1.1 |
भू सत्तायाम् । उदात्तः परस्मैभाषः ॥
|
1.2 |
एध वृद्धौ ॥
|
1.3 |
स्पर्ध सङ्घर्षे ॥
|
1.4 |
गाधृ प्रतिष्ठालिप्सयोर्ग्रन्थे च ॥
|
1.5 |
बाधृ लोडने विलोडने ॥
|
1.6 |
नाधृऽ ॥
|
1.7 |
नाथृ याच्ञोपतापैश्वर्याशीष्षु ॥
|
1.8 |
दध धारणे ॥
|
1.9 |
स्कुदि आप्रवणे ॥
|
1.10 |
श्विदि श्वैत्ये ॥
|
1.11 |
वदि अभिवादनस्तुत्योः ॥
|
1.12 |
भदि कल्याणे सुखे च ॥
|
1.13 |
मदि स्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु ॥
|
1.14 |
स्पदि किञ्चिच्चलने ॥
|
1.15 |
क्लिदि परिदेवने ॥
|
1.16 |
मुद हर्षे ॥
|
1.17 |
दद दाने ॥
|
1.18 |
ष्वदऽ ॥
|
1.19 |
स्वर्द आस्वादने ॥
|
1.20 |
उर्द माने क्रीडायां च ॥
|
1.21 |
कुर्दऽ ॥
|
1.22 |
खुर्दऽ ॥
|
1.23 |
गुर्दऽ गुडक्रीडायामेव ॥
|
1.24 |
गुद क्रीडायामेव ॥
|
1.25 |
षूद क्षरणे ॥
|
1.26 |
ह्राद अव्यक्ते शब्दे ॥
|
1.27 |
ह्लादी सुखे च ॥
|
1.28 |
स्वाद आस्वादने ॥
|
1.29 |
पर्द कुत्सिते शब्दे ॥
|
1.30 |
यती प्रयत्ने ॥
|
1.31 |
युतृऽ ॥
|
1.32 |
जुतृ भासने ॥
|
1.33 |
विथृऽ ॥
|
1.34 |
वेथृ याचने ॥
|
1.35 |
श्रथि शैथिल्ये ॥
|
1.36 |
ग्रथि कौटिल्ये ॥
|
1.37 |
कत्थ श्लाघायाम् ॥
|
1.38 |
अत सातत्यगमने ॥
|
1.39 |
चिती सञ्ज्ञाने ॥
|
1.40 |
च्युतिर् आसेचने ॥
|
1.41 |
श्चुतिर् इत्येके ॥
|
1.42 |
श्च्युतिर् क्षरणे ॥
|
1.43 |
ज्युतिर् भासने ॥
|
1.44 |
मन्थ विलोडने ॥
|
1.45 |
कुथिऽ ॥
|
1.46 |
पुथिऽ ॥
|
1.47 |
लुथिऽ ॥
|
1.48 |
मथि हिंसासङ्क्लेशनयोः ॥
|
1.49 |
षिध गत्याम् ॥
|
1.50 |
षिधू शास्त्रे माङ्गल्ये च ॥
|
1.51 |
खादृ भक्षणे ॥
|
1.52 |
खद स्थैर्ये हिंसायां च ॥
|
1.53 |
बद स्थैर्ये ॥
|
1.54 |
गद व्यक्तायां वाचि ॥
|
1.55 |
रद विलेखने ॥
|
1.56 |
णद अव्यक्ते शब्दे ॥
|
1.57 |
अर्द गतौ याचने च ॥
|
1.58 |
नर्दऽ ॥
|
1.59 |
गर्द शब्दे ॥
|
1.60 |
तर्द हिंसायाम् ॥
|
1.61 |
कर्द कुत्सिते शब्दे ॥
|
1.62 |
खर्द दन्दशूके ॥
|
1.63 |
अतिऽ ॥
|
1.64 |
अदि बन्धने ॥
|
1.65 |
इदि परमैश्वर्ये ॥
|
1.66 |
बिदि अवयवे ॥
|
1.67 |
भिदि इत्येके ॥
|
1.68 |
गडि वदनैकदेशे ॥
|
1.69 |
णिदि कुत्सायाम् ॥
|
1.70 |
टुनदि समृद्धौ ॥
|
1.71 |
चदि आह्लादे दीप्तौ च ॥
|
1.72 |
त्रदि चेष्टायाम् ॥
|
1.73 |
कदिऽ ॥
|
1.74 |
क्रदिऽ ॥
|
1.75 |
क्लदि आह्वाने रोदने च ॥
|
1.76 |
क्लिदि परिदेवने ॥
|
1.77 |
शुन्ध शुद्धौ ॥
|
1.78 |
शीकृ सेचने ॥
|
1.79 |
सीकृ इत्येके ॥
|
1.80 |
लोकृ दर्शने ॥
|
1.81 |
श्लोकृ सङ्घाते ॥
|
1.82 |
स्रोकृ इति पाठान्तरम् ॥
|
1.83 |
द्रेकृऽ ॥
|
1.84 |
ध्रेकृ शब्दोत्साहयोः ॥
|
1.85 |
रेकृ शङ्कायाम् ॥
|
1.86 |
सेकृऽ ॥
|
1.87 |
स्रेकृऽ ॥
|
1.88 |
स्रकिऽ ॥
|
1.89 |
श्रकिऽ ॥
|
1.90 |
श्लकि गतौ गत्यर्थाः ॥
|
1.91 |
शकि शङ्कायाम् ॥
|
1.92 |
अकि लक्षणे ॥
|
1.93 |
वकि कौटिल्ये ॥
|
1.94 |
मकि मण्डने ॥
|
1.95 |
कक लौल्ये ॥
|
1.96 |
कुकऽ ॥
|
1.97 |
वृक आदाने ॥
|
1.98 |
चक तृप्तौ प्रतिघाते च ॥
|
1.99 |
ककिऽ ॥
|
1.100 |
वकिऽ ॥
|
1.101 |
श्वकिऽ ॥
|
1.102 |
त्रकिऽ ॥
|
1.103 |
ढौकृऽ ॥
|
1.104 |
त्रौकृऽ ॥
|
1.105 |
ष्वस्कऽ ष्वष्कऽ ॥
|
1.106 |
वस्कऽ वष्कऽ ॥
|
1.107 |
मस्कऽ मष्क ॥
|
1.108 |
टिकृऽ ॥
|
1.109 |
टीकृऽ ॥
|
1.110 |
तिकृऽ ॥
|
1.111 |
तीकृऽ ॥
|
1.112 |
रघिऽ ॥
|
1.113 |
लघि गत्यर्थाः ॥
|
1.114 |
ष्वकि इत्येके तृतीयो दन्त्यादिरित्येके । लघि भोजननिवृत्तावपि ॥
|
1.115 |
अघिऽ ॥
|
1.116 |
वघिऽ ॥
|
1.117 |
मघि गत्याक्षेपे । गतौ गत्यारम्भे चेत्यपरे । मघि कैतवे च ॥
|
1.118 |
राघृऽ ॥
|
1.119 |
लाघृऽ ॥
|
1.120 |
द्राघृ सामर्थ्ये ॥
|
1.121 |
ध्राघृ इत्यपि केचित् । द्राघृ आयामे च ॥
|
1.122 |
श्लाघृ कत्थने । इति शीकादय उदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
1.123 |
फक्क निचैर्गतौ ॥
|
1.124 |
तक हसने ॥
|
1.125 |
तकि कृच्छ्रजीवने ॥
|
1.126 |
बुक्क भषणे ॥
|
1.127 |
शुक गतौ ॥
|
1.128 |
कख हसने ॥
|
1.129 |
ओखृऽ ॥
|
1.130 |
राखृऽ ॥
|
1.131 |
लाखृऽ ॥
|
1.132 |
द्राखृऽ ॥
|
1.133 |
ध्राखृ शोषणालमर्थयोः ॥
|
1.134 |
शाखृऽ ॥
|
1.135 |
श्लाखृ व्याप्तौ ॥
|
1.136 |
उखऽ ॥
|
1.137 |
उखिऽ ॥
|
1.138 |
वखऽ ॥
|
1.139 |
वखिऽ ॥
|
1.140 |
मखऽ ॥
|
1.141 |
मखिऽ ॥
|
1.142 |
णखऽ ॥
|
1.143 |
णखिऽ ॥
|
1.144 |
रखऽ ॥
|
1.145 |
रखिऽ ॥
|
1.146 |
लखऽ ॥
|
1.147 |
लखिऽ ॥
|
1.148 |
इखऽ ॥
|
1.149 |
इखिऽ ॥
|
1.150 |
ईखऽ ॥
|
1.151 |
ईखिऽ ॥
|
1.152 |
वल्गऽ ॥
|
1.153 |
रगिऽ ॥
|
1.154 |
लगिऽ ॥
|
1.155 |
अगिऽ ॥
|
1.156 |
वगिऽ ॥
|
1.157 |
मगिऽ ॥
|
1.158 |
तगिऽ ॥
|
1.159 |
त्वगिऽ ॥
|
1.160 |
त्रगिऽ ॥
|
1.161 |
श्रगिऽ श्वगिऽ ष्वगिऽ ॥
|
1.162 |
श्लगिऽ ॥
|
1.163 |
इगिऽ ॥
|
1.164 |
रिगिऽ ॥
|
1.165 |
लिगि गत्यर्थाः ॥
|
1.166 |
मुखिऽ ॥
|
1.167 |
थकिऽ ॥
|
1.168 |
रिखऽ ॥
|
1.169 |
रिखिऽ ॥
|
1.170 |
लिखऽ ॥
|
1.171 |
लिखिऽ ॥
|
1.172 |
त्रखऽ ॥
|
1.173 |
त्रिखिऽ ॥
|
1.174 |
शिखि इत्यपि केचित् । त्वगि कम्पने च ॥
|
1.175 |
युगिऽ ॥
|
1.176 |
जुगिऽ ॥
|
1.177 |
बुगि वर्जने ॥
|
1.178 |
वुगि इत्येके ॥
|
1.179 |
घघ हसने ॥
|
1.180 |
घग्घ इत्येके ॥
|
1.181 |
दघि पालने ॥
|
1.182 |
लघि शोषणे भाषायां दीप्तौ सीमातिक्रमे च ॥
|
1.183 |
मघि मण्डने ॥
|
1.184 |
शिघि आघ्राणे ॥
|
1.185 |
अर्घ मूल्ये । इति फक्कादय उदात्ता उदात्तेतः ॥
|
1.186 |
वर्च दीप्तौ ॥
|
1.187 |
षच सेचने सेवने च ॥
|
1.188 |
लोचृ दर्शने ॥
|
1.189 |
शच व्यक्तायां वाचि ॥
|
1.190 |
श्वचऽ ॥
|
1.191 |
श्वचि गतौ ॥
|
1.192 |
कच बन्धने ॥
|
1.193 |
कचिऽ ॥
|
1.194 |
काचि दीप्तिबन्धनयोः ॥
|
1.195 |
मचऽ ॥
|
1.196 |
मुचि कल्कने । कथन इत्यन्ये ॥
|
1.197 |
मचि धारणोच्छ्रायपूजनेषु ॥
|
1.198 |
पचि व्यक्तीकरणे ॥
|
1.199 |
ष्टुच प्रसादे ॥
|
1.200 |
ऋज गतिस्थानार्जनोपार्जनेषु ॥
|
1.201 |
ऋजिऽ ॥
|
1.202 |
भृजी भर्जने ॥
|
1.203 |
एजृऽ ॥
|
1.204 |
भ्रेजृऽ ॥
|
1.205 |
भ्राजृ दीप्तौ ॥
|
1.206 |
रेजृ दीप्तौ ॥
|
1.207 |
ईज गतिकुत्सनयोः ॥
|
1.208 |
ईजि इत्येके ॥
|
1.209 |
वीज गतौ । इति वर्चादय उदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
1.210 |
शुच शोके ॥
|
1.211 |
कुच शब्दे तारे ॥
|
1.212 |
कुञ्चऽ ॥
|
1.213 |
क्रुञ्च कौटिल्याल्पीभावयोः ॥
|
1.214 |
लुञ्च अपनयने ॥
|
1.215 |
अञ्चु गतिपूजनयोः ॥
|
1.216 |
वञ्चुऽ ॥
|
1.217 |
चञ्चुऽ ॥
|
1.218 |
तञ्चुऽ ॥
|
1.219 |
त्वञ्चुऽ ॥
|
1.220 |
म्रुञ्चुऽ ॥
|
1.221 |
म्लुञ्चुऽ ॥
|
1.222 |
म्रुचुऽ ॥
|
1.223 |
म्लुचु गत्यर्थाः ॥
|
1.224 |
ग्रुचुऽ ॥
|
1.225 |
ग्लुचुऽ ॥
|
1.226 |
कुजुऽ ॥
|
1.227 |
खुजु स्तेयकरणे ॥
|
1.228 |
ग्लुञ्चुऽ ॥
|
1.229 |
षस्ज षस्ज गतौ । षस्जिरात्मनेपद्यपि ॥
|
1.230 |
गुजऽ ॥
|
1.231 |
गुजि अव्यक्ते शब्दे ॥
|
1.232 |
अर्च पूजायाम् ॥
|
1.233 |
म्लेच्छ अव्यक्ते शब्दे ॥
|
1.234 |
लछऽ ॥
|
1.235 |
लाछि लक्षणे ॥
|
1.236 |
वाछि इच्छायाम् ॥
|
1.237 |
आछि आयामे ॥
|
1.238 |
ह्रीछ लज्जायाम् ॥
|
1.239 |
हुर्छा कौटिल्ये ॥
|
1.240 |
मुर्छा मोहसमुच्छ्राययोः । (मुर्च्छा ) ॥
|
1.241 |
स्फुर्छा विस्तृतौ ॥
|
1.242 |
युच्छ प्रमादे ॥
|
1.243 |
उछि उञ्छे ॥
|
1.244 |
उछी विवासे ॥
|
1.245 |
ध्रजऽ ॥
|
1.246 |
ध्रजिऽ ॥
|
1.247 |
व्रजऽ ॥
|
1.248 |
व्रजिऽ ॥
|
1.249 |
धृजऽ ॥
|
1.250 |
धृजिऽ ॥
|
1.251 |
ध्वजऽ ॥
|
1.252 |
ध्वजि गतौ ॥
|
1.253 |
ध्रिज च ॥
|
1.254 |
कूजऽ ॥
|
1.255 |
कूजि अव्यक्ते शब्दे ॥
|
1.256 |
अर्जऽ ॥
|
1.257 |
षर्ज अर्जने ॥
|
1.258 |
गर्ज शब्दे ॥
|
1.259 |
तर्ज भर्त्सने ॥
|
1.260 |
कर्ज व्यथने ॥
|
1.261 |
खर्ज पूजने च ॥
|
1.262 |
अज गतिक्षेपणयोः ॥
|
1.263 |
तेज पालने ॥
|
1.264 |
खज मन्थे ॥
|
1.265 |
कज मदे इत्येके ॥
|
1.266 |
खजि गतिवैकल्ये ॥
|
1.267 |
एजृ कम्पने ॥
|
1.268 |
टुओस्फूर्जा वज्रनिर्घोषे ॥
|
1.269 |
क्षि क्षये ॥
|
1.270 |
क्षीज अव्यक्ते शब्दे ॥
|
1.271 |
लजऽ ॥
|
1.272 |
लजि भर्जने ॥
|
1.273 |
लाजऽ ॥
|
1.274 |
लाजि भर्त्सने च ॥
|
1.275 |
जजऽ ॥
|
1.276 |
जजि युद्धे ॥
|
1.277 |
तुज हिंसायाम् ॥
|
1.278 |
तुजि पालने ॥
|
1.279 |
गजऽ ॥
|
1.280 |
गजिऽ ॥
|
1.281 |
गृजऽ ॥
|
1.282 |
गृजिऽ ॥
|
1.283 |
मुजऽ ॥
|
1.284 |
मुजि शब्दार्थाः । गज मदने च ॥
|
1.285 |
वजऽ ॥
|
1.286 |
व्रज गतौ । इति शुचादयः क्षिवर्जमुदात्ता उदात्तेतः ॥
|
1.287 |
अट्ट अतिक्रमणहिंसनयोः अतिक्रमहिंसयोः ॥
|
1.288 |
वेष्ट वेष्टने ॥
|
1.289 |
चेष्ट चेष्टायाम् ॥
|
1.290 |
गोष्टऽ ॥
|
1.291 |
लोष्ट सङ्घाते ॥
|
1.292 |
घट्ट चलने ॥
|
1.293 |
स्फुट विकसने ॥
|
1.294 |
अठि गतौ ॥
|
1.295 |
वठि एकचर्यायाम् ॥
|
1.296 |
मठिऽ ॥
|
1.297 |
कठि शोके ॥
|
1.298 |
मुठि पालने ॥
|
1.299 |
हेठ विबाधायाम् ॥
|
1.300 |
एठ च ॥
|
1.301 |
हिडि गत्यनादरयोः ॥
|
1.302 |
हुडि सङ्घाते ॥
|
1.303 |
कुडि दाहे ॥
|
1.304 |
वडि विभाजने ॥
|
1.305 |
मडि च ॥
|
1.306 |
भडि परिभाषणे ॥
|
1.307 |
पिडि सङ्घाते ॥
|
1.308 |
मुडि मार्जने ॥
|
1.309 |
तुडि तोडने ॥
|
1.310 |
हुडि वरणे । हरण इत्येके ॥
|
1.311 |
स्फुडि विकसने ॥
|
1.312 |
चडि कोपे ॥
|
1.313 |
शडि रुजायां सङ्घाते च ॥
|
1.314 |
तडि ताडने ॥
|
1.315 |
पडि गतौ ॥
|
1.316 |
कडि मदे ॥
|
1.317 |
खडि मन्थे ॥
|
1.318 |
हेडृऽ ॥
|
1.319 |
होडृ अनादरे ॥
|
1.320 |
बाडृ आप्लाव्ये ॥
|
1.321 |
वाडृ इत्येके ॥
|
1.322 |
द्राडृऽ ॥
|
1.323 |
ध्राडृ विशरणे ॥
|
1.324 |
शाडृ श्लाघायाम् । इत्यट्टादय उदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
1.325 |
शौटृ गर्वे ॥
|
1.326 |
यौटृ बन्धे ॥
|
1.327 |
म्रेटृऽ ॥
|
1.328 |
म्रेडृ उन्मादे ॥
|
1.329 |
म्लेटृ इत्येके ॥
|
1.330 |
कटे वर्षावरणयोः ॥
|
1.331 |
चटे इत्येके ॥
|
1.332 |
अटऽ ॥
|
1.333 |
पट गतौ ॥
|
1.334 |
रट परिभाषणे ॥
|
1.335 |
लट बाल्ये ॥
|
1.336 |
शट रुजाविशरणगत्यवसादनेषु ॥
|
1.337 |
वट वेष्टने ॥
|
1.338 |
किटऽ ॥
|
1.339 |
