8.1.25 |
पश्यार्थैश्चानालोचने |
|
8.1.26 |
सपूर्वायाः प्रथमाया विभाषा |
|
8.1.27 |
तिङो गोत्रादीनि कुत्सनाभीक्ष्ण्ययोः |
|
8.1.28 |
तिङ्ङतिङः |
|
8.1.29 |
न लुट् |
|
8.1.30 |
निपातैर्यद्यदिहन्तकुविन्नेच्चेच्चण्कच्चिद्यत्रयुक्तम् |
|
8.1.31 |
नह प्रत्यारम्भे |
|
8.1.32 |
सत्यं प्रश्ने |
|
8.1.33 |
अङ्गाप्रातिलोम्ये |
|
8.1.34 |
हि च |
|
8.1.35 |
छन्दस्यनेकमपि साकाङ्क्षम् |
|
8.1.36 |
यावद्यथाभ्याम् |
|
8.1.37 |
पूजायां नानन्तरम् |
|
8.1.38 |
उपसर्गव्यपेतं च |
|
8.1.39 |
तुपश्यपश्यताहैः पूजायाम् |
|
8.1.40 |
अहो च |
|
8.1.41 |
शेषे विभाषा |
|
8.1.42 |
पुरा च परीप्सायाम् |
|
8.1.43 |
नन्वित्यनुज्ञैषणायाम् |
|
8.1.44 |
किं क्रियाप्रश्नेऽनुपसर्गमप्रतिषिद्धम् |
|
8.1.45 |
लोपे विभाषा |
|
8.1.46 |
एहिमन्ये प्रहासे लृट् |
|
8.1.47 |
जात्वपूर्वम् |
|
8.1.48 |
किम्वृत्तं च चिदुत्तरम् |
|
8.1.49 |
आहो उताहो चानन्तरम् |
|
8.1.50 |
शेषे विभाषा |
|
8.1.51 |
गत्यर्थलोटा लृण्न चेत् कारकं सर्वान्यत् |
|
8.1.52 |
लोट् च |
|
8.1.53 |
विभाषितं सोपसर्गमनुत्तमम् |
|
8.1.54 |
हन्त च |
|
8.1.55 |
आम एकान्तरमामन्त्रितमनन्तिके |
|
8.1.56 |
यद्धितुपरं छन्दसि |
|
8.1.57 |
चनचिदिवगोत्रादितद्धिताम्रेडितेष्वगतेः |
|
8.1.58 |
चादिषु च |
|
8.1.59 |
चवायोगे प्रथमा |
|
8.1.60 |
हेति क्षियायाम् |
|
8.1.61 |
अहेति विनियोगे च |
|
8.1.62 |
चाहलोप एवेत्यवधारणम् |
|
8.1.63 |
चादिलोपे विभाषा |
|
8.1.64 |
वैवावेति च च्छन्दसि |
|
8.1.65 |
एकान्याभ्यां समर्थाभ्याम् |
|
8.1.66 |
यद्वृत्तान्नित्यं |
|
8.1.67 |
पूजनात् पूजितमनुदात्तम् (काष्ठादिभ्यः) |
|
8.1.68 |
सगतिरपि तिङ् |
|
8.1.69 |
कुत्सने च सुप्यगोत्रादौ |
|
8.1.70 |
गतिर्गतौ |
|
8.1.71 |
तिङि चोदात्तवति |
|
8.1.72 |
आमन्त्रितं पूर्वम् अविद्यमानवत् |
|
8.1.73 |
नामन्त्रिते समानाधिकरणे (सामान्यवचनम्) |
|
8.1.74 |
विभाषितं विशेषवचने बहुवचनम् |
|
8.2.1 |
पूर्वत्रासिद्धम् |
|
8.2.2 |
नलोपः सुप्स्वरसंज्ञातुग्विधिषु कृति |
|
8.2.3 |
न मु ने |
|
8.2.4 |
उदात्तस्वरितयोर्यणः स्वरितोऽनुदात्तस्य |
|
8.2.5 |
एकादेश उदात्तेनोदात्तः |
|
8.2.6 |
स्वरितो वाऽनुदात्ते पदादौ |
|
8.2.7 |
नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य |
|
8.2.8 |
न ङिसम्बुद्ध्योः |
|
8.2.9 |
मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः |
|
8.2.10 |
झयः |
|
8.2.11 |
संज्ञायाम् |
|
8.2.12 |
आसन्दीवदष्ठीवच्चक्रीवत्कक्षीवद्रुमण्वच्चर्मण्वती |
|
8.2.13 |
उदन्वानुदधौ च |
|
8.2.14 |
राजन्वान् सौराज्ये |
|
8.2.15 |
छन्दसीरः |
|
8.2.16 |
अनो नुट् |
|
8.2.17 |
नाद्घस्य |
|
8.2.18 |
कृपो रो लः |
|
8.2.19 |
उपसर्गस्यायतौ |
|
8.2.20 |
ग्रो यङि |
|
8.2.21 |
अचि विभाषा |
|
8.2.22 |
परेश्च घाङ्कयोः |
|
8.2.23 |
संयोगान्तस्य लोपः |
|
8.2.24 |
रात् सस्य |
|
8.2.25 |
धि च |
|
8.2.26 |
झलो झलि |
|
8.2.27 |
ह्रस्वादङ्गात् |
|
8.2.28 |
इट ईटि |
|
8.2.29 |
स्कोः संयोगाद्योरन्ते च |
|
8.2.30 |
चोः कुः |
|
8.2.31 |
हो ढः |
|
8.2.32 |
दादेर्धातोर्घः |
|
8.2.33 |
वा द्रुहमुहष्णुहष्णिहाम् |
|
8.2.34 |
नहो धः |
|
8.2.35 |
आहस्थः |
|
8.2.36 |
व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राजच्छशां षः |
|
8.2.37 |
एकाचो बशो भष् झषन्तस्य स्ध्वोः |
|
8.2.38 |
दधस्तथोश्च |
|
8.2.39 |
झलां जशोऽन्ते |
|
8.2.40 |
झषस्तथोर्धोऽधः |
|
8.2.41 |
षढोः कः सि |
|
8.2.42 |
रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः |
|
8.2.43 |
संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः |
|
8.2.44 |
ल्वादिभ्यः |
|
8.2.45 |
ओदितश्च |
|
8.2.46 |
क्षियो दीर्घात् |
|
8.2.47 |
श्योऽस्पर्शे |
|
8.2.48 |
अञ्चोऽनपादाने |
|
8.2.49 |
दिवोऽविजिगीषायाम् |
|
8.2.50 |
निर्वाणोऽवाते |
|
8.2.51 |
शुषः कः |
|
8.2.52 |
पचो वः |
|
8.2.53 |
क्षायो मः |
|
8.2.54 |
प्रस्त्योऽन्यतरस्याम् |
|
8.2.55 |
अनुपसर्गात् फुल्लक्षीबकृशोल्लाघाः |
|
8.2.56 |
नुदविदोन्दत्राघ्राह्रीभ्योऽन्यतरस्याम् |
|
8.2.57 |
न ध्याख्यापॄमूर्छिमदाम् |
|
8.2.58 |
वित्तो भोगप्रत्यययोः |
|
8.2.59 |
भित्तं शकलम् |
|
8.2.60 |
ऋणमाधमर्ण्ये |
|
8.2.61 |
नसत्तनिषत्तानुत्तप्रतूर्तसूर्तगूर्तानि छन्दसि |
|
8.2.62 |
क्विन्प्रत्ययस्य कुः |
|
8.2.63 |
नशेर्वा |
|
8.2.64 |
मो नो धातोः |
|
8.2.65 |
म्वोश्च |
|
8.2.66 |
ससजुषो रुः |
|
8.2.67 |
अवयाःश्वेतवाःपुरोडाश्च |
|
8.2.68 |
अहन् |
|