खिट त्रासे ॥
|
1.340 |
शिटऽ ॥
|
1.341 |
षिट अनादरे ॥
|
1.342 |
जटऽ ॥
|
1.343 |
झट सङ्घाते ॥
|
1.344 |
भट भृतौ ॥
|
1.345 |
तट उच्छ्राये ॥
|
1.346 |
खट काङ्क्षायाम् ॥
|
1.347 |
णट नट नृत्तौ ॥
|
1.348 |
पिट शब्दसङ्घातयोः ॥
|
1.349 |
हट दीप्तौ च ॥
|
1.350 |
षट अवयवे ॥
|
1.351 |
लुट विलोडने ॥
|
1.352 |
लुड इत्येके, डान्तोऽयमित्येके ॥
|
1.353 |
चिट परप्रैष्ये, परप्रेष्ये ॥
|
1.354 |
विट शब्दे ॥
|
1.355 |
बिट आक्रोशे ॥
|
1.356 |
हिट इत्येके ॥
|
1.357 |
इट इत्येके ॥
|
1.358 |
किट इत्येके ॥
|
1.359 |
कटी गतौ ॥
|
1.360 |
हेठ विबाधायाम् ॥
|
1.361 |
मडि भूषायाम् ॥
|
1.362 |
कुडि वैकल्ये ॥
|
1.363 |
कुटि इत्येके ॥
|
1.364 |
मुड इत्येके ॥
|
1.365 |
प्रुड मर्दने, प्रमर्दने ॥
|
1.366 |
मुट इत्येके ॥
|
1.367 |
पुट इत्येके ॥
|
1.368 |
चुडि अल्पीभावे ॥
|
1.369 |
मुडि खण्डने ॥
|
1.370 |
पुडि चेत्येके ॥
|
1.371 |
रुटि इत्येके ॥
|
1.372 |
लुटि स्तेये ॥
|
1.373 |
रुठि इत्येके ॥
|
1.374 |
लुठि इत्येके ॥
|
1.375 |
रुडि इत्येके ॥
|
1.376 |
लुडि इत्येके ॥
|
1.377 |
वटि विभाजने ॥
|
1.378 |
बटि इत्येके ॥
|
1.379 |
स्फुटि विशरणे, इत्येके ॥
|
1.380 |
स्फुटि इत्येके ॥
|
1.381 |
पठ व्यक्तायां वाचि ॥
|
1.382 |
वठ स्थौल्ये ॥
|
1.383 |
बठ इत्येके ॥
|
1.384 |
मठ मदनिवासयोः ॥
|
1.385 |
कठ कृच्छ्रजीवने ॥
|
1.386 |
रठ परिभाषणे ॥
|
1.387 |
रट इत्येके ॥
|
1.388 |
हठ प्लुतिशठत्वयोः, बलात्कार इत्यन्ये ॥
|
1.389 |
रुठ इत्येके ॥
|
1.390 |
लुठ इत्येके ॥
|
1.391 |
ऊठ उपघाते ॥
|
1.392 |
उठ इत्येके ॥
|
1.393 |
पिठ हिंसासङ्क्लेशनयोः ॥
|
1.394 |
शठ कैतवे च ॥
|
1.395 |
शुठ गतिप्रतिघाते, प्रतिघाते, इत्येके ॥
|
1.396 |
शुठि इत्येके ॥
|
1.397 |
कुठि च ॥
|
1.398 |
लुठि आलस्ये प्रतिघाते च ॥
|
1.399 |
शुठि शोषणे ॥
|
1.400 |
रुठि इत्येके ॥
|
1.401 |
लुठि गतौ ॥
|
1.402 |
चुड्ड चुद्ड, भावकरणे ॥
|
1.403 |
अड्ड अद्ड, अभियोगे ॥
|
1.404 |
कड्ड कद्ड, कार्कश्ये, चुड्डादयस्त्रयो दोपधाः ॥
|
1.405 |
क्रीडृ विहारे ॥
|
1.406 |
तुडृ तोडने ॥
|
1.407 |
तूडृ इत्येके ॥
|
1.408 |
हुडृ इत्येके ॥
|
1.409 |
हूडृ इत्येके ॥
|
1.410 |
होडृ गतौ ॥
|
1.411 |
रौडृ अनादरे ॥
|
1.412 |
रोडृ इत्येके ॥
|
1.413 |
लोडृ उन्मादे ॥
|
1.414 |
अड उद्यमे ॥
|
1.415 |
लड विलासे ॥
|
1.416 |
लल इत्येके, ईप्सायाम् ॥
|
1.417 |
कड मदे ॥
|
1.418 |
कडि इत्येके ॥
|
1.419 |
गडि वदनैकदेशे, इति शौट्रादय उदात्ता उदात्तेतः ॥
|
1.420 |
तिपृ इत्येके ॥
|
1.421 |
तेपृ इत्येके ॥
|
1.422 |
ष्टिपृ क्षरणार्थाः, आद्योऽनुदात्तः ॥
|
1.423 |
ष्टेपृ कम्पने च ॥
|
1.424 |
ग्लेपृ दैन्ये ॥
|
1.425 |
टुवेपृ कम्पने ॥
|
1.426 |
केपृ इत्येके ॥
|
1.427 |
गेपृ इत्येके ॥
|
1.428 |
ग्लेपृ च ॥
|
1.429 |
मेपृ इत्येके ॥
|
1.430 |
रेपृ इत्येके ॥
|
1.431 |
लेपृ गतौ ॥
|
1.432 |
हेपृ इत्येके ॥
|
1.433 |
धेपृ च ॥
|
1.434 |
त्रपूष् लज्जायाम् ॥
|
1.435 |
कपि चलने ॥
|
1.436 |
रबि इत्येके ॥
|
1.437 |
लबि इत्येके ॥
|
1.438 |
अबि शब्दे ॥
|
1.439 |
लबि अवस्रंसने च ॥
|
1.440 |
कबृ वर्णे ॥
|
1.441 |
क्लीबृ अधार्ष्ट्ये ॥
|
1.442 |
क्षीबृ मदे ॥
|
1.443 |
क्षीवृ इत्येके ॥
|
1.444 |
शीभृ कत्थने ॥
|
1.445 |
बीभृ इत्येके ॥
|
1.446 |
चीभृ च ॥
|
1.447 |
रेभृ शब्दे ॥
|
1.448 |
अभि इत्येके ॥
|
1.449 |
रभि क्वचित्पठ्येते इत्येके ॥
|
1.450 |
लभि च ॥
|
1.451 |
ष्टभि ॥
|
1.452 |
स्कभि प्रतिबन्धे ॥
|
1.453 |
जभी इत्येके ॥
|
1.454 |
जृभि गात्रविनामे ॥
|
1.455 |
शल्भ कत्थने ॥
|
1.456 |
वल्भ भोजने ॥
|
1.457 |
गल्भ धार्ष्ट्ये (Some have typo as धाष्टर्ये) ॥
|
1.458 |
श्रम्भु प्रमादे ॥
|
1.459 |
स्रम्भु इत्येके, दन्त्यादिश्च ॥
|
1.460 |
ष्टुभु स्तम्भे, इति तिपादयस्तिपिवर्जमुदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
1.461 |
गुपू रक्षणे ॥
|
1.462 |
धूप सन्तापे ॥
|
1.463 |
जप इत्येके ॥
|
1.464 |
जल्प व्यक्तायां वाचि, जप मानसे च ॥
|
1.465 |
चप सान्त्वने ॥
|
1.466 |
षप समवाये ॥
|
1.467 |
रप इत्येके ॥
|
1.468 |
लप व्यक्तायां वाचि ॥
|
1.469 |
चुप मन्दायां गतौ ॥
|
1.470 |
तुप इत्येके ॥
|
1.471 |
तुम्प इत्येके ॥
|
1.472 |
त्रुप इत्येके ॥
|
1.473 |
त्रुम्प इत्येके ॥
|
1.474 |
तुफ इत्येके ॥
|
1.475 |
तुम्फ इत्येके ॥
|
1.476 |
त्रुफ इत्येके ॥
|
1.477 |
त्रुम्फ हिंसार्थाः ॥
|
1.478 |
पर्प इत्येके ॥
|
1.479 |
रफ इत्येके ॥
|
1.480 |
रफि इत्येके ॥
|
1.481 |
अर्ब इत्येके ॥
|
1.482 |
पर्ब इत्येके ॥
|
1.483 |
लर्ब इत्येके ॥
|
1.484 |
बर्ब इत्येके ॥
|
1.485 |
मर्ब इत्येके ॥
|
1.486 |
कर्ब इत्येके ॥
|
1.487 |
खर्ब इत्येके ॥
|
1.488 |
गर्ब इत्येके ॥
|
1.489 |
शर्ब इत्येके ॥
|
1.490 |
षर्ब इत्येके ॥
|
1.491 |
चर्ब गतौ, अदने च ॥
|
1.492 |
कुबि आच्छादने, छादने ॥
|
1.493 |
लुबि इत्येके ॥
|
1.494 |
तुबि अर्दने ॥
|
1.495 |
चुबि वक्त्रसंयोगे ॥
|
1.496 |
षृभु इत्येके ॥
|
1.497 |
षृम्भु हिंसार्थौ ॥
|
1.498 |
षिभु इत्येके ॥
|
1.499 |
षिम्भु इत्येके ॥
|
1.500 |
शुभ इत्येके ॥
|
1.501 |
शुम्भ भाषने, भासन इत्येके ॥
|
1.502 |
घिणि इत्येके ॥
|
1.503 |
घुणि ग्रहणे ॥
|
1.504 |
घृणि ग्रहणे ॥
|
1.505 |
घुण घूर्ण भ्रमणे ॥
|
1.506 |
घूर्ण भ्रमणे ॥
|
1.507 |
पण व्यवहारे, स्तुतौ च ॥
|
1.508 |
पन च ॥
|
1.509 |
भाम क्रोधे ॥
|
1.510 |
क्षमूष् सहने ॥
|
1.511 |
कमु कान्तौ, इति घिण्यादय उदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
1.512 |
अण इत्येके ॥
|
1.513 |
रण इत्येके ॥
|
1.514 |
वण इत्येके ॥
|
1.515 |
भण इत्येके ॥
|
1.516 |
मण इत्येके ॥
|
1.517 |
कण इत्येके ॥
|
1.518 |
क्वण इत्येके ॥
|
1.519 |
व्रण ब्रण, भ्रण ॥
|
1.520 |
ध्वण शब्दार्थाः ॥
|
1.521 |
धण इत्यपि केचित् ॥
|
1.522 |
ओणृ अपनयने ॥
|
1.523 |
शोणृ वर्णगत्योः ॥
|
1.524 |
श्रोणृ सङ्घाते ॥
|
1.525 |
श्लोणृ च ॥
|
1.526 |
पैणृ गतिप्रेरणश्लेषणेषु ॥
|
1.527 |
प्रैणृ इत्यपि ॥
|
1.528 |
ध्रण शब्दे ॥
|
1.529 |
बण इत्यपि केचित् ॥
|
1.530 |
कनी दीप्तिकान्तिगतिषु ॥
|
1.531 |
ष्टन इत्येके ॥
|
1.532 |
वन शब्दे ॥
|
1.533 |
वन इत्येके ॥
|
1.534 |
षण सम्भक्तौ ॥
|
1.535 |
अम गत्यादिषु, गतौ शब्दे, सम्भक्तौ च ॥
|
1.536 |
द्रम इत्येके ॥
|
1.537 |
हम्म इत्येके ॥
|
1.538 |
मीमृ गतौ, मीमृ शब्दे च ॥
|
1.539 |
चमुऽ इत्येके ॥
|
1.540 |
छमुऽ इत्येके ॥
|
1.541 |
जमुऽ इत्येके ॥
|
1.542 |
झमु अदने ॥
|
1.543 |
जिमु इति केचित् ॥
|
1.544 |
क्रमु पादविक्षेपे, इत्यणादय उदात्ता उदात्तेतः ॥
|
1.545 |
अय इत्येके ॥
|
1.546 |
वय इत्येके ॥
|
1.547 |
पय इत्येके ॥
|
1.548 |
मय इत्येके ॥
|
1.549 |
चय इत्येके ॥
|
1.550 |
तय इत्येके ॥
|
1.551 |
णय गतौ, रक्षणे च ॥
|
1.552 |
दय दानगतिरक्षणहिंसादानेषु ॥
|
1.553 |
रय गतौ ॥
|
1.554 |
लय च ॥
|
1.555 |
ऊयी तन्तुसन्ताने ॥
|
1.556 |
पूयी विशरणे, दुर्गन्धे च ॥
|
1.557 |
क्नूयी शब्दे, उन्दे च ॥
|
1.558 |
क्ष्मायी विधूनने ॥
|
1.559 |
स्फायी इत्येके ॥
|
1.560 |
ओप्यायी वृद्धौ ॥
|
1.561 |
तायृ सन्तानपालनयोः ॥
|
1.562 |
शल चलनसंवरणयोः ॥
|
1.563 |
वल संवरणे, सञ्चलने च ॥
|
1.564 |
वल्ल इत्येके ॥
|
1.565 |
मल धारणे ॥
|
1.566 |
मल्ल धारणे ॥
|
1.567 |
भल परिभाषणहिंसादानेषु ॥
|
1.568 |
भल्ल परिभाषणहिंसादानेषु ॥
|
1.569 |
कल शब्दसङ्ख्यानयोः ॥
|
1.570 |
कल्ल अव्यक्ते शब्दे, अशब्द इत्येके ॥
|
1.571 |
तेवृ देवने ॥
|
1.572 |
देवृ देवने ॥
|
1.573 |
षेवृ इत्येके ॥
|
1.574 |
गेवृ इत्येके ॥
|
1.575 |
ग्लेवृ इत्येके ॥
|
1.576 |
पेवृ इत्येके ॥
|
1.577 |
मेवृ इत्येके ॥
|
1.578 |
म्लेवृ सेवने ॥
|
1.579 |
शेवृ इत्येके ॥
|
1.580 |
खेवृ इत्येके ॥
|
1.581 |
प्लेवृ इत्येके ॥
|
1.582 |
केवृ इत्येके ॥
|
1.583 |
रेवृ प्लवगतौ, इत्ययादय उदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
1.584 |
मव्य बन्धने ॥
|
1.585 |
षूर्क्ष्य इत्येके ॥
|
1.586 |
सूर्क्ष्य इत्येके ॥
|
1.587 |
ईर्क्ष्य इत्येके ॥
|
1.588 |
ईर्ष्य ईर्ष्यार्थाः ॥
|
1.589 |
हय गतौ ॥
|
1.590 |
शुच्य अभिषवे ॥
|
1.591 |
चुच्य इत्येके ॥
|
1.592 |
हर्य गतिकान्त्योः ॥
|
1.593 |
अल भूषणपर्याप्तिवारणेषु, अयं स्वरितेदित्येके ॥
|
1.594 |
ञिफला विशरणे ॥
|
1.595 |
मील इत्येके ॥
|
1.596 |
श्मील इत्येके ॥
|
1.597 |
स्मील इत्येके ॥
|
1.598 |
क्ष्मील निमेषणे ॥
|
1.599 |
पील प्रतिष्टम्भे ॥
|
1.600 |
णील वर्णे ॥
|
1.601 |
शील समाधौ ॥
|
1.602 |
कील बन्धने ॥
|
1.603 |
कूल आवरणे ॥
|
1.604 |
शूल रुजायां सङ्घाते च ॥
|
1.605 |
तूल निष्कर्षे ॥
|
1.606 |
पूल सङ्घाते ॥
|
1.607 |
मूल प्रतिष्ठायाम् ॥
|
1.608 |
फल निष्पत्तौ ॥
|
1.609 |
चुल्ल भावकरणे ॥
|
1.610 |
फुल्ल विकसने ॥
|
1.611 |
चिल्ल शैथिल्ये भावकरणे च ॥
|
1.612 |
तिल गतौ ॥
|
1.613 |
तिल्ल इत्येके ॥
|
1.614 |
वेलृऽ ॥
|
1.615 |
चेलृऽ ॥
|
1.616 |
केलृऽ ॥
|
1.617 |
खेलृऽ ॥
|
1.618 |
क्ष्वेलृऽ ॥
|
1.619 |
वेल्ल चलने ॥
|
1.620 |
वेह्ल इत्येके ॥
|
1.621 |
पेलृऽ पल्लऽ ॥
|
1.622 |
फेलृऽ ॥
|
1.623 |
शेलृ गतौ ॥
|
1.624 |
षेलृ इत्येके ॥
|
1.625 |
स्खल सञ्चलने ॥
|
1.626 |
खल सञ्चये च ॥
|
1.627 |
गल अदने भक्षणे स्रावे च ॥
|
1.628 |
षल गतौ ॥
|
1.629 |
दल विशरणे ॥
|
1.630 |
श्वलऽ ॥
|
1.631 |
श्वल्ल आशुगमने ॥
|
1.632 |
खोलृऽ ॥
|
1.633 |
खोरृ गतिप्रतिघाते ॥
|
1.634 |
धोरृ गतिचातुर्ये ॥
|
1.635 |
त्सर छद्मगतौ ॥
|
1.636 |
क्मर हूर्छने ॥
|
1.637 |
अभ्रऽ ॥
|
1.638 |
वभ्रऽ बभ्रऽ ॥
|
1.639 |
मभ्रऽ ॥
|
1.640 |
चर गत्यर्थाः । चरतिर्भक्षणर्थोऽपि चर भक्षणे च चरतिर्भक्षणेऽपि ॥
|
1.641 |
ष्ठिवु निरसने ॥
|
1.642 |
जि जये ॥
|
1.643 |
जीव प्राणधारणे ॥
|
1.644 |
पीवऽ ॥
|
1.645 |
मीवऽ ॥
|
1.646 |
तीवऽ ॥
|
1.647 |
णीव स्थौल्ये ॥
|
1.648 |
क्षिवुऽ ॥
|
1.649 |
क्षेवु निरसने ॥
|
1.650 |
उर्वीऽ ॥
|
1.651 |
तुर्वीऽ ॥
|
1.652 |
थुर्वीऽ ॥
|
1.653 |
दुर्वीऽ ॥
|
1.654 |
धुर्वी हिंसार्थाः ॥
|
1.655 |
गुर्वी उद्यमने ॥
|
1.656 |
मुर्वी बन्धने ॥
|
1.657 |
पुर्वऽ पूर्वऽ ॥
|
1.658 |
पर्वऽ ॥
|
1.659 |
मर्व पूरणे ॥
|
1.660 |
चर्व अदने ॥
|
1.661 |
भर्वऽ हिंसायाम् ॥
|
1.662 |
भर्ब इत्येके ॥
|
1.663 |
भर्भ इत्यन्ये ॥
|
1.664 |
कर्वऽ ॥
|
1.665 |
खर्वऽ ॥
|
1.666 |
गर्व दर्पे ॥
|
1.667 |
अर्वऽ ॥
|
1.668 |
शर्वऽ ॥
|
1.669 |
षर्व हिंसायाम् ॥
|
1.670 |
इवि व्याप्तौ ॥
|
1.671 |
पिविऽ ॥
|
1.672 |
मिविऽ ॥
|
1.673 |
णिवि सेचने । सेचने चेत्येके ॥
|
1.674 |
षिवि इत्येके । सेवन इति तरङ्गिण्याम् ॥
|
1.675 |
हिविऽ ॥
|
1.676 |
दिविऽ ॥
|
1.677 |
धिविऽ ॥
|
1.678 |
जिवि प्रीणनार्थाः ॥
|
1.679 |
रिविऽ ॥
|
1.680 |
रविऽ ॥
|
1.681 |
धवि गत्यर्थाः ॥
|
1.682 |
कृवि हिंसाकरणयोश्च ॥
|
1.683 |
मव बन्धने ॥
|
1.684 |
अव रक्षणगतिकान्तिप्रीतितृप्त्यवगमप्रवेशऽ श्रवणस्वाम्यर्थयाचनक्रियेच्छादीप्त्यवाप्त्यालिङ्गनहिंसादानभागवृद्धिषु ॥
|
1.685 |
धावु गतिशुद्ध्योः । उदात्तः स्वरितेत् ॥ अथोष्मान्ताः ॥
|
1.686 |
धुक्षऽ ॥
|
1.687 |
धिक्ष सन्दीपनक्लेशनजीवनेषु ॥
|
1.688 |
वृक्ष वरणे ॥
|
1.689 |
शिक्ष विद्योपादाने ॥
|
1.690 |
भिक्ष भिक्षायामलाभे लाभे च ॥
|
1.691 |
क्लेश अव्यक्तायां वाचि । बाधन इत्यन्ये इति दुर्गः ॥
|
1.692 |
दक्ष वृद्धौ शीघ्रार्थे च ॥
|
1.693 |
दीक्ष मौण्ड्येज्योपनयननियमव्रतादेशेषु ॥
|
1.694 |
ईक्ष दर्शने ॥
|
1.695 |
ईष गतिहिंसादर्शनेषु ॥
|
1.696 |
भाष व्यक्तायां वाचि ॥
|
1.697 |
वर्ष स्नेहने ॥
|
1.698 |
गेषृ अन्विच्छायाम् ॥
|
1.699 |
ग्लेषृ इत्येके ॥
|
1.700 |
पेषृ प्रयत्ने ॥
|
1.701 |
एषृ इत्येके ॥
|
1.702 |
येषृ इत्यन्ये ॥
|
1.703 |
जेषृऽ ॥
|
1.704 |
णेषृऽ ॥
|
1.705 |
एषृऽ ॥
|
1.706 |
प्रेषृ गतौ ॥
|
1.707 |
रेषृऽ ॥
|
1.708 |
हेषृऽ ॥
|
1.709 |
ह्रेषृ अव्यक्ते शब्दे ॥
|
1.710 |
कासृ शब्दकुत्सायाम् ॥
|
1.711 |
भासृ दीप्तौ ॥
|
1.712 |
णासृऽ ॥
|
1.713 |
रासृ शब्दे ॥
|
1.714 |
णस कौटिल्ये ॥
|
1.715 |
भ्यस भये ॥
|
1.716 |
आङः शसि इच्छायाम् ॥
|
1.717 |
ग्रसुऽ ॥
|
1.718 |
ग्लसु अदने ॥
|
1.719 |
ईह चेष्टायाम् ॥
|
1.720 |
बहिऽ ॥
|
1.721 |
महि वृद्धौ ॥
|
1.722 |
अहि गतौ ॥
|
1.723 |
गर्हऽ ॥
|
1.724 |
गल्ह कुत्सायाम् ॥
|
1.725 |
बर्हऽ ॥
|
1.726 |
बल्ह प्राधान्ये ॥
|
1.727 |
वर्हऽ ॥
|
1.728 |
वल्ह परिभाषणहिंसाच्छादनेषु ॥
|
1.729 |
प्लिह गतौ ॥
|
1.730 |
वेहृऽ बेहृऽ ॥
|
1.731 |
जेहृऽ ॥
|
1.732 |
बाहृऽ वाहृ प्रयत्ने । जेहृ गतावपि ॥
|
1.733 |
द्राहृ निद्राक्षये । निक्षेप इत्येके ॥
|
1.734 |
काशृ दीप्तौ ॥
|
1.735 |
ऊह वितर्के ॥
|
1.736 |
गाहू विलोडने ॥
|
1.737 |
गृहू ग्रहणे ॥
|
1.738 |
ग्लह च अपादाने ॥
|
1.739 |
घुषि कान्तिकरणे ॥
|
1.740 |
घष इति केचित् । इति धुक्षादय उदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
1.741 |
घुषिर् अविशब्दने । शब्द इत्यन्ये पेठुः ॥
|
1.742 |
अक्षू व्याप्तौ ॥
|
1.743 |
तक्षूऽ ॥
|
1.744 |
त्वक्षू तनूकरणे ॥
|
1.745 |
उक्ष सेचने ॥
|
1.746 |
रक्ष पालने ॥
|
1.747 |
णिक्ष चुम्बने ॥
|
1.748 |
त्रक्षऽ ॥
|
1.749 |
ष्ट्रक्षऽ ॥
|
1.750 |
तृक्षऽ ॥
|
1.751 |
ष्टृक्षऽ ॥
|
1.752 |
णक्ष गतौ ॥
|
1.753 |
वक्ष रोषे । सङ्घात इत्येके ॥
|
1.754 |
मृक्ष सङ्घाते ॥
|
1.755 |
म्रक्ष इत्येके ॥
|
1.756 |
तक्ष त्वचने ॥
|
1.757 |
पक्ष परिग्रह इत्येके ॥
|
1.758 |
सूर्क्ष आदरे ॥
|
1.759 |
षर्क्ष इति केचित् ॥
|
1.760 |
काक्षिऽ ॥
|
1.761 |
वाक्षिऽ ॥
|
1.762 |
माक्षि काङ्क्षायाम् ॥
|
1.763 |
द्राक्षिऽ ॥
|
1.764 |
ध्राक्षिऽ ॥
|
1.765 |
ध्वाक्षि घोरवासिते च ॥
|
1.766 |
ध्माक्षि इत्येके ॥
|
1.767 |
चूष पाने ॥
|
1.768 |
तूष तुष्टौ ॥
|
1.769 |
पूष वृद्धौ ॥
|
1.770 |
मूष स्तेये ॥
|
1.771 |
लूषऽ ॥
|
1.772 |
रूष भूषायाम् ॥
|
1.773 |
शूष प्रसवे ॥
|
1.774 |
सूष इत्येके ॥
|
1.775 |
यूष हिंसायाम् ॥
|
1.776 |
जूष च ॥
|
1.777 |
भूषऽ ॥
|
1.778 |
तसि अलङ्कारे ॥
|
1.779 |
ऊष रुजायाम् ॥
|
1.780 |
ईष उञ्छे ॥
|
1.781 |
कषऽ ॥
|
1.782 |
खषऽ ॥
|
1.783 |
शिषऽ ॥
|
1.784 |
जषऽ ॥
|
1.785 |
झषऽ ॥
|
1.786 |
शषऽ ॥
|
1.787 |
वषऽ ॥
|
1.788 |
मषऽ ॥
|
1.789 |
रुषऽ ॥
|
1.790 |
रिष हिंसार्थाः ॥
|
1.791 |
भष भर्त्सने ॥
|
1.792 |
उष दाहे ॥
|
1.793 |
जिषुऽ ॥
|
1.794 |
विषुऽ ॥
|
1.795 |
मिषुऽ ॥
|
1.796 |
णिषु सेचने ॥
|
1.797 |
पुष पुष्टौ ॥
|
1.798 |
श्रिषुऽ ॥
|
1.799 |
श्लिषुऽ ॥
|
1.800 |
प्रुषुऽ ॥
|
1.801 |
प्लुषु दाहे ॥
|
1.802 |
पृषुऽ ॥
|
1.803 |
वृषुऽ ॥
|
1.804 |
मृषु सेचने। मृषु सहने च। इतरौ हिंसासङ्क्लेशनयोश्च ॥
|
1.805 |
घृषु सङ्घर्षे ॥
|
1.806 |
हृषु अलीके ॥
|
1.807 |
तुसऽ ॥
|
1.808 |
ह्रसऽ हृसऽ ॥
|
1.809 |
ह्लसऽ ॥
|
1.810 |
रस शब्दे ॥
|
1.811 |
लस श्लेषणक्रीडनयोः च ॥
|
1.812 |
घसॢ अदने ॥
|
1.813 |
जर्त्सऽ जर्जऽ जर्चऽ ॥
|
1.814 |
चर्चऽ ॥
|
1.815 |
झर्त्स झर्झ झर्ज परिभाषणहिंसातर्जनेषु ॥
|
1.816 |
पिसृऽ ॥
|
1.817 |
पेसृऽ ॥
|
1.818 |
विसऽ ॥
|
1.819 |
वेसऽ ॥
|
1.820 |
बिसऽ ॥
|
1.821 |
बेस गतौ ॥
|
1.822 |
हसे हसने ॥
|
1.823 |
णिश समाधौ ॥
|
1.824 |
मिशऽ ॥
|
1.825 |
मश शब्दे ॥
|
1.826 |
शव गतौ ॥
|
1.827 |
शश प्लुतगतौ ॥
|
1.828 |
शसु हिंसायाम् ॥
|
1.829 |
शंसु स्तुतौ। दुर्गतावपीत्येके इति दुर्गः ॥
|
1.830 |
चह परिकल्कने ॥
|
1.831 |
मह पूजायाम् ॥
|
1.832 |
रह त्यागे ॥
|
1.833 |
रहि गतौ ॥
|
1.834 |
दृहऽ ॥
|
1.835 |
दृहिऽ ॥
|
1.836 |
बृहऽ वृहऽ ॥
|
1.837 |
बृहि वृहि वृद्धौ। बृहि वृहि शब्दे च। बृहिर् वृहिर् इत्येके ॥
|
1.838 |
तुहिर्ऽ ॥
|
1.839 |
दुहिर्ऽ ॥
|
1.840 |
उहिर् अर्दने ॥
|
1.841 |
अर्ह पूजायाम्। इति घुषिरादय उदात्ता उदात्तेतः॥ अथ द्युतादयः ॥
|
1.842 |
द्युत दीप्तौ ॥
|
1.843 |
श्विता वर्णे ॥
|
1.844 |
ञिमिदा स्नेहने ॥
|
1.845 |
ञिष्विदा स्नेहनमोचनयोः गात्रप्रस्रवणे। स्नेहनमोहनयोरित्येके ॥
|
1.846 |
ञिक्ष्विदा चेत्येके ॥
|
1.847 |
रुच दीप्तावभिप्रीतौ च ॥
|
1.848 |
घुट परिवर्तने ॥
|
1.849 |
रुटऽ ॥
|
1.850 |
लुटऽ ॥
|
1.851 |
लुठ ॥
|
1.852 |
उठ उपघाते प्रतिघाते ॥
|
1.853 |
शुभ दीप्तौ ॥
|
1.854 |
क्षुभ सञ्चलने ॥
|
1.855 |
णभऽ ॥
|
1.856 |
तुभ हिंसायाम्। आद्योऽभावेऽपि ॥
|
1.857 |
स्रंसुऽ श्रंसुऽ श्रंशुऽ ॥
|
1.858 |
ध्वंसुऽ ॥
|
1.859 |
भ्रंसु अवस्रंसने। ध्वंसु गतौ च ॥
|
1.860 |
भ्रंशु इत्यपि केचित् तृतीय एव तालव्यान्त इत्यन्ये ॥
|
1.861 |
स्रम्भु विश्वासे ॥
|
1.862 |
वृतु वर्तने ॥
|
1.863 |
वृधु वृधौ ॥
|
1.864 |
शृधु शब्दकुत्सायाम् ॥
|
1.865 |
स्यन्दू प्रस्रवणे ॥
|
1.866 |
कृपू सामर्थ्ये। वृत्॥ इति द्युतादय उदात्ता अनुदात्तेतः॥ अथ घटादयो मितः ॥
|
1.867 |
घटम् चेष्टायाम् ॥
|
1.868 |
व्यथम् भयसञ्चलनयोः ॥
|
1.869 |
प्रथम् प्रख्याने ॥
|
1.870 |
प्रसम् विस्तारे ॥
|
1.871 |
म्रदम् मर्दने ॥
|
1.872 |
स्खदम् स्खदने ॥
|
1.873 |
क्षजिम् गतिदानयोः ॥
|
1.874 |
दक्षम् गतिहिंसनयोः गतिशासनयोः वृद्धौ शीघ्रार्थे च ॥
|
1.875 |
कृपम् कृपायां गतौ च ॥
|
1.876 |
क्रपम् इत्येके ॥
|
1.877 |
कपम् इत्यन्ये ॥
|
1.878 |
कदिम्ऽ ॥
|
1.879 |
क्रदिम्ऽ ॥
|
1.880 |
क्लदिम् वैक्लव्ये। वैकल्य इत्येके ॥
|
1.881 |
कदम्ऽ ॥
|
1.882 |
क्रदम्ऽ ॥
|
1.883 |
क्लदम् इत्यन्ये ॥
|
1.884 |
ञित्वराम् सम्भ्रमे। घटादयो मितः। इति घटादय उदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
1.885 |
ज्वरम् रोगे ॥
|
1.886 |
गडम् सेचने ॥
|
1.887 |
हेडम् वेष्टने ॥
|
1.888 |
वटम्ऽ ॥
|
1.889 |
भटम् परिभाषणे ॥
|
1.890 |
णटम् नृत्तौ। नतावित्येके। गतावित्यन्ये ॥
|
1.891 |
ष्टकम् प्रतिघाते प्रतीघाते ॥
|
1.892 |
चकम् तृप्तौ ॥
|
1.893 |
कखेम् हसने ॥
|
1.894 |
रगेम् शङ्कायाम् ॥
|
1.895 |
लगेम् सङ्गे ॥
|
1.896 |
ह्रगेम्ऽ ॥
|
1.897 |
ह्लगेम्ऽ ॥
|
1.898 |
षगेम्ऽ ॥
|
1.899 |
ष्ठगेम् संवरणे ॥
|
1.900 |
कगेम् नोच्यते। क्रियासामान्यार्थत्वात्। अनेकार्थत्वादित्यन्ये ॥
|
1.901 |
अकम्ऽ ॥
|
1.902 |
अगम् कुटिलायां गतौ ॥
|
1.903 |
कणम्ऽ ॥
|
1.904 |
रणम् गतौ ॥
|
1.905 |
चणम्ऽ ॥
|
1.906 |
शणम्ऽ ॥
|
1.907 |
श्रणम् दाने च । शणम् गतावित्यन्ये ॥
|
1.908 |
श्रथम्ऽ ॥
|
1.909 |
श्नथम्ऽ ॥
|
1.910 |
श्लथम्ऽ ॥
|
1.911 |
क्नथम्ऽ ॥
|
1.912 |
क्रथम्ऽ ॥
|
1.913 |
क्लथम् हिंसार्थाः ॥
|
1.914 |
चनम् च ॥
|
1.915 |
वनुम् च नोच्यते नोपलभ्यते ॥
|
1.916 |
ज्वलम् दीप्तौ ॥
|
1.917 |
ह्वलम्ऽ ॥
|
1.918 |
ह्मलम् सञ्चलने चलने ॥
|
1.919 |
स्मृम् आध्याने ॥
|
1.920 |
दृईम् भये ॥
|
1.921 |
नृईम् नये ॥
|
1.922 |
श्राम् पाके ॥
|
1.923 |
॥ मारणतोषणनिशामनेषु ज्ञाम् । मारणतोषणनिशानेष्विति पाठान्तरम् ॥
|
1.924 |
॥ कम्पने चलिः ॥
|
1.925 |
॥ छदिर् ऊर्जने ॥
|
1.926 |
॥ जिह्वोन्मथने लडिः ॥
|
1.927 |
॥ मदीम् हर्षग्लेपनयोः ॥
|
1.928 |
॥ ध्वनम् शब्दे ॥
|
1.929 |
॥ दलिऽ ॥
|
1.930 |
॥ वलिऽ ॥
|
1.931 |
॥ स्खलिऽ ॥
|
1.932 |
॥ रणिऽ ॥
|
1.933 |
॥ ध्वनिऽ ॥
|
1.934 |
॥ त्रपिऽ ॥
|
1.935 |
॥ क्षपयश्च इति भोजः ॥
|
1.936 |
॥ स्वनम् अवतंसने । घटादयो मितः ॥
|
1.937 |
॥ जनीऽ ॥
|
1.938 |
॥ जृईष्ऽ ॥
|
1.939 |
॥ क्नसुऽ ॥
|
1.940 |
॥ रञ्जोऽमन्ताश्च ॥
|
1.941 |
॥ ज्वलऽ ॥
|
1.942 |
॥ ह्वलऽ ॥
|
1.943 |
॥ ह्मलऽ ॥
|
1.944 |
॥ नमामनुपसर्गाद्वा ॥
|
1.945 |
॥ ग्लाऽ ॥
|
1.946 |
॥ स्नाऽ ॥
|
1.947 |
॥ वनुऽ ॥
|
1.948 |
॥ वमां च ॥
|
1.949 |
॥ न कमिऽ ॥
|
1.950 |
॥ अमिऽ ॥
|
1.951 |
॥ चमाम् ॥
|
1.952 |
॥ शमो दर्शने ॥
|
1.953 |
॥ यमोऽपरिवेषणे ॥
|
1.954 |
॥ स्खदिर् अवपरिभ्यां च ॥ अथ फणादयः ॥
|
1.955 |
फणम् गतौ गतिदीप्त्योः । वृत् । इति घटादयः फणान्ता मितः । इति ज्वरादय उदात्ता उदात्तेतः परस्मैभाषाः ॥
|
1.956 |