8.2.69 |
रोऽसुपि |
|
8.2.70 |
अम्नरूधरवरित्युभयथा छन्दसि |
|
8.2.71 |
भुवश्च महाव्याहृतेः |
|
8.2.72 |
वसुस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः |
|
8.2.73 |
तिप्यनस्तेः |
|
8.2.74 |
सिपि धातो रुर्वा |
|
8.2.75 |
दश्च |
|
8.2.76 |
र्वोरुपधाया दीर्घ इकः |
|
8.2.77 |
हलि च |
|
8.2.78 |
उपधायां च |
|
8.2.79 |
न भकुर्छुराम् |
|
8.2.80 |
अदसोऽसेर्दादु दो मः |
|
8.2.81 |
एत ईद्बहुवचने |
|
8.2.82 |
वाक्यस्य टेः प्लुत उदात्तः |
|
8.2.83 |
प्रत्यभिवादेअशूद्रे |
|
8.2.84 |
दूराद्धूते च |
|
8.2.85 |
हैहेप्रयोगे हैहयोः |
|
8.2.86 |
गुरोरनृतोऽनन्त्यस्याप्येकैकस्य प्राचाम् |
|
8.2.87 |
ओमभ्यादाने |
|
8.2.88 |
ये यज्ञकर्मणि |
|
8.2.89 |
प्रणवष्टेः |
|
8.2.90 |
याज्याऽन्तः |
|
8.2.91 |
ब्रूहिप्रेसष्यश्रौषड्वौषडावहानामादेः |
|
8.2.92 |
अग्नीत्प्रेषणे परस्य च |
|
8.2.93 |
विभाषा पृष्टप्रतिवचने हेः |
|
8.2.94 |
निगृह्यानुयोगे च |
|
8.2.95 |
आम्रेडितं भर्त्सने |
|
8.2.96 |
अङ्गयुक्तं तिङ् आकाङ्क्षम् |
|
8.2.97 |
विचार्यमाणानाम् |
|
8.2.98 |
पूर्वं तु भाषायाम् |
|
8.2.99 |
प्रतिश्रवणे च |
|
8.2.100 |
अनुदात्तं प्रश्नान्ताभिपूजितयोः |
|
8.2.101 |
चिदिति चोपमाऽर्थे प्रयुज्यमाने |
|
8.2.102 |
उपरिस्विदासीदिति च |
|
8.2.103 |
स्वरितमाम्रेडितेऽसूयासम्मतिकोपकुत्सनेषु |
|
8.2.104 |
क्षियाऽऽशीःप्रैषेषु तिङ् आकाङ्क्षम् |
|
8.2.105 |
अनन्त्यस्यापि प्रश्नाख्यानयोः |
|
8.2.106 |
प्लुतावैच इदुतौ |
|
8.2.107 |
एचोऽप्रगृह्यस्यादूराद्धूते पूर्वस्यार्धस्यादुत्तरस्येदुतौ |
|
8.2.108 |
तयोर्य्वावचि संहितायाम् |
|
8.3.1 |
मतुवसो रु सम्बुद्धौ छन्दसि |
|
8.3.2 |
अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा |
|
8.3.3 |
आतोऽटि नित्यम् |
|
8.3.4 |
अनुनासिकात् परोऽनुस्वारः |
|
8.3.5 |
समः सुटि |
|
8.3.6 |
पुमः खय्यम्परे |
|
8.3.7 |
नश्छव्यप्रशान् |
|
8.3.8 |
उभयथर्क्षु |
|
8.3.9 |
दीर्घादटि समानपदे |
|
8.3.10 |
नॄन् पे |
|
8.3.11 |
स्वतवान् पायौ |
|
8.3.12 |
कानाम्रेडिते |
|
8.3.13 |
ढो ढे लोपः |
|
8.3.14 |
रो रि |
|
8.3.15 |
खरवसानयोर्विसर्जनीयः |
|
8.3.16 |
रोः सुपि |
|
8.3.17 |
भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि |
|
8.3.18 |
व्योर्लघुप्रयत्नतरः शाकटायनस्य |
|
8.3.19 |
लोपः शाकल्यस्य |
|
8.3.20 |
ओतो गार्ग्यस्य |
|
8.3.21 |
उञि च पदे |
|
8.3.22 |
हलि सर्वेषाम् |
|
8.3.23 |
मोऽनुस्वारः |
|
8.3.24 |
नश्चापदान्तस्य झलि |
|
8.3.25 |
मो राजि समः क्वौ |
|
8.3.26 |
हे मपरे वा |
|
8.3.27 |
नपरे नः |
|
8.3.28 |
ङ्णोः कुक्टुक् शरि |
|
8.3.29 |
डः सि धुट् |
|
8.3.30 |
नश्च |
|
8.3.31 |
शि तुक् |
|
8.3.32 |
ङमो ह्रस्वादचि ङमुण्नित्यम् |
|
8.3.33 |
मय उञो वो वा |
|
8.3.34 |
विसर्जनीयस्य सः |
|
8.3.35 |
शर्परे विसर्जनीयः |
|
8.3.36 |
वा शरि |
|
8.3.37 |
कुप्वोः XकXपौ च |
|
8.3.38 |
सोऽपदादौ |
|
8.3.39 |
इणः षः |
|
8.3.40 |
नमस्पुरसोर्गत्योः |
|
8.3.41 |
इदुदुपधस्य चाप्रत्ययस्य |
|
8.3.42 |
तिरसोऽन्यतरस्याम् |
|
8.3.43 |
द्विस्त्रिश्चतुरिति कृत्वोऽर्थे |
|
8.3.44 |
इसुसोः सामर्थ्ये |
|
8.3.45 |
नित्यं समासेऽनुत्तरपदस्थस्य |
|
8.3.46 |
अतः कृकमिकंसकुम्भपात्रकुशाकर्णीष्वनव्ययस्य |
|
8.3.47 |
अधःशिरसी पदे |
|
8.3.48 |
कस्कादिषु च |
|
8.3.49 |
छन्दसि वाऽप्राम्रेडितयोः |
|
8.3.50 |
कःकरत्करतिकृधिकृतेष्वनदितेः |
|
8.3.51 |
पञ्चम्याः परावध्यर्थे |
|
8.3.52 |
पातौ च बहुलम् |
|
8.3.53 |
षष्ठ्याः पतिपुत्रपृष्ठपारपदपयस्पोषेषु |
|
8.3.54 |
इडाया वा |
|
8.3.55 |
अपदान्तस्य मूर्धन्यः |
|
8.3.56 |
सहेः साडः सः |
|
8.3.57 |
इण्कोः |
|
8.3.58 |
नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि |
|
8.3.59 |
आदेशप्रत्यययोः |
|
8.3.60 |
शासिवसिघसीनां च |
|
8.3.61 |
स्तौतिण्योरेव षण्यभ्यासात् |
|
8.3.62 |
सः स्विदिस्वदिसहीनां च |
|
8.3.63 |
प्राक्सितादड्व्यवायेऽपि |
|
8.3.64 |
स्थाऽऽदिष्वभ्यासेन चाभ्यासस्य |
|
8.3.65 |
उपसर्गात् सुनोतिसुवतिस्यतिस्तौतिस्तोभतिस्थासेनयसेधसिचसञ्जस्वञ्जाम् |
|
8.3.66 |
सदिरप्रतेः |
|
8.3.67 |
स्तन्भेः |
|
8.3.68 |
अवाच्चालम्बनाविदूर्ययोः |
|
8.3.69 |
वेश्च स्वनो भोजने |
|
8.3.70 |
परिनिविभ्यः सेवसितसयसिवुसहसुट्स्तुस्वञ्जाम् |
|
8.3.71 |
सिवादीनां वाऽड्व्यवायेऽपि |
|
8.3.72 |
अनुविपर्यभिनिभ्यः स्यन्दतेरप्राणिषु |
|
8.3.73 |
वेः स्कन्देरनिष्ठायाम् |
|
8.3.74 |
परेश्च |
|
8.3.75 |