राजृ दीप्तौ । उदात्तः स्वरितेत् ॥
|
1.957 |
टुभ्राजृऽ ॥
|
1.958 |
टुभ्राशृऽ ॥
|
1.959 |
टुभ्लाशृ दीप्तौ । इत्युदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
1.960 |
स्यमुऽ ॥
|
1.961 |
स्वनऽ ॥
|
1.962 |
ध्वन शब्दे । फणादयो गताः ॥
|
1.963 |
षमऽ ॥
|
1.964 |
ष्टम अवैकल्ये वैकल्ये । वृत् । अथ ज्वलादयः ॥
|
1.965 |
ज्वल दीप्तौ ॥
|
1.966 |
चल कम्पने ॥
|
1.967 |
जल घातने ॥
|
1.968 |
टलऽ ॥
|
1.969 |
ट्वल वैकल्ये ॥
|
1.970 |
ष्ठल स्थाने ॥
|
1.971 |
हल विलेखने ॥
|
1.972 |
णल गन्धे । बन्धन इत्येके ॥
|
1.973 |
पल गतौ ॥
|
1.974 |
बल प्राणने धान्यावरोधे च धान्यावरोधने च ॥
|
1.975 |
पुल महत्त्वे ॥
|
1.976 |
कुल संस्त्याने बन्धुषु च ॥
|
1.977 |
शलऽ ॥
|
1.978 |
हुलऽ ॥
|
1.979 |
पतॢ गतौ ॥
|
1.980 |
हुल हिंसासंवरणयोश्च हिंसायां संवरणे च ॥
|
1.981 |
क्वथे निष्पाके ॥
|
1.982 |
पथे गतौ ॥
|
1.983 |
मथे विलोडने ॥
|
1.984 |
टुवम उद्गिरणे ॥
|
1.985 |
भ्रमु चलने ॥
|
1.986 |
क्षर सञ्चलने ॥
|
1.987 |
क्षुर सञ्चये । इति स्यमादय उदात्ता उदात्तेतः ॥
|
1.988 |
षह मर्षणे । उदात्तोऽनुदात्तेत् ॥
|
1.989 |
रमु क्रीडायाम् । रम इति माधवः । अनुदात्तोऽनुदात्तेत् ॥
|
1.990 |
षदॢ विशरणगत्यवसादनेषु ॥
|
1.991 |
शदॢ शातने ॥
|
1.992 |
क्रुश आह्वाने रोदने च । इति षदादयस्त्रयोऽनुदात्ता उदात्तेतः ॥
|
1.993 |
कुच सम्पर्चनकौटिल्यप्रतिष्टम्भविलेखनेषु ॥
|
1.994 |
बुध अवगमने ॥
|
1.995 |
रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च ॥
|
1.996 |
कस गतौ । इति कुचादय उदात्ता उदात्तेतो रुहिस्त्वनुदात्तः । वृत् । ज्वलादिर्गतः ॥
|
1.997 |
हिक्क अव्यक्ते शब्दे ॥
|
1.998 |
अञ्चु गतौ याचने च ॥
|
1.999 |
अचु इत्येके ॥
|
1.1000 |
अचि इत्येपरे ॥
|
1.1001 |
टुयाचृ याच्ञायाम् ॥
|
1.1002 |
रेटृ परिभाषणे ॥
|
1.1003 |
चतेऽ ॥
|
1.1004 |
चदे याचने च ॥
|
1.1005 |
प्रोथृ पर्याप्तौ ॥
|
1.1006 |
मिदृऽ ॥
|
1.1007 |
मेदृ मेधाहिंसनयोः ॥
|
1.1008 |
मिथृऽ ॥
|
1.1009 |
मेथृ इत्येके ॥
|
1.1010 |
मिधृ ॥
|
1.1011 |
मेधृ इत्यन्ये । मेधृ सङ्गमे च ॥
|
1.1012 |
णिदृऽ ॥
|
1.1013 |
णेदृ कुत्सासन्निकर्षयोः ॥
|
1.1014 |
शृधुऽ ॥
|
1.1015 |
मृधु उन्दने ॥
|
1.1016 |
बुधिर् बोधने ॥
|
1.1017 |
उबुन्दिर् निशामने ॥
|
1.1018 |
वेणृ गतिज्ञानचिन्तानिशामनवादित्रग्रहणेषु ॥
|
1.1019 |
वेनृ इत्येके ॥
|
1.1020 |
खनु अवदारणे ॥
|
1.1021 |
चीवृ आदानसंवरणयोः ॥
|
1.1022 |
चीबृ इत्येके ॥
|
1.1023 |
चायृ पूजानिशामनयोः ॥
|
1.1024 |
व्यय गतौ ॥
|
1.1025 |
दाशृ दाने ॥
|
1.1026 |
भेषृ भये । गतावित्येके ॥
|
1.1027 |
भ्रेषृऽ ॥
|
1.1028 |
भ्लेषृ गतौ ॥
|
1.1029 |
अस गतिदीप्त्यादानेषु ॥
|
1.1030 |
अष इत्येके ॥
|
1.1031 |
अय गतौ ॥
|
1.1032 |
स्पश बाधनस्पर्शनयोः ॥
|
1.1033 |
लष कान्तौ ॥
|
1.1034 |
चष भक्षणे ॥
|
1.1035 |
छष हिंसायाम् ॥
|
1.1036 |
झष आदानसंवरणयोः ॥
|
1.1037 |
भ्रक्षऽ ॥
|
1.1038 |
भ्लक्ष अदने ॥
|
1.1039 |
भक्ष इति मैत्रेयः ॥
|
1.1040 |
प्लक्ष च ॥
|
1.1041 |
दासृ दाने ॥
|
1.1042 |
माहृ माने ॥
|
1.1043 |
गुहू संवरणे । इति हिक्कादय उदात्ताः स्वरितेतः ॥ अथाजन्ताः ॥
|
1.1044 |
श्रिञ् सेवायाम् । उदात्त उभयतोभाषः ॥
|
1.1045 |
भृञ् भरणे ॥
|
1.1046 |
हृञ् हरणे ॥
|
1.1047 |
धृञ् धारणे ॥
|
1.1048 |
कृञ् करणे ॥
|
1.1049 |
णीञ् प्रापणे । इति भृञादयोऽनुदात्ता उभयतोभाषाः ॥
|
1.1050 |
धेट् पाने ॥
|
1.1051 |
ग्लैऽ ॥
|
1.1052 |
म्लै हर्षक्षये ॥
|
1.1053 |
द्यै न्यक्करणे ॥
|
1.1054 |
द्रै स्वप्ने ॥
|
1.1055 |
ध्रै तृप्तौ ॥
|
1.1056 |
ध्यै चिन्तायाम् ॥
|
1.1057 |
रै शब्दे ॥
|
1.1058 |
स्त्यैऽ ॥
|
1.1059 |
ष्ट्यै शब्दसङ्घातयोः ॥
|
1.1060 |
खै खदने ॥
|
1.1061 |
क्षैऽ ॥
|
1.1062 |
जैऽ ॥
|
1.1063 |
षै क्षये ॥
|
1.1064 |
कैऽ ॥
|
1.1065 |
गै शब्दे ॥
|
1.1066 |
शैऽ ॥
|
1.1067 |
श्रै पाके ॥
|
1.1068 |
स्रै इति केषुचित्पाठः ॥
|
1.1069 |
पैऽ ॥
|
1.1070 |
ओवै शोषणे ॥
|
1.1071 |
ष्टैऽ ॥
|
1.1072 |
ष्णै वेष्टने । शोभायां चेत्येके ॥
|
1.1073 |
दैप् शोधने ॥
|
1.1074 |
पा पाने ॥
|
1.1075 |
घ्रा गन्धोपादाने घ्राणे ॥
|
1.1076 |
ध्मा शब्दाग्निसंयोगयोः ॥
|
1.1077 |
ष्ठा गतिनिवृत्तौ ॥
|
1.1078 |
म्ना अभ्यासे ॥
|
1.1079 |
दाण् दाने ॥
|
1.1080 |
ह्वृ कौटिल्ये ॥
|
1.1081 |
स्वृ शब्दोपतापयोः ॥
|
1.1082 |
स्मृ चिन्तायाम् ॥
|
1.1083 |
द्वृ संवरणे वरणे ॥
|
1.1084 |
ह्वृ इत्येके ॥
|
1.1085 |
सृ गतौ ॥
|
1.1086 |
ऋ गतिप्रापणयोः ॥
|
1.1087 |
गृऽ ॥
|
1.1088 |
घृ सेचने ॥
|
1.1089 |
ध्वृ हूर्छने ॥
|
1.1090 |
स्रु गतौ ॥
|
1.1091 |
षु प्रसवसैश्वर्ययोः ॥
|
1.1092 |
श्रु श्रवणे ॥
|
1.1093 |
ध्रु स्थैर्ये ॥
|
1.1094 |
दुऽ ॥
|
1.1095 |
द्रु गतौ ॥
|
1.1096 |
जिऽ ॥
|
1.1097 |
ज्रि अभिभवे ॥
|
1.1098 |
जु इति सौत्रो धातुः गत्यर्थः । इति धयत्यादयोऽनुदात्ताः परस्मैभाषाः ॥
|
1.1099 |
ष्मिङ् ईषद्धसने ॥
|
1.1100 |
गुङ् अव्यक्ते शब्दे ॥
|
1.1101 |
गाङ् गतौ ॥
|
1.1102 |
उङ्ऽ ॥
|
1.1103 |
कुङ्ऽ ॥
|
1.1104 |
खुङ्ऽ ॥
|
1.1105 |
गुङ्ऽ ॥
|
1.1106 |
घुङ्ऽ ॥
|
1.1107 |
ङुङ् शब्दे ॥
|
1.1108 |
च्युङ्ऽ ॥
|
1.1109 |
ज्युङ्ऽ ॥
|
1.1110 |
जुङ्ऽ ॥
|
1.1111 |
प्रुङ्ऽ ॥
|
1.1111 |
रुङ् गतिरोषणयोः ॥
|
1.1111 |
धृङ् अवध्वंसने ॥
|
1.1111 |
श्यैङ् गतौ ॥
|
1.1112 |
प्लुङ् गतौ ॥
|
1.1112 |
मूङ् बन्धने ॥
|
1.1113 |
क्लुङ् इत्येके ॥
|
1.1113 |
गमॢऽ ॥
|
1.1114 |
त्यज हानौ ॥
|
1.1116 |
मेङ् प्रणिदाने ॥
|
1.1117 |
देङ् रक्षणे ॥
|
1.1119 |
प्यैङ् वृद्धौ ॥
|
1.1120 |
त्रैङ् पालने । इति ष्मिङ्प्रभृतयोऽनुदात्ता आत्मनेभाषाः ॥
|
1.1121 |
पूङ् पवने ॥
|
1.1123 |
डीङ् विहायसा गतौ । इति पूङादयस्त्रय उदात्ता आत्मनेभाषाः ॥
|
1.1124 |
तृई प्लवनतरणयोः । उदात्तः परस्मैभाषः ॥ अथ हलन्ताः ॥
|
1.1125 |
गुप गोपने ॥
|
1.1126 |
तिज निशाने ॥
|
1.1127 |
मान पूजायाम् ॥
|
1.1128 |
बध बन्धने । इति गुपादयश्चत्वार उदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
1.1129 |
रभ राभस्ये ॥
|
1.1130 |
डुलभष् प्राप्तौ ॥
|
1.1131 |
ष्वञ्ज परिष्वङ्गे ॥
|
1.1132 |
हद हद पुरीषोत्सर्गे । इति रभादयश्चत्वारोऽनुदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
1.1133 |
ञिक्ष्विदा अव्यक्ते शब्दे । उदात्त उदात्तेत् ॥
|
1.1134 |
स्कन्दिर् गतिशोषणयोः ॥
|
1.1135 |
यभ मैथुने विपरीतमैथुने ॥
|
1.1136 |
णम प्रह्वत्वे शब्दे च ॥
|
1.1138 |
सृपॢ गतौ ॥
|
1.1139 |
यम उपरमे ॥
|
1.1140 |
तप सन्तापे ॥
|
1.1142 |
षञ्ज सङ्गे ॥
|
1.1143 |
दृशिर् प्रेक्षणे ॥
|
1.1144 |
दंश दशने ॥
|
1.1145 |
कृष विलेखने ॥
|
1.1146 |
दह भस्मीकरणे ॥
|
1.1147 |
मिह सेचने । इति स्कन्दादयोऽनुदात्ता उदात्तेतः ॥
|
1.1148 |
कित निवासे रोगापनयने च । उदात्त उदात्तेत् ॥
|
1.1149 |
दान खण्डने अवखण्डने ॥
|
1.1150 |
शान तेजने अवतेजने । इत्युदात्तौ स्वरितेतौ ॥
|
1.1151 |
डुपचष् पाके ॥
|
1.1152 |
षच समवाये ॥
|
1.1153 |
भज सेवायाम् ॥
|
1.1154 |
रञ्ज रागे ॥
|
1.1155 |
शप आक्रोशे ॥
|
1.1156 |
त्विष दीप्तौ । अथ यजादयः ॥
|
1.1157 |
यज देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु ॥
|
1.1158 |
डुवप टुवप बीजसन्ताने । छेदनेऽपि ॥
|
1.1159 |
वह प्रापणे । इति पचादयोऽनुदात्ताः स्वरितेतः षचिस्तूदात्तः ॥
|
1.1160 |
वस निवासे । उदात्तेदनुदात्तः ॥
|
1.1161 |
वेञ् तन्तुसन्ताने ॥
|
1.1162 |
व्येञ् संवरणे ॥
|
1.1163 |
ह्वेञ् स्पर्धायां शब्दे च । इति वेञादयस्त्रयोऽनुदात्ता उभयतोभाषाः ॥
|
1.1164 |
वद व्यक्तायां वाचि ॥
|
1.1165 |
ट्वोश्वि गतिवृद्ध्योः । वृत् ॥
|
2.1 |
अद भक्षणे ॥
|
2.2 |
हन हिंसागत्योः । इत्यनुदात्तावुदात्तेतौ ॥
|
2.3 |
द्विष अप्रीतौ ॥
|
2.4 |
दुह प्रपूरणे ॥
|
2.5 |
दिह उपचये ॥
|
2.6 |
लिह आस्वादने । इति द्विषादयोऽनुदात्ताः स्वरितेतः ॥
|
2.7 |
चक्षिङ् व्यक्तायां वाचि । अयं दर्शनेऽपि । अनुदात्तोऽनुदात्तेत् ॥
|
2.8 |
ईर गतौ कम्पने च ॥
|
2.9 |
ईड स्तुतौ ॥
|
2.10 |
ईश ऐश्वर्ये ॥
|
2.11 |
आस उपवेशने ॥
|
2.12 |
आङः शासु इच्छायाम् ॥
|
2.13 |
वस आच्छादने ॥
|
2.14 |
कसि गतिशासनयोः ॥
|
2.15 |
कस इत्येके ॥
|
2.16 |
कश इत्यन्ये इत्यपि ॥
|
2.17 |
णिसि चुम्बने ॥
|
2.18 |
णिजि शुद्धौ ॥
|
2.19 |
शिजि अव्यक्ते शब्दे ॥
|
2.20 |
पिजि वर्णे । सम्पर्चन इत्येके । उभयन्नेत्यन्ये । अवयव इत्यपरे । अव्यक्ते शब्द इतीतरे ॥
|
2.21 |
पृजि इत्येके ॥
|
2.22 |
वृजी वर्जने ॥
|
2.23 |
वृजि इत्येके ॥
|
2.24 |
पृची सम्पर्चने सम्पर्के । इतीरादय उदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
2.25 |
षूङ् प्राणिगर्भविमोचने ॥
|
2.26 |
शीङ् स्वप्ने । इत्युदात्तावात्मनेभाषौ ॥
|
2.27 |
यु मिश्रेणेऽभिश्रणे च ॥
|
2.28 |
रु शब्दे ॥
|
2.29 |
तु तु गतिवृद्धिहिंसासु वृद्ध्यर्थः । इति सौत्रो धातुः ॥
|
2.30 |
णु स्तुतौ ॥
|
2.31 |
टुक्षु शब्दे ॥
|
2.32 |
क्ष्णु तेजने ॥
|
2.33 |
ष्णु प्रस्रवणे । इति युप्रभृतय उदात्ताः परस्मैभाषाः ॥
|
2.34 |
ऊर्णुञ् आच्छादने । उदात्त उभयतोभाषः ॥
|
2.35 |
द्यु अभिगमने ॥
|
2.36 |
षु प्रसवैश्वर्ययोः ॥
|
2.37 |
कु शब्दे ॥
|
2.38 |
ष्टुञ् स्तुतौ । इति द्युप्रभृतयोऽनुदात्ताः परस्मैभाषाः । स्तौतिस्तूभयतोभाषः ॥
|
2.39 |
ब्रूञ् ब्रूञ् व्यक्तायां वाचि । उदात्त उभयतोभाषः ॥
|
2.40 |
इण् गतौ ॥
|
2.41 |
इङ् अध्ययने । नित्यमधिपूर्वः ॥
|
2.42 |
इक् स्मरणे । अयमप्यधिपूर्वः ॥
|
2.43 |
वी गतिप्रजनकान्त्यसनखादनेषु ॥
|
2.44 |
या प्रापणे ॥
|
2.45 |
वा गतिगन्धनयोः ॥
|
2.46 |
भा दीप्तौ ॥
|
2.47 |
ष्णा शौचे ॥
|
2.48 |
श्रा पाके ॥
|
2.49 |
द्रा कुत्सायां गतौ ॥
|
2.50 |
प्सा भक्षणे ॥
|
2.51 |
पा रक्षणे ॥
|
2.52 |
रा दाने ॥
|
2.53 |
ला आदाने दाने । द्वावपि दान इति चन्द्रः ॥
|
2.54 |
दाप् लवने ॥
|
2.55 |
ख्या प्रकथने ॥
|
2.56 |
प्रा पूरणे ॥
|
2.57 |
मा माने ॥
|
2.58 |
वच परिभाषणे । इण्प्रभृतयोऽनुदात्ताः परस्मभाषाः । इङ् त्वात्मनेभाषः ॥
|
2.59 |
विद ज्ञाने ॥
|
2.60 |
अस भुवि ॥
|
2.61 |
मृजू मृजूष् शुद्धौ । अथ रुदादयः ॥
|
2.62 |
रुदिर् अश्रुविमोचने । इति विदादय उदात्ता उदात्तेतः ॥
|
2.63 |
ञिष्वप शये । इत्युदात्तेदनुदात्तः ॥
|
2.64 |
श्वस प्राणने ॥
|
2.65 |
अन च । अथ जक्षित्यादयः ॥
|
2.66 |
जक्ष भक्ष्यहसनयोः । वृत् । इति रुदादयः ॥
|
2.67 |
जागृ निद्राक्षये ॥
|
2.68 |
दरिद्रा दुर्गतौ ॥
|
2.69 |
चकासृ दीप्तौ ॥
|
2.70 |
शासु अनुशिष्टौ । इति श्वसादय उदात्ता उदात्तेतः ॥ अथ छान्दसा धातवः ॥
|
2.71 |
दीधीङ् दीप्तिदेवनयोः ॥
|
2.72 |
वेवीङ् वेतिना तुल्ये । इत्युदात्तावात्मनेभाषौ । वृत् । इति जक्षित्यादयः ॥
|
2.73 |
षसऽ ॥
|
2.74 |
षस्ति सस्ति स्वप्ने ॥
|
2.75 |
वश कान्तौ । इति षसादय उदात्ता उदात्तेतः । चर्करीतं च ॥
|
2.76 |
ह्नुङ् अपनयने । अनुदात्त आत्मनेभाषः ॥ वृत् ॥ इति लुग्विकरणा अदादयः ॥ २॥ अथ जुहोत्यादयः ॥
|
3.1 |
हु दानादनयोः । आदाने चेत्येके । प्रीणनेऽपीति भाष्यम् ॥
|
3.2 |
ञिभी भये ॥
|
3.3 |
ह्री लज्जायाम् । इति जुहोत्यादयोऽनुदात्ता परस्मैभाषाः ॥
|
3.4 |
पृई पालनपूरणयोः ॥
|
3.5 |
पृ इत्येके ह्रस्वान्तोऽयमित्येके । उदात्तः परस्मैभाषः ॥
|
3.6 |
डुभृञ् धारणपोषणयोः । अनुदात्त उभयतोभाषः ॥
|
3.7 |
माङ् माने शब्दे च ॥
|
3.8 |
ओहाङ् गतौ । इत्यनुदात्तावात्मनेभाषौ ॥
|
3.9 |
ओहाक् त्यागे । अनुदात्तः परस्मैभाषः ॥
|
3.10 |
डुदाञ् दाने ॥
|
3.11 |
डुधाञ् धारणपोषणयोः । दान इत्यप्येके । इत्यनुदात्तावुभयतोभाषौ ॥
|
3.12 |
णिजिर् शौचपोषणयोः ॥
|
3.13 |
विजिर् पृथग्भावे ॥
|
3.14 |
विषॢ व्याप्तौ । इति णिजिरादयोऽनुदात्ताः स्वरितेतः ॥ अथागणान्ता एकादश छान्दसाः ॥
|
3.15 |
घृ क्षरणदीप्त्योः ॥
|
3.16 |
हृ प्रसह्यकरणे ॥
|
3.17 |
ऋऽ ॥
|
3.18 |
सृ गतौ । घृप्रभृतयोऽनुदात्ताः परस्मैभाषाः ॥
|
3.19 |
भस भर्त्सनदीप्त्योः । उदात्त उदात्तेत् ॥
|
3.20 |
कि ज्ञाने । अनुदात्तः परस्मैभाषः ॥
|
3.21 |
कित च ॥
|
3.22 |
तुर त्वरणे ॥
|
3.23 |
धिष शब्दे ॥
|
3.24 |
धन धान्ये ॥
|
3.25 |
जन जनने । इति तुरादय उदात्ता उदात्तेतः ॥
|
3.26 |
गा स्तुतौ । अनुदात्तः परस्मैभाषः । छन्दसि । वृत् । घृप्रभृतय एकादश छन्दसि । इयति भाषायामपि ॥ वृत् ॥ इति श्लुविकरणा जुहोत्यादयः ॥ ३॥ अथ दिवादयः ॥
|
4.1 |
दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु ॥
|
4.2 |
षिवु तन्तुसन्ताने ॥
|
4.3 |
स्रिवु गतिशोषणयोः ॥
|
4.4 |
ष्ठिवु निरसने । केचिदिहेमं न पठन्ति ॥
|
4.5 |
ष्णुसु अदने । आदान इत्येके । अदर्शन इत्यपरे ॥
|
4.6 |
ष्णसु निरसने ॥
|
4.7 |
क्नसु ह्वरणदीप्त्योः ॥
|
4.8 |
व्युष दाहे ॥
|
4.9 |
प्लुष च ॥
|
4.10 |
नृती गात्रविक्षेपे ॥
|
4.11 |
त्रसी उद्वेगे ॥
|
4.12 |
कुथ पूतीभावे ॥
|
4.13 |
पुथ हिंसायाम् ॥
|
4.14 |
गुध परिवेष्टने ॥
|
4.15 |
क्षिप प्रेरणे । अनुदात्तः ॥
|
4.16 |
पुष्प विकसने ॥
|
4.17 |
तिमऽ ॥
|
4.18 |
तीमऽ ॥
|
4.19 |
ष्टिमऽ ॥
|
4.20 |
ष्टीम आर्द्रीभावे ॥
|
4.21 |
व्रीड चोदने लज्जायां च ॥
|
4.22 |
इष गतौ ॥
|
4.23 |
षहऽ ॥
|
4.24 |
षुह चक्यर्थे ॥
|
4.25 |
जृईष्ऽ ॥
|
4.26 |
झृईष् वयोहानौ । इति दिवादय उदात्ता उदात्तेतः ॥ अथ स्वादय ओदितः ॥
|
4.27 |
ओषूङ् प्राणिप्रसवे ॥
|
4.28 |
ओदूङ् परितापे । इत्युदात्तावात्मनेभाषौ ॥
|
4.29 |
ओदीङ् क्षये ॥
|
4.30 |
ओडीङ् विहायसा गतौ ॥
|
4.31 |
ओधीङ् आधारे ॥
|
4.32 |
ओमीङ् हिंसायाम् ॥
|
4.33 |
ओरीङ् श्रवणे ॥
|
4.34 |
ओलीङ् श्लेषणे ॥
|
4.35 |
ओव्रीङ् वृणोत्यर्थे । वृत् । स्वादय ओदितः ॥
|
4.36 |
पीङ् पाने ॥
|
4.37 |
माङ् माने ॥
|
4.38 |
ईङ् गतौ ॥
|
4.39 |
प्रीङ् प्रीतौ प्रीणने । इति दीङादय आत्मनेभाषा अनुदात्ताः । दीङ् तूदात्तः ॥
|
4.40 |
शो तनूकरणे ॥
|
4.41 |
छो छेदने ॥
|
4.42 |
षो अन्तकर्मणि ॥
|
4.43 |
दो अवखण्डने । इति श्यतिप्रभृतयोऽनुदात्ताः परस्मैभाषाः ॥
|
4.44 |
जनी प्रादुर्भावे ॥
|
4.45 |
दीपी दीप्तौ ॥
|
4.46 |
पूरी आप्यायने ॥
|
4.47 |
तूरी गतित्वरणहिंसनयोः ॥
|
4.48 |
धूरीऽ ॥
|
4.49 |
गूरी हिंसागत्योः ॥
|
4.50 |
घूरीऽ ॥
|
4.51 |
जूरी हिंसावयोहन्योः ॥
|
4.52 |
शूरी हिंसास्तम्भनयोः हिंसस्तम्भयोः ॥
|
4.53 |
चूरी दाहे ॥
|
4.54 |
तप ऐश्वेर्ये वा ॥
|
4.55 |
वृतु वरणे वर्तने ॥
|
4.56 |
वावृतु इति केचित् ॥
|
4.57 |
क्लिश उपतापे ॥
|
4.58 |
काशृ दीप्तौ ॥
|
4.59 |
वाशृ शब्दे । इति जन्यादय उदात्ता अनुदात्तेतः । तपिस्त्वनुदात्तः ॥
|
4.60 |
मृष तितिक्षायाम् ॥
|
4.61 |
ईशुचिर् पूतीभावे । इत्युदात्तौ स्वरितेतौ ॥
|
4.62 |
णह बन्धने ॥
|
4.63 |
रञ्ज रागे ॥
|
4.64 |
शप आक्रोशे । इति णहादयस्त्रयोऽनुदात्ताः स्वरितेतः ॥
|
4.65 |
पद गतौ ॥
|
4.66 |
खिद दैन्ये ॥
|
4.67 |
विद सत्तायाम् ॥
|
4.68 |
बुध अवगमने ॥
|
4.69 |
युध सम्प्रहारे ॥
|
4.70 |
अनोरुध कामे ॥
|
4.71 |
अण प्राणने ॥
|
4.72 |
अन इत्येके ॥
|
4.73 |
मन ज्ञाने ॥
|
4.74 |
युज समाधौ ॥
|
4.75 |
सृज विसर्गे ॥
|
4.76 |
लिश अल्पीभावे। इति पदादयोऽनुदात्ता अनुदात्तेतः। अण् तूदात्तः ॥
|
4.77 |
राधोऽकर्मकाद्वृद्धावेव ॥
|
4.78 |
व्यध ताडने। अथ पुषादयः ॥
|
4.79 |
पुष पुष्टौ ॥
|
4.80 |
शुष शोषणे ॥
|
4.81 |
तुष प्रीतौ ॥
|
4.82 |
दुष वैकृत्ये ॥
|
4.83 |
श्लिष आलिङ्गने ॥
|
4.84 |
शक विभाषितो मर्षणे। स्वरितेत् ॥
|
4.85 |
ष्विदा गात्रप्रक्षरणे। ञिष्विदा इत्येके ॥
|
4.86 |
क्रुध क्रोधे कोपे ॥
|
4.87 |
क्षुध बुभुक्षायाम् ॥
|
4.88 |
शुध शौचे ॥
|
4.89 |
षिधु संराद्धौ। इति राधादयोऽनुदात्ता उदात्तेतः। अथ रधादय वेटः ॥
|
4.90 |
रध हिंसासंराद्ध्योः ॥
|
4.91 |
णश अदर्शने ॥
|
4.92 |
तृप प्रीणने ॥
|
4.93 |
दृप हर्षमोहनयोः ॥
|
4.94 |
द्रुह जिघांसायाम् ॥
|
4.95 |
मुह वैचित्त्ये ॥
|
4.96 |
ष्णुह उद्गिरणे ॥
|
4.97 |
ष्णिह प्रीतौ। वृत्। इति रधादयो वेट अनुदात्ता उदात्तेतः। अथ शमादयः ॥
|
4.98 |
शमु उपशमे ॥
|
4.99 |
तमु काङ्क्षायाम् ॥
|
4.100 |
दमु उपशमे ॥
|
4.101 |
श्रमु तपसि खेदे च ॥
|
4.102 |
भ्रमु अनवस्थाने ॥
|
4.103 |
क्षमू सहने ॥
|
4.104 |
क्लमु ग्लानौ ॥
|
4.105 |
मदी हर्षे। वृत्। इत्यष्टौ शमादय उदात्ता उदात्तेतः। क्षमू तु वेट् ॥
|
4.106 |
असु क्षेपने ॥
|
4.107 |
यसु प्रयत्ने ॥
|
4.108 |
जसु मोक्षने ॥
|
4.109 |
तसु उपक्षये ॥
|
4.110 |
दसु च ॥
|
4.111 |
वसु स्तम्भे ॥
|
4.112 |
बसु इत्येके बादिरित्येके ॥
|
4.113 |
भसु इति केचित् ॥
|
4.114 |
व्युष विभागे ॥
|
4.116 |
ब्युस इत्यन्ये ओष्ठ्यादिर्दन्त्यन्तो ब्युस इत्यन्ये ॥
|
4.117 |
बुस इत्यपरे अयकार बुस इत्यपरे ॥
|
4.118 |
वुस इति केचित् ॥
|
4.119 |
प्युषऽ ॥
|
4.120 |
प्युषऽ ॥
|
4.121 |
पुष च ॥
|
4.122 |
प्लुष दाहे ॥
|
4.123 |
विस प्रेरणे ॥
|
4.124 |
बिस इत्येके ॥
|
4.125 |
कुस संश्लेषणे श्लेषणे ॥
|
4.126 |
कुश इत्येके ॥
|
4.127 |
कुंस इत्यन्ये ॥
|
4.128 |
कुंश इत्यपरे ॥
|
4.129 |
बुस उत्सर्गे ॥
|
4.130 |
मुस खण्डने ॥
|
4.131 |
मसी परिमाने ॥
|
4.132 |
समी इत्येके ॥
|
4.133 |
लुट विलोडने ॥
|
4.134 |
लुठ इत्येके ॥
|
4.135 |
उच समवाये ॥
|
4.136 |
भृशुऽ ॥
|
4.137 |
भृंशुऽ ॥
|
4.138 |
भ्रंशु अधःपतने ॥
|
4.139 |
वृश वरणे ॥
|
4.140 |
कृश तनूकरणे ॥
|
4.141 |
ञितृष ञितृषा पिपासायाम् ॥
|
4.142 |
हृष तुष्टौ ॥
|
4.143 |
रुष रोषे ॥
|
4.144 |
रिष हिंसायाम् ॥
|
4.145 |
डिप क्षेपे ॥
|
4.146 |
कुप क्रोधे ॥
|
4.147 |
गुप व्याकुलत्वे ॥
|
4.148 |
युपऽ ॥
|
4.149 |
रुपऽ ॥
|
4.150 |
लुप विमोहने ॥
|
4.151 |
ष्टुप समुच्छ्राये ॥
|
4.152 |
ष्टूप इत्येके ॥
|
4.153 |
लुभ गार्द्ध्ये गार्ध्न्ये ॥
|
4.154 |
क्षुभ सञ्चलने ॥
|
4.155 |
व्युस इत्येके ॥
|
4.155 |
णभऽ ॥
|
4.156 |
तुभ हिंसायाम्। क्षुभिनभितुभयो द्युतादौ क्र्यादौ च पठ्यन्ते ॥
|
4.157 |
क्लिदू आद्रीभावे ॥
|
4.158 |
ञिमिदा स्नेहने ॥
|
4.159 |
ञिक्ष्विदा स्नेहनमोचनयोः ॥
|
4.160 |
ऋधु वृद्धौ ॥
|
4.161 |
गृधु अभिकाङ्क्षायाम्। इत्यसुप्रभृतय उदात्ता उदात्तेतः। वृत् ॥
|
5.1 |
षुञ् अभिषवे ॥
|
5.2 |
षिञ् बन्धने ॥
|
5.3 |
शिञ् निशाने ॥
|
5.4 |
डुमिञ् प्रक्षेपने ॥
|
5.5 |
चिञ् चयने ॥
|
5.6 |
स्तृञ् आच्छादने ॥
|
5.7 |
कृञ् हिंसायाम् ॥
|
5.8 |
वृञ् वरणे ॥
|
5.9 |
धुञ् कम्पने ॥
|
5.10 |
धूञ् इत्येके दीर्घन्तोऽपीत्येके। इति स्वादयो वृञ्वर्जमनुदात्ता उभयतोभाषाः ॥
|
5.11 |
टुदु उपतापे ॥
|
5.12 |
हि गतौ वृद्धौ च ॥
|
5.13 |
पृ प्रीतौ ॥
|
5.14 |
स्पृ प्रीतिपालनयोः। प्रीतिचलनयोरित्यन्ये ॥
|
5.15 |
स्मृ इत्येके। पृणोत्यादस्त्रयोऽपि छान्दसा इत्याहुः ॥
|
5.16 |
आपॢ व्याप्तौ ॥
|
5.17 |
शकॢ शक्तौ ॥
|
5.18 |
राधऽ ॥
|
5.19 |
साध संसिद्धौ। इति दुनोतिप्रभृतयोऽनुदात्ताः परस्मैभाषाः ॥
|
5.20 |
अशू व्याप्तौ सङ्घाते च ॥
|
5.21 |
ष्टिघ आस्कन्दने। इत्युदात्तावनुदात्तेतौ ॥
|
5.22 |
तिकऽ ॥
|
5.23 |
तिग गतौ च ॥
|
5.24 |
षघ हिंसायाम् ॥
|
5.25 |
ञिधृषा प्रागल्भ्ये ॥
|
5.26 |
दम्भु दम्भने दम्भे ॥
|
5.27 |
ऋधु वृद्धौ ॥
|
5.28 |
तृप प्रीणन इत्येके। छन्दसि। अथागणान्ताश्छान्दसाः ॥
|
5.29 |
अह व्याप्तौ ॥
|
5.30 |
दघ घातने पालने च ॥
|
5.31 |
चमु भक्षणे ॥
|
5.32 |
रिऽ ऋऽ ॥
|
5.33 |
क्षिऽ क्षीऽ ॥
|
5.34 |
चिरिऽ ॥
|
5.35 |
जिरिऽ ॥
|
5.36 |
दाशऽ ॥
|
5.37 |
दृई हिंसायाम्। क्षिर्भाषायामित्येके ॥
|
5.38 |
ऋऽ ॥
|
5.39 |
क्षी इत्येक एवाजादिरित्येके। रेफवानित्यन्ये। वृत् ॥
|
6.1 |
तुद व्यथने ॥
|
6.2 |
णुद प्रेरणे ॥
|
6.3 |
दिश अतिसर्जने ॥
|
6.4 |
भ्रस्ज पाके ॥
|
6.5 |
क्षिप प्रेरणे ॥
|
6.6 |
कृष विलेखने। इति तुदादयोऽनुदात्ताः स्वरितेतः ॥
|
6.7 |
ऋषी गतौ। उदात्त उदात्तेत् ॥
|
6.8 |
जुषी प्रीतिसेवनयोः ॥
|
6.9 |
ओविजी भयचलनयोः ॥
|
6.10 |
ओलजीऽ ॥
|
6.11 |
ओलस्जी व्रीडायाम् व्रीडे। इति जुषादय उदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
6.12 |
ओव्रश्चू छेदने ॥
|
6.13 |