परिस्कन्दः प्राच्यभरतेषु |
|
8.3.76 |
स्फुरतिस्फुलत्योर्निर्निविभ्यः |
|
8.3.77 |
वेः स्कभ्नातेर्नित्यम् |
|
8.3.78 |
इणः षीध्वंलुङ्लिटां धोऽङ्गात् |
|
8.3.79 |
विभाषेटः |
|
8.3.80 |
समासेऽङ्गुलेः सङ्गः |
|
8.3.81 |
भीरोः स्थानम् |
|
8.3.82 |
अग्नेः स्तुत्स्तोमसोमाः |
|
8.3.83 |
ज्योतिरायुषः स्तोमः |
|
8.3.84 |
मातृपितृभ्यां स्वसा |
|
8.3.85 |
मातुःपितुर्भ्यामन्यतरस्याम् |
|
8.3.86 |
अभिनिसः स्तनः शब्दसंज्ञायाम् |
|
8.3.87 |
उपसर्गप्रादुर्भ्यामस्तिर्यच्परः |
|
8.3.88 |
सुविनिर्दुर्भ्यः सुपिसूतिसमाः |
|
8.3.89 |
निनदीभ्यां स्नातेः कौशले |
|
8.3.90 |
सूत्रं प्रतिष्णातम् |
|
8.3.91 |
कपिष्ठलो गोत्रे |
|
8.3.92 |
प्रष्ठोऽग्रगामिनि |
|
8.3.93 |
वृक्षासनयोर्विष्टरः |
|
8.3.94 |
छन्दोनाम्नि च |
|
8.3.95 |
गवियुधिभ्यां स्थिरः |
|
8.3.96 |
विकुशमिपरिभ्यः स्थलम् |
|
8.3.97 |
अम्बाम्बगोभूमिसव्यापद्वित्रिकुशेकुशङ्क्वङ्गुमञ्जिपुञ्जिपरमेबर्हिर्दिव्यग्निभ्यः स्थः |
|
8.3.98 |
सुषामादिषु च |
|
8.3.99 |
एति संज्ञायामगात् |
|
8.3.100 |
नक्षत्राद्वा |
|
8.3.101 |
ह्रस्वात् तादौ तद्धिते |
|
8.3.102 |
निसस्तपतावनासेवने |
|
8.3.103 |
युष्मत्तत्ततक्षुःष्वन्तःपादम् |
|
8.3.104 |
यजुष्येकेषाम् |
|
8.3.105 |
स्तुतस्तोमयोश्छन्दसि |
|
8.3.106 |
पूर्वपदात् |
|
8.3.107 |
सुञः |
|
8.3.108 |
सनोतेरनः |
|
8.3.109 |
सहेः पृतनर्ताभ्यां च |
|
8.3.110 |
न रपरसृपिसृजिस्पृशिस्पृहिसवनादीनाम् |
|
8.3.111 |
सात्पदाद्योः |
|
8.3.112 |
सिचो यङि |
|
8.3.113 |
सेधतेर्गतौ |
|
8.3.114 |
प्रतिस्तब्धनिस्तब्धौ च |
|
8.3.115 |
सोढः |
|
8.3.116 |
स्तम्भुसिवुसहां चङि |
|
8.3.117 |
सुनोतेः स्यसनोः |
|
8.3.118 |
सदिष्वञ्जोः परस्य लिटि |
|
8.3.119 |
निव्यभिभ्योऽड्व्यवाये वा छन्दसि |
|
8.4.1 |
रषाभ्यां नो णः समानपदे |
|
8.4.2 |
अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि |
|
8.4.3 |
पूर्वपदात् संज्ञायामगः |
|
8.4.4 |
वनं पुरगामिश्रकासिध्रकाशारिकाकोटराऽग्रेभ्यः |
|
8.4.5 |
प्रनिरन्तःशरेक्षुप्लक्षाम्रकार्ष्यखदिरपियूक्षाभ्योऽसंज्ञायामपि |
|
8.4.6 |
विभाषौषधिवनस्पतिभ्यः |
|
8.4.7 |
अह्नोऽदन्तात् |
|
8.4.8 |
वाहनमाहितात् |
|
8.4.9 |
पानं देशे |
|