व्यच व्याजीकरणे ॥
|
6.14 |
उछि उञ्छे ॥
|
6.15 |
उछी विवासे ॥
|
6.16 |
ऋछ गतीन्द्रियप्रलयमूर्तिभावेषु ॥
|
6.17 |
मिछ उत्क्लेशे ॥
|
6.18 |
जर्जऽ ॥
|
6.19 |
चर्चऽ ॥
|
6.20 |
झर्झ परिभाषणभर्त्सनयोः ॥
|
6.21 |
त्वच संवरणे ॥
|
6.22 |
ऋच स्तुतौ ॥
|
6.23 |
उब्ज आर्जवे ॥
|
6.24 |
उज्झऽ उद्झ उत्सर्गे ॥
|
6.25 |
लुभ विमोहने ॥
|
6.26 |
रिफ कत्थनयुद्धनिन्दाहिंसादानेषु ॥
|
6.27 |
रिह इत्येके ॥
|
6.28 |
तृपऽ ॥
|
6.29 |
तृम्पऽ तृप्तौ ॥
|
6.30 |
तृफऽ ॥
|
6.31 |
तृम्फ इत्येके ॥
|
6.32 |
तुपऽ ॥
|
6.33 |
तुम्पऽ ॥
|
6.34 |
तुफऽ ॥
|
6.35 |
तुम्फ हिंसायाम् ॥
|
6.36 |
दृपऽ ॥
|
6.37 |
दृम्प उत्क्लेशे ॥
|
6.38 |
दृफऽ ॥
|
6.39 |
दृम्फ इत्येके ॥
|
6.40 |
ऋफऽ ॥
|
6.41 |
ऋम्फ हिंसायाम् ॥
|
6.42 |
गुफऽ ॥
|
6.43 |
गुम्फ ग्रन्थे ॥
|
6.44 |
उभऽ ॥
|
6.45 |
उम्भ पूरणे ॥
|
6.46 |
शुभऽ ॥
|
6.47 |
शुम्भ शोभार्थे ॥
|
6.48 |
दृभी ग्रन्थे ॥
|
6.49 |
चृती हिंसाग्रन्थनयोः ॥
|
6.50 |
विध विधाने ॥
|
6.51 |
जुड गतौ ॥
|
6.52 |
जुन इत्येके ॥
|
6.53 |
मृड सुखने ॥
|
6.54 |
पृड च ॥
|
6.55 |
पृण प्रीणने ॥
|
6.56 |
वृण च ॥
|
6.57 |
मृण हिंसायाम् ॥
|
6.58 |
तुण कौटिल्ये ॥
|
6.59 |
पुण कर्मणि शुभे ॥
|
6.60 |
मुण प्रतिज्ञाने ॥
|
6.61 |
कुण शब्दोपकरणयोः शब्दोपतापयोः ॥
|
6.62 |
शुन गतौ ॥
|
6.63 |
द्रुण हिंसागतिकौटिल्येषु ॥
|
6.64 |
घुणऽ ॥
|
6.65 |
घूर्ण भ्रमणे ॥
|
6.66 |
षुर ऐश्वर्यदीप्त्योः ॥
|
6.67 |
कुर शब्दे ॥
|
6.68 |
खुर छेदने ॥
|
6.69 |
मुर संवेष्टने सञ्चेष्टने ॥
|
6.70 |
क्षुर विलेखने ॥
|
6.71 |
घुर भीमार्थशब्दयोः ॥
|
6.72 |
पुर अग्रगमने ॥
|
6.73 |
वृहू उद्यमने ॥
|
6.74 |
बृहू इत्येके ॥
|
6.75 |
तृहूऽ ॥
|
6.76 |
स्तृहूऽ ॥
|
6.77 |
तृंहू हिंसार्थाः ॥
|
6.78 |
इष इषु इच्छायाम् ॥
|
6.79 |
मिष स्पर्धायाम् ॥
|
6.80 |
किल श्वैत्यक्रीडनयोः श्वैत्ये ॥
|
6.81 |
तिल स्नेहने स्नेहे ॥
|
6.82 |
चिल वसने ॥
|
6.83 |
चल विलसने ॥
|
6.84 |
इल स्वप्नक्षेपनयोः ॥
|
6.85 |
विल संवरणे ॥
|
6.86 |
बिल भेदने ॥
|
6.87 |
णिल गहने ॥
|
6.88 |
हिल भावकरणे ॥
|
6.89 |
शिलऽ ॥
|
6.90 |
षिल उञ्छे ॥
|
6.91 |
मिल श्लेषणे ॥
|
6.92 |
लिख अक्षरविन्यासे ॥
|
6.93 |
कुट कौटिल्ये ॥
|
6.94 |
पुट संश्लेषणे ॥
|
6.95 |
कुच सङ्कोचने ॥
|
6.96 |
गुज शब्दे ॥
|
6.97 |
गुड रक्षायाम् ॥
|
6.98 |
डिप क्षेपे ॥
|
6.99 |
छुर छेदने ॥
|
6.100 |
स्फुट विकसने ॥
|
6.101 |
मुट आक्षेपप्रमर्दनयोः ॥
|
6.102 |
त्रुट छेदने ॥
|
6.103 |
तुट कलहकर्मणि ॥
|
6.104 |
चुटऽ ॥
|
6.105 |
छुट छेदने ॥
|
6.106 |
जुड बन्धने ॥
|
6.107 |
जुट इत्येके ॥
|
6.108 |
कड मदे ॥
|
6.109 |
लुट संश्लेषणे ॥
|
6.110 |
लुठ इत्येके ॥
|
6.111 |
लुड इत्यन्ये ॥
|
6.112 |
कृड घनत्वे ॥
|
6.113 |
कुड बाल्ये ॥
|
6.114 |
पुड उत्सर्गे ॥
|
6.115 |
घुट प्रतिघाते ॥
|
6.116 |
तुड तोडने ।
६.११৭ थुडऽ ॥
|
6.118 |
स्थुड संवरणे ॥
|
6.119 |
खुडऽ ॥
|
6.120 |
छुड इत्येके ॥
|
6.121 |
स्फुरऽ ॥
|
6.122 |
स्फुल सञ्चलने । स्फुर स्फुरणे । स्फुल सञ्चलन इत्येके ॥
|
6.123 |
स्फरऽ ॥
|
6.124 |
स्फल इत्यन्ये ॥
|
6.125 |
स्फुडऽ ॥
|
6.126 |
चुडऽ ॥
|
6.127 |
व्रुड संवरणे ॥
|
6.128 |
क्रुडऽ ॥
|
6.129 |
भृड निमज्जने इत्येके ॥
|
6.130 |
हुड सङ्घाते । इति व्रश्चादय उदात्ता उदात्तेतः ॥
|
6.131 |
गुरी उद्यमने । उदात्त अनुदात्तेत् ॥
|
6.132 |
णू णु स्तुतौ ॥
|
6.133 |
धू धु विधूनने । इत्युदात्तौ परस्मैभाषौ ॥
|
6.134 |
गु पुरीषोत्सर्गे ॥
|
6.135 |
ध्रु गतिस्थैर्ययोः । ध्रुव इत्येके । इत्यनुदात्तौ परस्मैभाषौ ॥
|
6.136 |
कुङ् शब्दे ॥
|
6.137 |
कूङ् इत्येके दीर्घान्त इति कैयटादयः । ह्रस्वान्त इति न्यासः । उदात्त आत्मनेभाषः । वृत् । कुटादयो गताः ॥
|
6.138 |
पृङ् व्यायामे ॥
|
6.139 |
मृङ् प्राणत्यागे । इत्यनुदात्तावात्मनेभाषौ ॥
|
6.140 |
रिऽ ॥
|
6.141 |
पि गतौ ॥
|
6.142 |
धि धारणे ॥
|
6.143 |
क्षि निवासगत्योः । इति रियत्यादयोऽनुदात्ताः परस्मैभाषाः ॥
|
6.144 |
षू प्रेरणे ॥
|
6.145 |
कृई विक्षेपे निक्षेपे ॥
|
6.146 |
गृई निगरणे । इत्युदात्ताः परस्मैभाषाः ॥
|
6.147 |
दृङ् आदरे ॥
|
6.148 |
धृङ् अवस्थाने । इत्यनुदात्तावात्मनेभाषौ ॥
|
6.149 |
प्रछ ज्ञीप्सायाम् । वृत् । किरादयो वृत्ताः ॥
|
6.150 |
सृज विसर्गे ॥
|
6.151 |
टुमस्जो शुद्धौ ॥
|
6.152 |
रुजो भङ्गे ॥
|
6.153 |
भुजो कौटिल्ये ॥
|
6.154 |
छुप स्पर्शे ॥
|
6.155 |
रुशऽ ॥
|
6.156 |
रिश हिंसायाम् ॥
|
6.157 |
लिश गतौ ॥
|
6.158 |
स्पृश संस्पर्शने ॥
|
6.159 |
विछ गतौ ॥
|
6.160 |
विश प्रवेशने ॥
|
6.161 |
मृश आमर्शणे ॥
|
6.162 |
णुद प्रेरणे ॥
|
6.163 |
षदॢ विशरणगत्यवसादनेषु ॥
|
6.164 |
शदॢ शातने। इति पृच्छत्यादयोऽनुदात्ता उदात्तेतः। विछिस्तूदात्तः ॥
|
6.165 |
मिल सङ्गमे सङ्गमने। उदात्तः स्वरितेत्। अथ मुचादयः ॥
|
6.166 |
मुचॢ मोक्षणे मोचने ॥
|
6.167 |
लुपॢ छेदने ॥
|
6.168 |
विदॢ लाभे ॥
|
6.169 |
लिप उपदेहे ॥
|
6.170 |
षिच क्षरणे। इति मुचादयोऽनुदात्ताः स्वरितेतः। विन्दतिस्तूदात्तः ॥
|
6.171 |
कृती छेदने। उदात्त उदात्तेत् ॥
|
6.172 |
खिद परिघाते परिघातने ॥
|
6.173 |
पिश अवयवे। अयं दीपनायामपि। इत्युदात्ता उदात्तेतः। खिदिस्त्वनुदात्तः। वृत्। मुचादयो वृत्ताः। वृत्। इति शविकरणास्तुदादयः। ६ ॥
|
7.1 |
रुधिर् आवरणे ॥
|
7.2 |
भिदिर् विदारणे ॥
|
7.3 |
छिदिर् द्वैधीकरणे ॥
|
7.4 |
रिचिर् विरेचने ॥
|
7.5 |
विचिर् पृथग्भावे ॥
|
7.6 |
क्षुदिर् सम्प्रेषणे ॥
|
7.7 |
युजिर् योगे। इति रुधादयोऽनुदात्ताः स्वरितेतः ॥
|
7.8 |
उछृदिर् दीप्तिदेवनयोः ॥
|
7.9 |
उतृदिर् हिंसानादरयोः। इत्युदात्तौ स्वरितेतौ ॥
|
7.10 |
कृती वेष्टने। उदात्त उदात्तेत् ॥
|
7.11 |
ञिऽइन्धी दीप्तौ। उदात्तोऽनुदात्तेत् ॥
|
7.12 |
खिद दैन्ये ॥
|
7.13 |
विद विचारणे। इत्यनुदात्तावनुदात्तेतौ ॥
|
7.14 |
शिषॢ विशेषणे ॥
|
7.15 |
पिषॢ सञ्चूर्णने ॥
|
7.16 |
भञ्जो आमर्दने ॥
|
7.17 |
भुज पालनाभ्यवहारयोः। इति शिषादयोऽनुदात्ता उदात्तेतः ॥
|
7.18 |
तृह हिंसायाम् ॥
|
7.19 |
हिसि हिंसायाम् ॥
|
7.20 |
उन्दी क्लेदने ॥
|
7.21 |
अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु व्यक्तिमर्षणकान्तिगतिषु ॥
|
7.22 |
तञ्चू सङ्कोचने ॥
|
7.23 |
ओविजी भयचलनयोः ॥
|
7.24 |
वृजी वर्जने ॥
|
7.25 |
पृची सम्पर्के। इति तृहादय उदात्ता उदात्तेतः। वृत्। इति श्नम्विकरणा रुधादयः। ७ ॥
|
8.1 |
तनु विस्तारे ॥
|
8.2 |
षणु दाने ॥
|
8.3 |
क्षणु हिंसायाम् ॥
|
8.4 |
क्षिणु च ॥
|
8.5 |
ऋणु गतौ ॥
|
8.6 |
तृणु अदने ॥
|
8.7 |
घृणु दीप्तौ। इति तनादय उदात्तः स्वरितेतः ॥
|
8.8 |
वनु वनु याचने। अयं चन्द्रमते परस्मैपदी ॥
|
8.9 |
मनु अवबोधने। इत्यनुदात्तावुदात्तेतौ ॥
|
8.10 |
डुकृञ् करणे। अनुदात्त उभयतोभाषः। वृत्। इत्युविकरणास्तनादयः। ८ ॥
|
9.1 |
डुक्रीञ् द्रव्यविनिमये ॥
|
9.2 |
प्रीञ् तर्पने कान्तौ च ॥
|
9.3 |
श्रीञ् पाके ॥
|
9.4 |
मीञ् हिंसायाम् बन्धने माने ॥
|
9.5 |
षिञ् बन्धने ॥
|
9.6 |
स्कुञ् आप्रवने ॥
|
9.7 |
स्तम्भुऽ ॥
|
9.8 |
स्तुम्भुऽ ॥
|
9.9 |
स्कम्भुऽ ॥
|
9.10 |
स्कुम्भु रोधन इत्येके। प्रथमतृतीयौ स्तम्भ इति माधवः। द्वितीयो निष्कोषणे चतुर्थो धारण इत्यन्ये। चत्वार इमे परस्मैपदिनः सौत्राश्च ॥
|
9.11 |
युञ् बन्धने। इति क्र्यादयोऽनुदात्ता उभयतोभाषाः ॥
|
9.12 |
क्नूञ् शब्दे ॥
|
9.13 |
द्रूञ् हिंसायाम् ॥
|
9.14 |
पूञ् पवने ॥
|
9.15 |
मूञ् बन्धने ॥
|
9.16 |
लूञ् छेदने ॥
|
9.17 |
स्तृईञ् आच्छादने ॥
|
9.18 |
कृईञ् हिंसायाम् ॥
|
9.19 |
वृईञ् वरणे ॥
|
9.20 |
धूञ् कम्पने। इति क्नूञ्प्रभृतय उदात्ता उभयतोभाषाः ॥
|
9.21 |
शृई हिंसायाम् ॥
|
9.22 |
पृई पालनपूरणयोः ॥
|
9.23 |
वृई वरणे। भरण इत्येके ॥
|
9.24 |
भृई भर्त्सने। भरनेऽप्येके ॥
|
9.25 |
मृई हिंसायाम् ॥
|
9.26 |
दृई विदारणे ॥
|
9.27 |
जृई वयोहानौ ॥
|
9.28 |
झृई इत्येके ॥
|
9.29 |
धृई इत्यन्ये ॥
|
9.30 |
नृई नये ॥
|
9.31 |
कृई हिंसायाम् ॥
|
9.32 |
ऋई गतौ ॥
|
9.33 |
गृई शब्दे । इति शृणातिप्रभृतय उदात्ता उदात्तेतः ॥
|
9.34 |
ज्या वयोहानौ ॥
|
9.35 |
री गतिरेषणयोः ॥
|
9.36 |
ली श्लेषणे ॥
|
9.37 |
व्ली वरणे ॥
|
9.38 |
ब्ली इत्येके ॥
|
9.39 |
प्ली गतौ । वृत् । इति ल्वादयः प्वादयश्च ॥
|
9.40 |
व्री वरणे ॥
|
9.41 |
भ्री भये । भरण इत्येके ॥
|
9.42 |
क्षीष् हिंसायाम् ॥
|
9.43 |
ज्ञा अवबोधने ॥
|
9.44 |
बन्ध बन्धने । इति ज्यादयोऽनुदात्ताः परस्मैभाषाः ॥
|
9.45 |
वृङ् सम्भक्तौ । उदात्त आत्मनेभाषः ॥
|
9.46 |
श्रन्थ विमोचनप्रतिहर्षयोः ॥
|
9.47 |
मन्थ विलोडने ॥
|
9.48 |
श्रन्थऽ ॥
|
9.49 |
ग्रन्थ सन्दर्भे ॥
|
9.50 |
कुन्थ संश्लेषणे ॥
|
9.51 |
मृद क्षोदे ॥
|
9.52 |
मृड सुखे च मृड च । अयं सुखेऽपि ॥
|
9.53 |
गुध रोषे ॥
|
9.54 |
कुष निष्कर्षे ॥
|
9.55 |
क्षुभ सञ्चलने ॥
|
9.56 |
णभऽ ॥
|
9.57 |
तुभ हिंसायाम् ॥
|
9.58 |
क्लिशू विबाधने ॥
|
9.59 |
अश भोजने ॥
|
9.60 |
उध्रस उञ्छे ॥
|
9.61 |
इष आभीक्ष्ण्ये ॥
|
9.62 |
विष विप्रयोगे ॥
|
9.63 |
प्रुषऽ ॥
|
9.64 |
प्लुष स्नेहनसेवनपूरणेषु ॥
|
9.65 |
पुष पुष्टौ ॥
|
9.66 |
मुष स्तेये ॥
|
9.67 |
खच भूतप्रादुर्भावे ॥
|
9.68 |
खव इत्येके ॥
|
9.69 |
हेठ च ॥
|
9.70 |
हेढ इत्येके । इति श्रन्थादय उदात्ता उदात्तेतः । क्लिशिस्तु वेट् । विषिस्त्वनुदात्तः ॥
|
9.71 |
ग्रह उपादाने । उदात्तः स्वरितेत् ॥ वृत् ॥ इति श्नाविकरणा क्र्यादयः ॥
|
10.1 |
चुर स्तेये ॥
|
10.2 |
चिति स्मृत्याम् ॥
|
10.3 |
यत्रि सङ्कोचने ॥
|
10.4 |
स्फुडि परिहासे ॥
|
10.5 |
स्फुटि इत्येके इत्यपि ॥
|
10.6 |
लक्ष दर्शनाङ्कनयोः ॥
|
10.7 |
कुद्रि अनृतभाषणे ॥
|
10.8 |
कुदृ इत्येके ॥
|
10.9 |
कुडि इत्यपरे ॥
|
10.10 |
लड उपसेवायाम् ॥
|
10.11 |
मिदि स्नेहने ॥
|
10.12 |
मिद इत्येके अयमनिदिदिति क्षीरस्वामिकौशिकौ ॥
|
10.13 |
ओलडि उत्क्षेपने ॥
|
10.14 |
ओलडि इत्येके ओकारो धात्ववयव इत्येके । नेत्यपरे । उलडि इत्यन्ये ॥
|
10.15 |
जल अपवारणे ॥
|
10.16 |
लज इत्येके ॥
|
10.17 |
पीड अवगाहने ॥
|
10.18 |
नट अवस्यन्दने ॥
|
10.19 |
श्रथ प्रयत्ने । प्रस्थान इत्येके ॥
|
10.20 |
बध संयमने ॥
|
10.21 |
बन्ध इति चान्द्राः ॥
|
10.22 |
पृई पूरणे ॥
|
10.23 |
ऊर्ज बलप्राणनयोः ॥
|
10.24 |
पक्ष परिग्रहे ॥
|
10.25 |
वर्णऽ ॥
|
10.26 |
चूर्ण प्रेरणे । वर्ण वर्णन इत्येके ॥
|
10.27 |
प्रथ प्रख्याने ॥
|
10.28 |
पृथ प्रक्षेपे ॥
|
10.29 |
पथ इत्येके ॥
|
10.30 |
षम्ब सम्बन्धने ॥
|
10.31 |
शम्ब च ॥
|
10.32 |
साम्ब इत्येके ॥
|
10.33 |
भक्ष अदने ॥
|
10.34 |
कुट्ट छेदनभर्त्सनयोः ॥
|
10.35 |
पुट्टऽ ॥
|
10.36 |
चुट्ट अल्पीभावे ॥
|
10.37 |
अट्टऽ ॥
|
10.38 |
षुट्ट अनादरे ॥
|
10.39 |
लुण्ट स्तेये ॥
|
10.40 |
लुण्ठ इति केचित् ॥
|
10.41 |
शठऽ ॥
|
10.42 |
श्वठ असंस्कारगत्योः ॥
|
10.43 |
श्वठि इत्येके ॥
|
10.44 |
तुजऽ ॥
|
10.45 |
तुजिऽ ॥
|
10.46 |
पिजऽ ॥
|
10.47 |
पिजिऽ ॥
|
10.48 |
लजिऽ ॥
|
10.49 |
लुजि हिंसाबलादाननिकेतनेषु ॥
|
10.50 |
पिस गतौ ॥
|
10.51 |
षान्त्व सामप्रयोगे ॥
|
10.52 |
शान्त्व इत्येके ॥
|
10.53 |
श्वल्कऽ ॥
|
10.54 |
वल्क परिभाषणे ॥
|
10.55 |
ष्णिह स्नेहने ॥
|
10.56 |
स्फिट इत्येके ॥
|
10.57 |
स्मिट अनादरे ॥
|
10.58 |
ष्मिङ् इत्येके ॥
|
10.59 |
श्लिष श्लेषणे ॥
|
10.60 |
पथि गतौ ॥
|
10.61 |
पिछ कुट्टने ॥
|
10.62 |
छदि संवरणे ॥
|
10.63 |
श्रण दाने ॥
|
10.64 |
तड आघाते ॥
|
10.65 |
खडऽ ॥
|
10.66 |
खडिऽ ॥
|
10.67 |
कडि खण्डने भेदने ॥
|
10.68 |
कुडि रक्षणे ॥
|
10.69 |
गुडि वेष्टने च । रक्षण इत्येके ॥
|
10.70 |
कुठि इत्यन्ये ॥
|
10.71 |
गुठि इत्यपरे ॥
|
10.72 |
खुडि खण्डने ॥
|
10.73 |
वटि विभाजने ॥
|
10.74 |
वडि इत्येके इति केचित् ॥
|
10.75 |
चडि कोपे । चण्ड इत्यन्ये ॥
|
10.76 |
मडि भूषायां हर्षे च ॥
|
10.77 |
भडि कल्याणे ॥
|
10.78 |
छर्द वमने ॥
|
10.79 |
पुस्तऽ ॥
|
10.80 |
बुस्त आदरानादरयोः ॥
|
10.81 |
चुद सञ्चोदने ॥
|
10.82 |
नक्कऽ ॥
|
10.83 |
धक्क नाशने ॥
|
10.84 |
चक्कऽ ॥
|
10.85 |
चुक्क व्यथने ॥
|
10.86 |
क्षल शौचकर्मणि ॥
|
10.87 |
तल प्रतिष्ठायाम् ॥
|
10.88 |
तुल उन्माने ॥
|
10.89 |
दुल उत्क्षेपे ॥
|
10.90 |
पुल महत्त्वे ॥
|
10.91 |
चुल समुच्छ्राये ॥
|
10.92 |
मूल रोहने ॥
|
10.93 |
कलऽ ॥
|
10.94 |
विल क्षेपे ॥
|
10.95 |
बिल भेदने ॥
|
10.96 |
तिल स्नेहने ॥
|
10.97 |
चल भृतौ ॥
|
10.98 |
पाल रक्षणे ॥
|
10.99 |
पल इत्येके ॥
|
10.100 |
लूष हिंसायाम् ॥
|
10.101 |
शुल्ब माने ॥
|
10.102 |
शूर्प च ॥
|
10.103 |
चुट छेदने ॥
|
10.104 |
मुट सञ्चूर्णने ॥
|
10.105 |
पिशऽ ॥
|
10.106 |
पडिऽ ॥
|
10.107 |
पसि नाशने ॥
|
10.108 |
पशि इत्येके ॥
|
10.109 |
व्रज मार्गसंस्कारगत्योः ॥
|
10.110 |
शुल्क अतिसर्जने अतिस्पर्शने ॥
|
10.111 |
चपि गत्याम् ॥
|
10.112 |
क्षपि क्षान्त्याम् ॥
|
10.113 |
क्षजि कृच्छ्रजीवने ॥
|
10.114 |
छजि इत्येके ॥
|
10.115 |
श्वर्त गत्याम् ॥
|
10.116 |
स्वर्त इत्येके ॥
|
10.117 |
श्वभ्र च । अथ ज्ञपादयो मितः ॥
|
10.118 |
ज्ञपम् ज्ञप ज्ञानज्ञापनमारणतोषणनिशाननिशामनेषु । मिच्चेत्येके ॥
|
10.119 |
यमम् यम च परिवेषणे । चान्मित् ॥
|
10.120 |
चहम् परिकल्पने ॥
|
10.121 |
चपम् इत्येके ॥
|
10.122 |
रहम् त्यागे ॥
|
10.123 |
बलम् प्राणने ॥
|
10.124 |
चिञ्म् चयने । वृत् । नान्ये मितोऽहेतौ ॥
|
10.125 |
घट्ट चलने ॥
|
10.126 |
मुस्त सङ्घाते ॥
|
10.127 |
खट्ट संवरणे ॥
|
10.128 |
षट्टऽ ॥
|
10.129 |
स्फिट्टऽ ॥
|
10.130 |
चुबि हिंसायाम् ॥
|
10.131 |
पूल सङ्घाते ॥
|
10.132 |
पूर्ण इत्येके ॥
|
10.133 |
पुण इत्यन्ये ॥
|
10.134 |
पुंस अभिवर्धणे ॥
|
10.135 |
टकि बन्धने ॥
|
10.136 |
व्यप क्षेपे ॥
|
10.137 |
व्ययऽ ॥
|
10.138 |
विपऽ चेत्येके ॥
|
10.139 |
धूस कान्तिकरणे ॥
|
10.140 |
धूष इत्येके मूर्धन्यान्त इत्येके ॥
|
10.141 |
धूश इत्यपरे तालव्यान्त इत्यन्ये ॥
|
10.142 |
कीट वर्णे वरणे ॥
|
10.143 |
चूर्ण सङ्कोचने ॥
|
10.144 |
पूज पूजायाम् ॥
|
10.145 |
अर्क स्तवने ॥
|
10.146 |
शुठ आलस्ये ॥
|
10.147 |
शुठि शोषणे ॥
|
10.148 |
जुड प्रेरणे ॥
|
10.149 |
गजऽ ॥
|
10.150 |
मार्ज शब्दार्थौ ॥
|
10.151 |
मर्च च ॥
|
10.152 |
घृ प्रस्रवणे । स्रावण इत्येके ॥
|
10.153 |
पचि विस्तारवचने ॥
|
10.154 |
तिज निशाने निशातने ॥
|
10.155 |
कृईत संशब्दने ॥
|
10.156 |
वर्ध छेदनपूरनयोः ॥
|
10.157 |
कुबि आच्छादने छादने ॥
|
10.158 |
कुभि इत्येके ॥
|
10.159 |
लुबिऽ ॥
|
10.160 |
तुबि अदर्शने । अर्दन इत्येके ॥
|
10.161 |
ह्लप व्यक्तायां वाचि ॥
|
10.162 |
क्लप इत्येके ॥
|
10.163 |
ह्रप इत्यन्ये ॥
|
10.164 |
चुटि छेदने ॥
|
10.165 |
मृडिऽ ॥
|
10.166 |
तुडिऽ ॥
|
10.167 |
इल प्रेरणे ॥
|
10.168 |
म्रक्ष म्लेच्छने ॥
|
10.169 |
म्रछ इत्येके ॥
|
10.170 |
म्लेछऽ ॥
|
10.171 |
म्रक्ष छेदने । म्लेछ अव्यक्तायां वाचि ॥
|
10.172 |
ब्रूसऽ ॥
|
10.173 |
बर्ह हिंसायाम् । केचिदिह गर्जऽ गर्द शब्दे गर्ध अभिकाङ्क्षायामिति पठन्ति ॥
|
10.174 |
व्रूसऽ ॥
|
10.175 |
वर्ह इत्येके ॥
|
10.176 |
व्रूष इत्यन्ये ॥
|
10.177 |
गर्जऽ ॥
|
10.178 |
गर्द शब्दे ॥
|
10.179 |
गर्ध अभिकाङ्क्षायाम् ॥
|
10.180 |
गुर्द पूर्वनिकेतने । गुर्दऽ ॥
|
10.181 |
पूर्व निकेतन इत्यन्ये ॥
|
10.182 |
जसि रक्षणे । मोक्षण इत्येके इति केचित् ॥
|
10.183 |
ईड स्तुतौ ॥
|
10.184 |
जसु हिंसायाम् ॥
|
10.185 |
पिडि सङ्घाते ॥
|
10.186 |
पिठि इत्येके ॥
|
10.187 |
रुष रोषे ॥
|
10.188 |
रुट इत्येके ॥
|
10.189 |
डिप क्षेपे ॥
|
10.190 |
ष्टुप समुच्छ्राये ॥
|
10.191 |
ष्टूप इत्येके । इति चुरादय उदात्ता उदात्तेतः ॥
|
10.192 |
चित सञ्चेतने ॥
|
10.193 |
दशि दंशने दर्शनदंशनयोः ॥
|
10.194 |
दसि दर्शनदंशनयोः ॥
|
10.195 |
दस इत्यप्येके ॥
|
10.196 |
डपऽ ॥
|
10.197 |
डिप सङ्घाते ॥
|
10.198 |
तत्रि कुटुम्बधारणे ॥
|
10.199 |
मत्रि गुप्तपरिभाषणे ॥
|
10.200 |
स्पश ग्रहणसंश्लेषणयोः ॥
|
10.201 |
तर्जऽ ॥
|
10.202 |
भर्त्स सन्तर्जने तर्जने ॥
|
10.203 |
बस्तऽ ॥
|
10.204 |
गन्ध अर्दने ॥
|
10.205 |
वस्त इत्येके ॥
|
10.206 |
हस्त इत्यन्ये ॥
|
10.207 |
विष्क हिंसायाम् ॥
|
10.208 |
हिष्क इत्येके ॥
|
10.209 |
निष्क परिमाणे ॥
|
10.210 |
लल ईप्सायाम् ॥
|
10.211 |
कूण सङ्कोचने ॥
|
10.212 |
तूण पूरणे ॥
|
10.213 |
भ्रूण आशाविशङ्कयोः आशायाम् ॥
|
10.214 |
शठ श्लाघायाम् ॥
|
10.215 |
यक्ष पूजायाम् ॥
|
10.216 |
स्यम वितर्के ॥
|
10.217 |
गूर उद्यमने ॥
|
10.218 |
शमऽ ॥
|
10.219 |
लक्ष आलोचने ॥
|
10.220 |
कुत्स अवक्षेपने ॥
|
10.221 |
त्रुट छेदने ॥
|
10.222 |
कुट इत्येके ॥
|
10.223 |
गल स्रवणे ॥
|
10.224 |
भल आभण्डने ॥
|
10.225 |
कूट अप्रदाने । अवसादन इत्येके ॥
|
10.226 |
कुट्ट प्रतापने ॥
|
10.227 |
वञ्चु प्रलम्भने ॥
|
10.228 |
वृष शक्तिबन्धने ॥
|
10.229 |
मद तृप्तियोगे ॥
|
10.230 |
दिवु परिकूजने ॥
|
10.231 |
गृई विज्ञाने ॥
|
10.232 |
विद चेतनाख्याननिवासेषु ॥
|
10.233 |
मन स्तम्भे ॥
|
10.234 |
मान इत्येके ॥
|
10.235 |
यु जुगुप्सायाम् ॥
|
10.236 |
कुस्म नाम्नो वा । कुत्सिस्मयने । इत्याकुत्सीया उदात्ता अनुदात्तेतः ॥
|
10.288 |
लिजिऽ ॥
|
10.289 |
लुजिऽ ॥
|
10.290 |
भजिऽ ॥
|
10.291 |
लघिऽ ॥
|
10.292 |
त्रसिऽ ॥
|
10.293 |
पिसिऽ ॥
|
10.294 |
कुसिऽ ॥
|
10.295 |
दशिऽ ॥
|
10.296 |
कुशिऽ ॥
|
10.297 |
घटऽ ॥
|
10.298 |
घटिऽ ॥
|
10.299 |
बृहिऽ वृहिऽ ॥
|
10.300 |
बर्हऽ वर्हऽ ॥
|
10.301 |
बल्हऽ वल्हऽ ॥
|
10.302 |
गुपऽ ॥
|
10.303 |
धूपऽ धुपऽ ॥
|
10.304 |
विछऽ ॥
|
10.305 |
चीवऽ चीबऽ ॥
|
10.306 |
पुथऽ ॥
|
10.307 |
लोकृऽ ॥
|
10.308 |
लोचृऽ ॥
|
10.309 |
णडऽ ॥
|
10.310 |
कुपऽ ॥
|
10.311 |
तर्कऽ ॥
|
10.312 |
वृतुऽ ॥
|
10.313 |
वृधु भाषार्थाः ॥
|
10.314 |
रुटऽ ॥
|
10.315 |
लजिऽ ॥
|
10.316 |
अजिऽ ॥
|
10.317 |
दसिऽ ॥
|
10.318 |
भृशिऽ ॥
|
10.319 |
रुशिऽ ॥
|
10.320 |
शीकऽ ॥
|
10.321 |
रुसिऽ ॥
|
10.322 |
नटऽ ॥
|
10.323 |
पुटिऽ ॥
|
10.324 |
जिऽ ॥
|
10.325 |
चिऽ जुचि जिवि ॥
|
10.326 |
रघिऽ ॥
|
10.327 |
लघिऽ ॥
|
10.328 |
अहिऽ ॥
|
10.329 |
रहिऽ ॥
|
10.330 |
महि च ॥
|
10.331 |
लडिऽ ॥
|
10.332 |
तडऽ ॥
|
10.333 |
नल च ॥
|
10.334 |
पूरी आप्यायने ॥
|
10.335 |
रुज हिंसायाम् ॥
|
10.336 |
ष्वद आस्वादने ॥
|
10.337 |
स्वाद इत्येके ॥ आ धृषाद्वा ॥
|
10.338 |
युजऽ ॥
|
10.339 |
पृच संयमने ॥
|
10.340 |
अर्च पूजायाम् ॥
|
10.341 |
षह मर्षणे ॥
|
10.342 |
ईर क्षेपे ॥
|
10.343 |
ली द्रवीकरणे ॥
|
10.344 |
वृजी वर्जने ॥
|
10.345 |
वृञ् आवरणे ॥
|
10.346 |
जृई वयोहानौ ॥
|
10.347 |
ज्रि च ॥
|
10.348 |
रिच वियोजनसम्पर्चनयोः ॥
|
10.349 |
शिष असर्वोपयोगे ॥
|
10.350 |
तप दाहे ॥
|
10.351 |
तृप तृप्तौ । सन्दीपन इत्येके ॥
|
10.352 |
छृदी सन्दीपने ॥
|
10.353 |
चृपऽ ॥
|
10.354 |
छृपऽ ॥
|
10.355 |
तृपऽ ॥
|
10.356 |
दृप सन्दीपने इत्येके ॥
|
10.357 |
दृभी भये ग्रन्थे ॥
|
10.358 |
दृभ सन्दर्भे ॥
|
10.359 |
छद संवरणे ॥
|
10.360 |
श्रथ मोक्षणे । हिंसायामित्येके ॥
|
10.361 |
मी गतौ ॥
|
10.362 |
ग्रन्थ बन्धने ॥
|
10.363 |
शीक आमर्षणे ॥
|
10.364 |
चीक च ॥
|
10.365 |
अर्द अर्द हिंसायाम् । स्वरितेदित्येके ॥
|
10.366 |
हिसि हिंसायाम् ॥
|
10.367 |
अर्ह पूजायाम् ॥
|
10.368 |
आङः षद पद्यर्थे ॥
|
10.369 |
शुन्ध शौचकर्मणि ॥
|
10.370 |
छद अपवारणे ॥
|
10.371 |
जुष परितर्कने । परितर्पण इत्यन्ये ॥
|
10.372 |
धूञ् कम्पने ॥
|
10.373 |
प्रीञ् तर्पने ॥
|
10.374 |
श्रन्थऽ ॥
|
10.375 |
ग्रन्थ सन्दर्भे ॥
|
10.376 |
आपॢ आपॢ लम्भने । स्वरितेदयमित्येके ॥
|
10.377 |
तनु श्रद्धोपकरणयोः । उपसर्गाच्च दैर्घ्ये ॥
|
10.378 |
चन श्रद्धोपहननयोरित्येके ॥
|
10.379 |
वद वद सन्देशवचने । स्वरितेत् । अनुदात्तेदित्येके ॥