8.4.10 |
वा भावकरणयोः |
|
8.4.11 |
प्रातिपदिकान्तनुम्विभक्तिषु च |
|
8.4.12 |
एकाजुत्तरपदे णः |
|
8.4.13 |
कुमति च |
|
8.4.14 |
उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य |
|
8.4.15 |
हिनुमीना |
|
8.4.16 |
आनि लोट् |
|
8.4.17 |
नेर्गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु च |
|
8.4.18 |
शेषे विभाषाऽकखादावषान्त उपदेशे |
|
8.4.19 |
अनितेः |
|
8.4.20 |
अन्तः |
|
8.4.21 |
उभौ साभ्यासस्य |
|
8.4.22 |
हन्तेरत्पूर्वस्य |
|
8.4.23 |
वमोर्वा |
|
8.4.24 |
अन्तरदेशे |
|
8.4.25 |
अयनं च |
|
8.4.26 |
छन्दस्यृदवग्रहात् |
|
8.4.27 |
नश्च धातुस्थोरुषुभ्यः |
|
8.4.28 |
उपसर्गाद् बहुलम् |
|
8.4.29 |
कृत्यचः |
|
8.4.30 |
णेर्विभाषा |
|
8.4.31 |
हलश्च इजुपधात् |
|
8.4.32 |
इजादेः सनुमः |
|
8.4.33 |
वा निंसनिक्षनिन्दाम् |
|
8.4.34 |
न भाभूपूकमिगमिप्यायीवेपाम् |
|
8.4.35 |
षात् पदान्तात् |
|
8.4.36 |
नशेः षान्तस्य |
|
8.4.37 |
पदान्तस्य |
|
8.4.38 |
पदव्यवायेऽपि |
|
8.4.39 |
क्षुभ्नाऽऽदिषु च |
|
8.4.40 |
स्तोः श्चुना श्चुः |
|
8.4.41 |
ष्टुना ष्टुः |
|
8.4.42 |
न पदान्ताट्टोरनाम् |
|
8.4.43 |
तोः षि |
|
8.4.44 |
शात् |
|
8.4.45 |
यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा |
|
8.4.46 |
अचो रहाभ्यां द्वे |
|
8.4.47 |
अनचि च |
|
8.4.48 |
नादिन्याक्रोशे पुत्रस्य |
|
8.4.49 |
शरोऽचि |
|
8.4.50 |
त्रिप्रभृतिषु शाकटायनस्य |
|
8.4.51 |
सर्वत्र शाकल्यस्य |
|
8.4.52 |
दीर्घादाचार्याणाम् |
|
8.4.53 |
झलां जश् झशि |
|
8.4.54 |
अभ्यासे चर्च्च |
|
8.4.55 |
खरि च |
|
8.4.56 |
वाऽवसाने |
|
8.4.57 |
अणोऽप्रगृह्यस्यानुनासिकः |
|
8.4.58 |
अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः |
|
8.4.59 |
वा पदान्तस्य |
|
8.4.60 |
तोर्लि |
|
8.4.61 |
उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य |
|
8.4.62 |
झयो होऽन्यतरस्याम् |
|
8.4.63 |
शश्छोऽटि |
|
8.4.64 |
हलो यमां यमि लोपः |
|
8.4.65 |
झरो झरि सवर्णे |
|
8.4.66 |
उदात्तादनुदात्तस्य स्वरितः |
|
8.4.67 |
नोदात्तस्वरितोदयमगार्ग्यकाश्यपगालवानाम् |
|
8.4.68 |
अ अ इति |
|
9.1.1 |
वलादिरवशादिरिट्प्रत्ययः
|
9.1.2 |
धात्वादेः ष्तोः स्तुः |
|