|
10.380 |
वच परिभाषणे ॥
|
10.381 |
मान पूजायाम् ॥
|
10.382 |
भू प्राप्तावात्मनेपदी वा । णिच्सन्नियोगेनैवात्मनेपदमित्येके ॥
|
10.383 |
गर्ह विनिन्दने ॥
|
10.384 |
मार्ग अन्वेषणे ॥
|
10.385 |
कठि शोके । प्रायेणोत्पूर्व उत्कण्ठावचनः ॥
|
10.386 |
मृजू शौचालङ्कारयोः ॥
|
10.387 |
मृष मृष तितिक्षायाम् । स्वरितेत् । अनुदात्तेदित्येके ॥
|
10.388 |
धृष प्रसहने । इत्याधृषीयाः ॥
|
10.389 |
कथ वाक्यप्रबन्धे वाक्यप्रबन्धने ॥
|
10.390 |
वर ईप्सायाम् ॥
|
10.391 |
गण सङ्ख्याने ॥
|
10.392 |
शठऽ ॥
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10.393 |
श्वठ सम्यगवभाषणे ॥
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10.394 |
पटऽ ॥
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10.395 |
वट ग्रन्थे ॥
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10.396 |
रह त्यागे ॥
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10.397 |
रङ्ग गतौ ॥
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10.398 |
स्तनऽ ॥
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10.399 |
गदी देवशब्दे ॥
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10.400 |
पत गतौ वा । वादन्त इत्येके ॥
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10.401 |
पष अनुपसर्गात् गतौ ॥
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10.402 |
स्वर आक्षेपे ॥
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10.403 |
रच प्रतियत्ने ॥
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10.404 |
कल गतौ सङ्ख्याने च ॥
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10.405 |
चह परिकल्कने ॥
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10.406 |
मह पूजायाम् ॥
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10.407 |
सारऽ सरऽ ॥
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10.408 |
कृपऽ ॥
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10.409 |
श्रथ दौर्बल्ये ॥
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10.410 |
स्पृह ईप्सायाम् ॥
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10.411 |
भाम क्रोधे ॥
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10.412 |
सूच पैशुन्ये ॥
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10.413 |
खेट भक्षणे ॥
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10.414 |
खेड इत्येके ॥
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10.415 |
खोट इत्यन्ये ॥
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10.416 |
क्षोट क्षेपे ॥
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10.417 |
गोम उपलेपने ॥
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10.418 |
कुमार क्रीडायाम् ॥
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10.419 |
शील उपधारणे ॥
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10.420 |
साम सान्त्वप्रयोगे ॥
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10.421 |
वेल कालोपदेशे ॥
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10.422 |
काल च इति पृथग्धातुरित्येके ॥
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10.423 |
पल्यूल लवनपवनयोः ॥
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10.424 |
वात सुखसेवनयोः ॥
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10.425 |
गवेष मार्गणे ॥
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10.426 |
वास उपसेवायाम् ॥
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10.427 |
निवास आच्छादने ॥
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10.428 |
भाज पृथक्कर्मणि ॥
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10.429 |
सभाज प्रीतिदर्शनयोः । प्रीतिसेवनयोरित्येके ॥
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10.430 |
ऊन परिहाणे ॥
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10.431 |
ध्वन शब्दे ॥
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10.432 |
कूट परितापे । परिदाह इत्यन्ये ॥
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10.433 |
सङ्केतऽ ॥
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10.434 |
ग्रामऽ ॥
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10.435 |
कुणऽ ॥
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10.436 |
गुण चामन्त्रणे ॥
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10.437 |
केत श्रावणे निमन्त्रणे च ॥
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10.438 |
कूण सङ्कोचनेऽपि ॥
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10.439 |
स्तेन चौर्ये ॥ आ गर्वादात्मनेपदिनः ॥
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10.440 |
पद गतौ ॥
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10.441 |
गृह ग्रहणे ॥
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10.442 |
मृग अन्वेषणे ॥
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10.443 |
कुह विस्मापने ॥
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10.444 |
शूरऽ ॥
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10.445 |
वीर विक्रान्तौ ॥
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10.446 |
स्थूल परिबृंहणे ॥
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10.447 |
अर्थ उपयाच्ञायाम् ॥
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10.448 |
सत्र सत्त्र सन्तानक्रियायाम् ॥
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10.449 |
गर्व माने । इत्यागर्वीयाः ॥
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10.450 |
सूत्र वेष्टने । विमोचन इत्यन्ये ॥
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10.451 |
मूत्र प्रस्रवणे ॥
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10.452 |
रूक्ष पारुष्ये ॥
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10.453 |
पारऽ ॥
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10.454 |
तीर कर्मसमाप्तौ ॥
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10.455 |
पुट संसर्गे ॥
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10.456 |
कत्र कत्त्र शैथिल्ये ॥
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10.457 |
कर्त इत्यप्येके । प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमिष्टवच्च । तत्करोति तदाचष्टे । तेनातिक्रामति । धातुरूपं च । कर्तृकरणाद्धात्वर्थे ॥
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10.458 |
बष्क दर्शने ॥
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10.459 |
चित्र चित्रीकरणे । कदाचिद्दर्शने ॥
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10.460 |
अंस समाघाते ॥
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10.461 |
वट विभाजने ॥
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10.462 |
रट परिभाषणे ॥
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10.463 |
लज प्रकाशने ॥
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10.464 |
वटिऽ ॥
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10.465 |
लजि इत्येके ॥
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10.466 |
मिश्र सम्पर्के ॥
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10.467 |
सङ्ग्राम युद्धे । अयमनुदात्तेत् ॥
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10.468 |
स्तोम श्लाघायाम् ॥
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10.469 |
छिद्र कर्णभेदने । करणभेदन इत्येके ॥
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10.470 |
कर्ण भेदने इति धात्वन्तरमित्यपरे ॥
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10.471 |
अन्ध दृष्ट्युपघाते । उपसंहार इत्यन्ये ॥
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10.472 |
दण्ड दण्डनिपाते ॥
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10.473 |
अङ्क पदे लक्षणे च ॥
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10.474 |
अङ्ग च ॥
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10.475 |
सुखऽ ॥
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10.476 |
दुःख तत्क्रियायाम् ॥
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10.477 |
रस आस्वादनस्नेहनयोः ॥
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10.478 |
व्यय वित्तसमुत्सर्गे ॥
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10.479 |
रूप रूपक्रियायाम् ॥
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10.480 |
छेद द्वैधीकरणे ॥
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10.481 |
छद अपवारणे ॥
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10.482 |
लाभ प्रेरणे ॥
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10.483 |
व्रण गात्रविचूर्णने ॥
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10.484 |
वर्ण वर्णक्रियाविस्तारगुणवचनेषु । बहुलमेतन्निदर्शनम् इत्येके ॥
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10.485 |
पर्ण हरितभावे ॥
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10.486 |
विष्क दर्शने ॥
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10.487 |
क्षप प्रेरणे ॥
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10.488 |
वस निवासे ॥
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